उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले समाजवादी पार्टी (सपा) और कांग्रेस के बीच गठबंधन को लेकर सीटों के बंटवारे पर सियासी हलचल तेज होने के संकेत हैं। दोनों दलों के बीच गठबंधन की राह में सबसे बड़ी चुनौती सीटों की हिस्सेदारी को लेकर है। कांग्रेस जहां अधिक सीटें लेकर प्रदेश में अपनी राजनीतिक जमीन मजबूत करना चाहती है, वहीं सपा अपने नेतृत्व और चुनावी रणनीति के आधार पर गठबंधन को आगे बढ़ाना चाहती है। ऐसे में सपा 60 से 65 सीटों से बातचीत शुरू करने की तैयारी में है। इस बातचीत में पिछले विधानसभा और लोकसभा चुनावों के नतीजों के साथ-साथ सीटवार जीत की संभावना को भी अहम आधार बनाया जाएगा।
विधानसभा चुनाव के लिए सपा और कांग्रेस के बीच गठबंधन की गांठ अब सीटों के बंटवारे पर टिक गई है। कुछ समय पहले तक कांग्रेस की ओर से 150 से कम सीटों पर चुनाव न लड़ने की बात सामने आ रही थी। वहीं, कांग्रेस की दावेदारी करीब 200 सीटों तक पहुंचने की चर्चा है। ऐसे में सपा के सामने सहयोगी दल की महत्वाकांक्षाओं को साधने के साथ अपनी चुनावी जमीन और पार्टी नेताओं की दावेदारी के बीच संतुलन बनाने की चुनौती है। सपा इस गठबंधन को आगे बढ़ाने के लिए 60 सीटों से मोलभाव शुरू करने की तैयारी में है। हालांकि, सीटों की हिस्सेदारी तय करते समय केवल पुराने चुनावी आंकड़ों को ही आधार नहीं बनाया जाएगा, बल्कि यह भी देखा जाएगा कि किस सीट पर किस दल के प्रत्याशी की जीत की संभावना अधिक है।
पिछले चुनावों के नतीजों से निकलेगा रास्ता
सपा और कांग्रेस के बीच सीटों के बंटवारे का रास्ता पिछले विधानसभा और लोकसभा चुनावों के नतीजों के आधार पर निकालने की कोशिश होगी। सपा प्रमुख अखिलेश यादव पहले ही कह चुके हैं कि गठबंधन में बात सीटों की नहीं, बल्कि जीत की होगी। ऐसे में प्रत्येक सीट पर दावेदारी के साथ संगठन की सक्रियता, प्रत्याशी के चयन और सामाजिक समीकरणों को भी ध्यान में रखा जाएगा।वर्ष 2022 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने 399 सीटों पर अपने प्रत्याशी उतारे थे, लेकिन पार्टी को केवल दो सीटों पर जीत मिली थी। यह आंकड़ा सपा के लिए सीटों की मांग पर सवाल उठाने का आधार बन सकता है। दूसरी ओर, कांग्रेस अपनी राजनीतिक जमीन बढ़ाने के लिए अधिक सीटों पर चुनाव लड़ने की इच्छुक है।
साल 2024 के लोकसभा चुनाव में सपा ने 37 और कांग्रेस ने छह सीटों पर जीत हासिल की थी। दोनों दल इन नतीजों को विधानसभा क्षेत्रों के हिसाब से भी अपने पक्ष में तर्क के तौर पर रख सकते हैं। लोकसभा चुनाव के प्रदर्शन को विधानसभा क्षेत्रों के लिहाज से देखने पर सपा को 183 और कांग्रेस को 39 क्षेत्रों में बढ़त मिली थी। कांग्रेस इस आंकड़े के जरिए गठबंधन में अपनी हिस्सेदारी को मजबूत करने की कोशिश कर सकती है।
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अखिलेश के सामने दोहरी चुनौती
गठबंधन की बातचीत में अखिलेश यादव के सामने दोहरी चुनौती है। एक ओर कांग्रेस को संतुष्ट रखना होगा, तो दूसरी ओर अपनी पार्टी के उन नेताओं और कार्यकर्ताओं की उम्मीदों का भी ध्यान रखना होगा, जो विधानसभा चुनाव में टिकट की दावेदारी कर रहे हैं।सपा चाहती है कि गठबंधन उसके नेतृत्व और रणनीति के इर्द-गिर्द बना रहे। इसके लिए पार्टी सीटवार चुनावी स्थिति का आकलन कर रही है। गठबंधन में किस दल को कितनी सीटें मिलेंगी, इसका फैसला केवल दावेदारी के आधार पर नहीं, बल्कि जीत की संभावनाओं और स्थानीय राजनीतिक समीकरणों को ध्यान में रखकर करने की कोशिश होगी।
320 सीटों तक की मैपिंग
सपा से जुड़े सूत्रों के मुताबिक, पार्टी की ओर से कराए गए सर्वे और चुनावी आकलन में इस बार करीब 320 सीटों तक की स्थिति स्पष्ट होने की बात सामने आई है। इसमें पिछले चुनाव में जीती गई सीटों के साथ अन्य क्षेत्रों की चुनावी संभावनाओं का भी आकलन शामिल है। पार्टी ने लगभग सभी सीटों की मैपिंग की है।इसी आकलन के आधार पर कांग्रेस के साथ बातचीत 60 से 65 सीटों से शुरू करने की तैयारी है। हालांकि, शुरुआती दावेदारी और अंतिम समझौते में अंतर हो सकता है। सीटों की संख्या के साथ यह भी महत्वपूर्ण होगा कि किन क्षेत्रों में किस दल की स्थिति मजबूत है और कौन-सा प्रत्याशी गठबंधन के लिए अधिक फायदेमंद साबित हो सकता है।
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कम सीटें मिलीं तो बढ़ सकता है असंतोष
सपा के सामने सबसे पेचीदा सवाल अपने ही दावेदारों को लेकर है। चुनाव से पहले कई विधानसभा क्षेत्रों में पार्टी नेताओं ने टिकट के लिए अपनी दावेदारी पेश कर दी है। ऐसे में यदि किसी सीट पर कांग्रेस को चुनाव लड़ने का मौका दिया जाता है, तो वहां सपा के स्थानीय नेताओं और कार्यकर्ताओं में असंतोष उभर सकता है। दूसरी ओर, कांग्रेस को यदि बहुत कम सीटें मिलती हैं, तो उसके कार्यकर्ताओं के बीच यह संदेश जा सकता है कि गठबंधन में पार्टी की भूमिका सीमित रखी जा रही है। इससे दोनों दलों के बीच सीटों के बंटवारे पर सहमति बनाना चुनौतीपूर्ण हो सकता है।
इसी कारण बातचीत में कुछ सीटों की अदला-बदली या प्रत्याशी की स्थिति के आधार पर समझौते की संभावना भी बनी रह सकती है। अब देखना होगा कि सपा और कांग्रेस अपने-अपने राजनीतिक हितों, चुनावी संभावनाओं और कार्यकर्ताओं की अपेक्षाओं के बीच संतुलन बनाकर गठबंधन की गांठ कैसे खोलते हैं।
