सनातन धर्म में जितना पूजा-पाठ को अहम माना जाता है, उतना ही भगवान को चढ़ाए हुए भोग को खास माना जाता है। धार्मिक जानकारों के अनुसार, व्यक्ति को भगवान की पूजा-अर्चना और भोग चढ़ाना चाहिए, उसके बाद ही भोजन खाना चाहिए। इसी के साथ माना जाता है कि व्यक्ति को भोग का प्रसाद पहले खुद नहीं खाना चाहिए, बल्कि दूसरों को पहले प्रसाद बांटना चाहिए। यही परंपरा आज के दौर में कई लोग अपनाते हैं। इस परंपरा के पीछे की वजह बेहद खास है, जो हर व्यक्ति को जानना चाहिए।

 

धार्मिक जानकारों के अनुसार, व्यक्ति को हर दिन भगवान के समक्ष भोग लगाना चाहिए, ताकि व्यक्ति पर भगवान का आशीर्वाद बना रहे। धार्मिक मान्यता के अनुसार, व्यक्ति को शुद्ध आहार ही भोग में चढ़ाना चाहिए। इसके अलावा, अथर्ववेद में साफ तौर पर बताया गया है कि व्यक्ति को हमेशा भोग चढ़ाने के बाद ही भोजन ग्रहण करना चाहिए। अब सवाल उठता है कि व्यक्ति को पहले दूसरों को प्रसाद क्यों बांटना चाहिए। आइए जानते हैं।

 

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प्रसाद पहले खुद क्यों न खाएं?

सनातन धर्म में माना जाता है कि व्यक्ति को पहले भगवान को भोग चढ़ाना चाहिए, उसके बाद ही भोजन खाना चाहिए। दूसरी खास बात यह मानी जाती है कि व्यक्ति को प्रसाद पहले दूसरों को बांटना चाहिए, उसके बाद प्रसाद खाना चाहिए। इस सिलसिले में धर्म ग्रंथों में बेहद खास बातें बताई गई हैं।

 

सनातन धर्म के बेहद खास भगवद्गीता में बताया गया है कि जो लोग यज्ञ यानी भगवान को भोग चढ़ाने के बाद खाते हैं, वे लोग सभी पापों से मुक्त हो जाते हैं। इसके अलावा, जो लोग केवल खुद भोजन खाते हैं, वे केवल पाप ही खाते हैं। इसका मतलब साफ है कि व्यक्ति को देवी-देवताओं को भोग अर्पित किए बगैर खुद नहीं खाना चाहिए। भोजन पहले भगवान का है, फिर हमारा है।

 

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यज्ञशिष्टाशिनः सन्तो मुच्यन्ते सर्वकिल्बिषैः।
भुञ्जते ते त्वघं पापा ये पचन्त्यात्मकारणात्॥

 

इस श्लोक के जरिए बताया गया है कि व्यक्ति को पहले भगवान को भोग चढ़ाना चाहिए, उसके बाद ही खुद भोजन खाना चाहिए। इस श्लोक का मतलब साफ है कि व्यक्ति को भोजन बांटकर खाना चाहिए। इसी आधार पर माना जाता है कि व्यक्ति को प्रसाद भी पहले दूसरों को बांटना चाहिए, फिर खुद खाना चाहिए।

प्रसाद पहले खुद खाना है गलत

हिंदू धर्म के ऋग्वेद और मनुस्मृति में भोजन और प्रसाद खाने को लेकर अहम बातें बताई गई हैं। ऋग्वेद में बताया गया है कि व्यक्ति को अकेले नहीं खाना चाहिए, बल्कि भोजन को दूसरों में बांटकर खाना चाहिए। इसी सिलसिले में ऋग्वेद में कहा गया है कि व्यक्ति अकेले खाता है, वह केवल पाप खाता है। इसी भाव से प्रसाद बांटने का भाव आया है। इसी वजह से व्यक्ति प्रसाद खाने से पहले उसे दूसरों में बांटता है।