उत्तराखंड कांग्रेस में चल रही अंदरूनी खींचतान अब खुलकर सामने आ गई है। पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत ने पार्टी की चेतावनी के बावजूद 5 अक्टूबर को कुमाऊं में अपनी 'धन्यवाद एवं जनसंवाद यात्रा' जारी रखने की बात कही। वह जसपुर से हल्द्वानी तक यात्रा निकाल रहे है। उत्तराखंड कांग्रेस की प्रभारी कुमारी सैलजा ने रावत को यह यात्रा रद्द करने की सलाह दी थी। कांग्रेस हाईकमान ने इस बारे में कड़े शब्दों में एक पत्र भी जारी किया है। पत्र में हरीश रावत के इस कार्यक्रम पर आपत्ति जताई गई है। पार्टी का कहना है कि यह 'निजी' जनसंपर्क कार्यक्रम है, जो पार्टी संगठन के बाहर आयोजित किया जा रहा है।


पहाड़ में हरीश रावत को प्यार से 'हरदा' कहा जाता है। हाईकमान के पत्र के बाद भी उन्होंने कार्यक्रम टालने की घोषणा नहीं की। अपना रुख उन्होंने सोशल मीडिया पोस्ट के जरिए साफ किया। हरीश रावत ने लिखा कि चुनौती बड़ी है लेकिन उत्तराखंड के स्वाभिमान के लिए संकल्प भी दृढ़ है। उन्होंने कहा कि यात्रा के इस चरण में अब रुकना नहीं है। उनके मुताबिक राज्य में बदलाव लाना है और कांग्रेस की वापसी करानी है। उन्होंने लोगों से जसपुर से हल्द्वानी तक साथ आने और देवभूमि के हक की लड़ाई आगे बढ़ाने की अपील की।

हरीश रावत, नेता, कांग्रेस:-
हजारों लोग अपना काम-धंधा छोड़कर दिल्ली और गुड़गांव में मुझसे मिलने के लिए आए। मैंने ईडी और बीजेपी की ललकार,फुंकार जो भी कहिए, उसको भी स्वीकार किया और साथ-साथ इस धरती के प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करने के लिए मैंने धन्यवाद जनसंवाद प्रारम्भ किया। आपकी भागीदारी ने मुझे दिखा दिया है कि ईडी हो या सीबीआई, उनसे जूझने के लिए मैं अकेला नहीं हूं। आप जिस प्रकार मेरी बीमारी में मेरे साथ खड़े थे, आज ईडी और सीबीआई से लड़ने में भी आप मेरे साथ खड़े हैं। 

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क्यों यात्रा निकाल रहे हैं हरीश रावत?

हरीश रावत कह रहे हैं कि वह कांग्रेस के झंडे तले यात्रा शुरू कर रहे हैं। उनका कहना है कि द्वारिकेश शुगर मिल के गेस्ट हाउस में सोते समय उन्हें एक पुराना सर्वोदय गीत याद आया। गीत की पंक्ति थी, 'उठो दगड़ियो, मुचाल जलाओ।' गढ़वाली में भी यही शब्द हैं। उन्होंने बेरोजगारी, नशे, बढ़ती असहिष्णुता, अपराध और महिलाओं के खिलाफ अत्याचार की घटनाओं का जिक्र किया। उन्होंने लिखा कि इस गीत की याद भर से उनका आत्मविश्वास बढ़ गया।

हरीश रावत और मल्लिकार्जुन खड़गे। 

हरीश रावत, नेता, कांग्रेस:-
संघर्षपूर्ण स्थितियों में जो साथी मेरे साथ खड़े रहे हैं, वे इस यात्रा में भी अपना काम-धाम छोड़कर इस धन्यवाद यात्रा में भी सम्मिलित हो रहे हैं।
मैं पूरा मेदांता का मेडिकल सर्किल जानता है कि कितनी संघर्षपूर्ण बीमारी से मैं उभर पाया हूं। डॉक्टर अभी और डेढ़ महीने का आराम आराम करूं, ये चाहते थे। मगर ईडी और बीजेपी ने ललकार दिया। अब ललकार हो, हरीश रावत यदि अत्यधिक रुग्णावस्था में भी होता तो भी इस ललकार के बाद घर पर चुप नहीं बैठ सकता था। फिर इस रुग्णता से उभरने में उत्तराखंड की धरती, इसके बेटों और बेटियों की सद्भावनाएं, देवी-देवताओं का आशीर्वाद एक प्रमुख प्रेरक रहा है।

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संगठन से बाहर रखे हैं गए हैं हरीश रावत

हरीश रावत, संगठन का हिस्सा नहीं हैं। चुनाव से करीब एक साल पहले कांग्रेस ने उन्हें चुनावी टीम से बाहर रखा है। ऐसे में यात्रा जारी रखने के उनके फैसले से कांग्रेस नेतृत्व की नाराजगी और बढ़ गई है। पार्टी संगठन की ओर से तय कार्यक्रमों के समानांतर हरीश रावत के कार्यक्रम करने से यह खींचतान दिल्ली में केंद्रीय नेतृत्व तक पहुंच गई है। उत्तराखंड कांग्रेस के दूसरे गुट हरीश रावत के इस अकेले राजनीतिक कदम को अपनी राजनीतिक तैयारियों के लिए झटका मानते हैं। हरीश रावत के समर्थकों का कहना है कि यह जनसंपर्क अभियान कांग्रेस के बड़े हित में चलाया जा रहा है। कांग्रेस के इस भीतरी टकराव की चर्चा देशभर में है। 

राहुल गांधी और हरीश रावत। तस्वीर 2017 की है। 

हरीश रावत 'बाहरियों' को खटक क्यों रहे हैं?

न कुमारी सैलजा उत्तराखंड से हैं, न ही कांग्रेस महासचिव केसी वेणुगोपाल। उत्तराखंड कांग्रेस अध्यक्ष गणेश गोदियाल, एक जमाने में हरीश रावत के करीबी रहे गणेश गोदियाल भी अब उनसे किनारा कर रहे हैं। उत्तराखंड की राजनीति पर नजर रखने वाले विश्लेषकों का दावा है कि हरीश रावत पार्टी पद छोड़कर भी कांग्रेस के सबसे अहम चेहरे बने हुए हैं। उनके बेटे वीरेंद्र रावत और आनंद रावत कांग्रेस में ही हैं और अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं के बारे में बात कर चुके हैं। हरीश रावत, कांग्रेस के सबसे लोकप्रिय नेताओं में शुमार हैं, यह बात, उनके धुर विरोधी भी मानते हैं। 

 

सियासी जानकारों का कहना है कि उत्तराखंड कांग्रेस में भले ही हरीश रावत के पास भले ही प्रदेश अध्यक्ष या नेता प्रतिपक्ष जैसा कोई औपचारिक पद न हो, लेकिन जमीनी स्तर पर उनका राजनीतिक प्रभाव किसी भी पद से कहीं बड़ा है। कुमाऊं से लेकर गढ़वाल तक कार्यकर्ताओं में उनकी सीधी पैठ है। वह लगातार आम जनता के साथ संपर्क में बने हैं और उन इलाकों में भी घूम-घूमकर मिलते रहे हैं, जिन्हें उत्तराखंड में दुर्गम कहा जाता है। 

 

आम जनता के बीच उनकी स्वाभाविक स्वीकार्यता आज भी बरकरार है। यही वजह है कि चुनावी चेहरा घोषित न होने के बावजूद राज्य में कांग्रेस की राजनीति उन्हीं के इर्द-गिर्द घूमती है। पार्टी में अपनी जगह तलाश रहे लोगों को लगता है कि जब तक हरीश रावत हैं, कांग्रेस में उनका कद बहुत आगे नहीं बढ़ सकता है। अगर हरीश रावत सक्रिय राजनीति से हटते हैं तो वीरेंद्र रावत और आनंद रावत उनकी जगह ले सकते हैं। 

हरीश रावत का हर अंदाज, सुर्खियों में है। 

सारा खेल टिकट बंटवारे का है?

हरीश रावत संगठन पदाधिकारी नहीं हैं लेकिन उनके करीबियों को टिकट मिलता रहा है। वह अपने बेटों को चुनाव लड़ाना चाहत हैं। दूसरी पार्टियों से आकर कांग्रेस में शामिल हुए नेताओं को भी वह खटकते हैं। संगठन और टिकट वितरण पर हरीश रावत का अघोषित नियंत्रण एक जमाने तक रहा है। उनकी पदयात्राओं से एक बार फिर कांग्रेस की नई कार्यसमिति डरी है। 

गणेश गोदियाल नहीं, हरीश रावत ही चर्चा में हैं?

हरीश रावत अपनी उम्र के 8वें दशक में पहुंचने वाले हैं। वह राजनीतिक तौर पर सक्रिय हैं। वह हर दिन सोशल मीडिया पर आते हैं, पोस्ट करते हैं, जनसभाएं करते हैं और लोगों से मिलते-जुलते नजर आ रहे है। जब ईडी ने सितंबर में हरीश रावत के करीबी निजी सचिव और पूर्व ओएसडी चंदन सिंह जीना के घर रेड डाली थी तब उन्होंने कांग्रेस में सभी पदों को छोड़ दिया था। कथित भ्रष्टाचार के मामले में जब ईडी ने उन्हें तलब किया तो वह गले में मां की तस्वीर टांगकर पहुंचे। दिन भर वही सुर्खियों में रहे। 

 

कांग्रेस की प्रदेश कार्यकारी समिति को लगता है कि उनके आने से संगठन में जो शक्ति संतुलन बनना चाहिए था, वह हरीश रावत के समर्थकों के रहते होना मुश्किल है। कोई भी बाहरी नेता जब खुद को अगले नेतृत्व के रूप में स्थापित करने की कोशिश करता है, हरीश रावत का जनाधार, उनकी राह का सबसे बड़ा रोड़ा बन जाता है। 

प्रियंका गांधी वाड्रा के साथ हरीश रावत। 

हरीश रावत की लोकप्रियता से कांग्रेस को डर है?

राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि हरीश रावत, कांग्रेस के प्रतिबद्ध नेता रहे हैं। वह साफ कह चुके हैं कि उन्होंने पद छोड़ा है, पार्टी के प्रति अपनी जिम्मेदारी नहीं। प्रियंका गांधी से लेकर राहुल गांधी तक, हरीश रावत के साथ किसी के रिश्ते तल्ख नहीं हैं। अलग बात है कि प्रदेश की प्रभारी बनाई गईं सैलजा कुमारी को हरीश रावत खटकते हैं। उनकी आलाकमान तक पहुंच, कुमारी सैलजा की उत्तराखंड में पकड़ कमजोर कर सकती है। केंद्रीय नेतृत्व जब भी राज्य में संतुलन साधने के लिए नए चेहरों को आगे बढ़ाने का प्रयास करता है, चुनावी रैलियों और कार्यकर्ताओं को लामबंद करने के लिए उसे हरीश रावत के अनुभव और भीड़ खींचने की क्षमता का ही सहारा लेना पड़ता है। हरीश रावत की यही सक्रियता, पार्टी को डराती है।