समाजवादी पार्टी ने 2027 विधानसभा चुनाव के लिए अपनी चुनावी रणनीति का पहला बड़ा खाका तैयार करना शुरू कर दिया है। पार्टी सूत्रों के मुताबिक 2022 में बेहद कम अंतर से हारने वाली करीब 27 विधानसभा सीटों को 'मिशन विजयपथ' का हिस्सा बनाया गया है। इतना ही नहीं, इनमें से अधिकांश सीटों पर समाजवादी पार्टी पुराने प्रत्याशियों को ही दोबारा मौका देने के पक्ष में दिखाई दे रही है।

समाजवादी पार्टी का तर्क है कि चुनाव में बने जनाधार का फायदा उठाया जा सके। लोकसभा चुनाव 2024 में मिले बेहतर नतीजों के बाद समाजवादी पार्टी नेतृत्व का मानना है कि जिन सीटों पर 2022 में जीत कुछ 100 या कुछ हजार वोटों से फिसल गई थी, वहां मजबूत बूथ प्रबंधन और सामाजिक समीकरणों के जरिए नतीजे बदले जा सकते हैं।

किन सीटों पर रहेगा फोकस?

2022 में समाजवादी पार्टी को कई सीटों पर बेहद करीबी हार का सामना करना पड़ा था। आइए इन सीटों के बारे में जानते हैं-

  • धामपुर: नईम उल हसन – हार का अंतर 203 वोट
  • कुर्सी: राकेश वर्मा – हार का अंतर 217 वोट
  • नकुड़: धर्म सिंह सैनी – हार का अंतर करीब 315 वोट
  • अलीगंज: हार का अंतर लगभग 3 हजार वोट के आसमाजवादी पार्टीस
  • छिबरामऊ: हार का अंतर करीब 2 से 3 हजार वोट के बीच
  • शाहगंज: हार का अंतर 1000 वोट से कम
  • बहराइच: हार का अंतर 5 हजार वोट से कम
  • मुरादाबाद नगर: हार का अंतर 5 हजार वोट से कम
  • मड़ियाहूं: हार का अंतर 5 हजार वोट से कम
  • मधुबन: हार का अंतर 5 हजार वोट से कम
  • तिर्वा: हार का अंतर 5 हजार वोट से कम
  • सुल्तानपुर: हार का अंतर 5 हजार वोट से कम


औराई, फरीदपुर, जलालाबाद, बिंदकी, जलेसर, कटरा, मानिकपुर, मोहम्मदी, फूलपुर, सलोन, श्रावस्ती, सीतापुर, इटावा समेत कई सीटें ऐसी थीं जहां समाजवादी पार्टी जीत के बेहद करीब पहुंचकर रह गई थी।

 

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पुराने प्रत्याशियों पर क्यों भरोसा?

पार्टी का मानना है कि जिन प्रत्याशियों ने हार के बावजूद मजबूत वोट हासिल किए थे, उन्हें बदलने से संगठनात्मक नुकसान हो सकता है। इसलिए अधिकांश सीटों पर पुराने उम्मीदवारों को क्षेत्र में सक्रिय रहने का निर्देश दिया गया है। कई सीटों पर संभावित उम्मीदवारों ने अभी से जनसंपर्क अभियान भी शुरू कर दिया है। समाजवादी पार्टी नेतृत्व को लगता है कि 2024 लोकसभा चुनाव में PDA (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) फॉर्मूले का असर देखने को मिला था। अब इसी सामाजिक गठजोड़ को विधानसभा चुनाव तक मजबूत बनाए रखने की तैयारी है। पार्टी विशेष रूप से गैर-यादव पिछड़ों, दलितों और युवाओं पर फोकस बढ़ा रही है।

 

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बूथ से निकलेगा विजय का रास्ता

सूत्रों के मुताबिक जिन सीटों पर हार का अंतर 500 से 3000 वोट के बीच रहा, वहां बूथवार समीक्षा कराई जा रही है। यह देखा जा रहा है कि किन बूथों पर अपेक्षा से कम मतदान हुआ और किन सामाजिक समूहों का समर्थन पूरी तरह नहीं मिल पाया। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि उत्तर प्रदेश में सरकार बनाने और विपक्ष में बैठने के बीच अक्सर 20-30 सीटों का अंतर ही निर्णायक साबित होता है। 

ऐसे में 2022 में समाजवादी पार्टी का आकलन साफ है, नई सीटें जीतने से पहले उन सीटों को वापस हासिल करना जरूरी है, जहां 2022 में साइकिल जीत के दरवाजे तक पहुंचकर रुक गई थी। यही वजह है कि अखिलेश यादव का सबसे बड़ा मिशन अब उन 27 सीटों पर केंद्रित होता दिखाई दे रहा है, जहां कुछ सौ वोटों ने सत्ता का सपना अधूरा छोड़ दिया था।