भारत में इन दिनों फ्रेंचाइजी टी20 लीग्स की धूम है। दिल्ली प्रीमियर लीग (DPL) और उत्तर प्रदेश टी20 लीग अभी-अभी खत्म हुआ है, जबकि शेर-ए-पंजाब टी20 लीग और देहरादून टी20 लीग जारी है। ओडिशा की लीग भी जल्द ही शुरू होने वाली है। इंडियन प्रीमियर लीग ( IPL ) की तर्ज पर हो रही इन लीग्स की शुरुआत सबसे पहले तमिलनाडु से हुई थी।
तमिलनाडु क्रिकेट एसोसिएशन (TNCA) ने 2016 में TNPL लॉन्च किया था। तब स्टार स्पोर्ट्स नेटवर्क TNPL का ब्रॉडकास्टिंग प्रार्टनर था। TNPL को देखकर कर्नाटक ने भी अपनी टी20 लीग शुरू की। मुंबई, महाराष्ट्र, विदर्भ और बंगाल जैसे मजबूत क्रिकेट एसोसिएशन भी अपनी लीग टी20 है।
पंजाब क्रिकेट एसोसिएशन ने भी अपनी टी20 लीग इसी साल शुरू की है। देखा जाए तो अब लगभग हर क्रिकेट एसोसिशन की अपनी फ्रेंचाइजी लीग है। ऐसे में बड़ा सवाल है कि इन लीग्स को कराने के लिए पैसे कहां से आते हैं?
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पैसों का ऐसे बनता है जुगाड़
भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड (BCCI) से एफिलिएटेड हर क्रिकेट एसोसिएशन के पास पैसों की कमी नहीं है। उन्हें BCCI से हर साल भारी भरकम रकम मिलती है, जिससे वे अपने क्रिकेट को बेहतर कर सकें। इसी पैसे से घरेलू टी20 लीग्स वजूद में आ रही हैं। स्पॉन्सरशिप की भी बड़ी भूमिका है। क्रिकेट एसोसिएशन्स इसके अलावा फ्रेंचाइजी राइट्स बेचने का भी मॉडल अपना रही हैं, जिससे मोटा पैसा बन रहा है।
2026 में शुरू हुई तेलंगाना की TG20 लीग में फ्रेंचाइजियां 5 साल के लिए बेची गईं और हैदराबाद टीम की सबसे ऊंची बोली लगी। उसकी कीमत 7.5 करोड़ रुपये सालाना रही। दूसरे फ्रेंचाइजी राइट्स भी 6-7 करोड़ रुपये के आसपास गए। हालांकि कुछ क्रिकेट एसोसिएशन्स अपनी लीग को इस मॉडल पर नहीं चला रहे हैं। वे BCCI के पैसे से ही काम चला रहे हैं। ब्रॉडकास्टिंग राइट्स से पैसे नहीं बन रहे हैं।
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टी20 लीग कराने का उद्देश्य क्या है?
क्रिकेट एसोसिएशन्स अपनी टी20 टीम को बेहतर बनाने के लिए फ्रेंचाइजी लीग करा रही हैं। ये लीग्स स्थानीय खिलाड़ियों के लिए सैयद मुश्ताक अली ट्रॉफी की टीम में जगह बनाने का सबसे बड़ा मंच हैं। साथ ही IPL का भी दरवाजा इन्हीं लीग्स से खुल रहा है।
