उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) ने संगठन में जातीय समीकरण साधने की कवायद तेज कर दी है। BJP ने प्रदेश की 403 विधानसभा सीटों के लिए प्रभारियों की सूची जारी की है। इस सूची में 128 ब्राह्मणों को जिम्मेदारी दिए जाने की चर्चा है। ठाकुर, वैश्य, भूमिहार और कायस्थ समाज के लोगों को भी जगह मिली है। वहीं, पिछड़े और दलित वर्गों की भागीदारी अपेक्षाकृत कम होने का सवाल उठ रहा है। विधानसभा प्रभारियों की नियुक्तियों को सवर्ण मतदाताओं के बीच अपनी पकड़ मजबूत करने और संगठन में सामाजिक संतुलन साधने की रणनीति से जोड़कर देखा जा रहा है।
बीजेपी की इस सूची में ब्राह्मण समाज को प्रमुखता मिलने के राजनीतिक मायने निकाले जा रहे हैं। आरक्षण, विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के दिशा-निर्देशों और दूसरे मुद्दों को लेकर सवर्ण समाज के एक हिस्से में नाराजगी की चर्चाओं के बीच पार्टी का यह कदम महत्वपूर्ण माना जा रहा है। बीजेपी के सामने चुनौती है कि वह अपने परंपरागत सवर्ण समर्थकों को साथ बनाए रखते हुए पिछड़े और दलित वर्गों के बीच भी अपनी राजनीतिक पकड़ कमजोर न होने दे।
प्रदेश की राजनीति में ब्राह्मण मतदाताओं की भूमिका कई विधानसभा क्षेत्रों में महत्वपूर्ण रही है। ऐसे में संगठन में उन्हें जिम्मेदारी देना पार्टी की सामाजिक रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है। हालांकि, नियुक्तियों के आधार पर यह नहीं कहा जा सकता कि पूरा ब्राह्मण समाज या कोई दूसरा वर्ग किसी पार्टी से नाराज है। मतदाताओं का रुख स्थानीय मुद्दों, उम्मीदवारों और सरकार के कामकाज से भी प्रभावित होता है। विधानसभा प्रभारियों में सबसे ज्यादा पूर्व जिला पदाधिकारियों को जिम्मेदारी दी गई है। सूची में केवल एक पूर्व विधायक मुंशीलाल गौतम को शामिल किया गया है, जिन्हें जेवर विधानसभा क्षेत्र की जिम्मेदारी सौंपी गई है। इससे संकेत मिलता है कि पार्टी ने संगठनात्मक अनुभव रखने वाले पदाधिकारियों पर भी भरोसा जताया है।
अवध में 35 ब्राह्मण, गोरखपुर में 24 को जिम्मेदारी
बीजेपी ने संगठन की दृष्टि से उत्तर प्रदेश को छह क्षेत्रों और 98 संगठनात्मक जिलों में बांटा है। क्षेत्रवार विधानसभा प्रभारियों की सूची में जातीय प्रतिनिधित्व की अलग-अलग तस्वीर सामने आई है।अवध क्षेत्र की 82 विधानसभा सीटों में 35 ब्राह्मण और 17 क्षत्रिय समाज के लोगों को प्रभारी बनाए जाने का उल्लेख है। इसी क्षेत्र में राजधानी लखनऊ भी आती है।
वहीं, गोरखपुर क्षेत्र की 62 विधानसभा सीटों में 24 ब्राह्मण और 15 क्षत्रिय समाज के लोगों को जिम्मेदारी दिए जाने की जानकारी है।काशी क्षेत्र की 71 विधानसभा सीटों में 21 सीटों पर ब्राह्मण समाज के लोगों को प्रभारी बनाया गया है। यहां ठाकुर समाज को नौ और अन्य पिछड़ा वर्ग को 11 सीटों की जिम्मेदारी दिए जाने का भी उल्लेख है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का लोकसभा क्षेत्र वाराणसी इसी क्षेत्र में आता है, इसलिए काशी का राजनीतिक महत्व अलग है।
ब्रज क्षेत्र की 65 विधानसभा सीटों में 18 पदों पर ब्राह्मण समाज के लोगों को जिम्मेदारी दी गई है। इसके अलावा 10 क्षत्रिय, छह जाट और पांच लोध समाज के लोगों को प्रभारी बनाए जाने की जानकारी सामने आई है। मथुरा-वृंदावन, बरेली, आगरा और कन्नौज जैसे राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण क्षेत्रों पर नजर रखने में ब्रज की भूमिका अहम है।
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पश्चिमी यूपी में जाट, गुर्जर और क्षत्रिय समीकरण पर जोर
पश्चिमी उत्तर प्रदेश में बीजेपी की रणनीति की तस्वीर कुछ अलग दिखाई देती है। यहां जाट, गुर्जर, क्षत्रिय, ब्राह्मण, दलित और मुस्लिम मतदाताओं के समीकरण कई सीटों पर चुनावी नतीजों को प्रभावित करते हैं। पश्चिमी क्षेत्र की 71 विधानसभा सीटों में 13 क्षत्रिय, 12 जाट, नौ गुर्जर, सात वैश्य और चार ब्राह्मण समाज के लोगों को विधानसभा प्रभारी बनाया गया है। इससे स्पष्ट है कि अलग-अलग क्षेत्रों में स्थानीय सामाजिक समीकरणों के हिसाब से प्रतिनिधित्व में अंतर रखा गया है।
पश्चिमी यूपी में किसान राजनीति, स्थानीय नेतृत्व और जातीय समीकरण चुनावी रणनीति के महत्वपूर्ण हिस्से हैं। ऐसे में संगठन में जिम्मेदारियां बांटते समय क्षेत्रीय प्रभाव को ध्यान में रखना पार्टी के लिए अहम हो सकता है। दूसरी ओर, अवध और गोरखपुर में ब्राह्मण समाज को अधिक जिम्मेदारी मिलने के आंकड़े भी चर्चा में हैं।
दलित समीकरण साधने के लिए 98 जिलों में नई नियुक्तियां
विधानसभा प्रभारियों की सूची के अलावा बीजेपी के अनुसूचित जाति मोर्चा ने भी संगठनात्मक स्तर पर नियुक्तियां की हैं। मोर्चा के प्रदेश अध्यक्ष और सांसद अशोक रावत ने 98 संगठनात्मक जिलों के अध्यक्षों की सूची जारी की है।क्षेत्रवार विवरण में पश्चिम क्षेत्र के 19, ब्रज क्षेत्र के 18, कानपुर क्षेत्र के 16, अवध क्षेत्र के 15, काशी क्षेत्र के 16 और गोरखपुर क्षेत्र के 14 जिलाध्यक्षों का उल्लेख है। इनकी कुल संख्या 98 है।जातीय प्रतिनिधित्व के लिहाज से पश्चिम क्षेत्र में वाल्मीकि और जाटव समाज को जगह दी गई है। ब्रज क्षेत्र में दिवाकर और कठेरिया समाज के लोगों को जिम्मेदारी मिलने की जानकारी है। काशी क्षेत्र में कोरी, पासी और सोनकर समाज के प्रतिनिधियों को स्थान दिया गया है। गोरखपुर क्षेत्र में पासवान समाज के लोगों को भी जिम्मेदारी सौंपी गई है।
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2027 में जातीय समीकरणों की होगी असली परीक्षा
उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले बीजेपी के सामने संगठन को मजबूत करने के साथ सामाजिक संतुलन बनाए रखने की चुनौती है। पार्टी जहां ब्राह्मण और अन्य सवर्ण वर्गों को प्रतिनिधित्व देने का संदेश दे रही है, वहीं दलित और पिछड़े वर्गों में भी अपनी पकड़ बनाए रखना चाहती है।दूसरी ओर, समाजवादी पार्टी अपने पीडीए यानी पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक समीकरण पर जोर देती रही है। ऐसे में बीजेपी की संगठनात्मक नियुक्तियों को विपक्ष की सामाजिक रणनीति के मुकाबले भी देखा जा रहा है।
हालांकि, विधानसभा प्रभारियों की सूची और जातिवार प्रतिनिधित्व अपने आप में चुनावी जीत की गारंटी नहीं है। टिकट वितरण, स्थानीय नेताओं के बीच तालमेल, उम्मीदवारों की स्वीकार्यता, विकास के मुद्दे और सरकार के कामकाज का असर भी चुनाव में निर्णायक होगा। अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि बीजेपी संगठन में जातीय प्रतिनिधित्व के इस दांव को 2027 के चुनाव में वोटों में कितना बदल पाती है।
