इस साल 15 जून को ज्योतिषीय गणना के अनुसार मिथुन संक्रांति है। इस दिन सूर्य देव मिथुन राशि में गोचर करेंगे। इसी अवसर पर ओडिशा में रज पर्व मनाया जाएगा। यह पर्व तीन दिनों तक मनाया जाता है। इस साल यह पर्व 14 जून से लेकर 16 जून तक मनाया जाएगा।जहां एक तरफ मिथुन संक्रांति के दिन सूर्य देव को जल अर्पित करने की परंपरा है ताकि उनकी कृपा भक्तों पर बनी रहे, वहीं ओडिशा में इस दिन धरती मां की आराधना की जाती है। रज त्योहार नारीत्व से जुड़ी परंपराओं का उत्सव मनाया जाता है।
रज त्योहार में ओडिशा के लोग धरती मां को विश्राम देते हैं। इन तीन दिनों तक किसान खेती-बाड़ी का काम नहीं करते हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस पर्व में धरती मां की पूजा करना बेहद शुभ माना जाता है। इसी कारण लोग इन दिनों धरती की पूजा-अर्चना करते हैं। अब सवाल उठता है कि इस पर्व में धरती मां को क्यों आराम दिया जाता है?
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रज पर्व में धरती मां को क्यों दिया जाता है विश्राम?
धार्मिक मान्यताओं के मुताबिक, इन तीन दिनों में भूदेवी मां के रजस्वला होने का प्रतीकात्मक रूप से सम्मान किया जाता है। माना जाता है कि धरती दुनिया के सभी जीवों का पालन-पोषण करती है। धार्मिक मान्यता के अनुसार जिस प्रकार महिलाओं को मासिक धर्म होता है, उसी प्रकार रज त्योहार के दौरान धरती मां भी रजस्वला होती हैं। इसी वजह से तीन दिनों तक खेती नहीं की जाती, ताकि धरती मां को विश्राम मिल सके।
रज पर्व के दौरान ओडिशा की महिलाओं को भी घर के कामकाज से राहत दी जाती है ताकि वे आराम कर सकें। इन तीन दिनों तक सभी लोग मिलकर उत्सव मनाते हैं। कई गांवों में झूले लगाए जाते हैं और महिलाएं झूला झूलती हैं। इसके अलावा लोग अपने-अपने घरों में स्वादिष्ट व्यंजनों का आनंद लेते हैं। इस त्योहार में खास तौर पर पोड़ो पीठा और चाकुली पीठा बनाया और खाया जाता है।
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मानसून का प्रतीक
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार मिथुन संक्रांति को मानसून के आगमन का प्रतीक भी माना जाता है। चिलचिलाती धूप और भीषण गर्मी के बाद बारिश का मौसम शुरू होता है। वर्षा धरती को भिगोकर नई फसल के लिए तैयार करती है। इसी वजह से किसान अपने खेतों को तीन दिनों तक आराम देते हैं ताकि भूमि नई फसल के लिए तैयार हो सके।
नोट: इस खबर में दी गई जानकारी धार्मिक मान्यताओं और लोक परंपराओं पर आधारित है। इसकी सत्यता और सटीकता की हम पुष्टि नहीं करते हैं।
