मध्य प्रदेश के बालाघाट जिले के बैगा आदिवासी बहुल इलाकों में बच्चों की मौत ने स्वास्थ्य और पोषण व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, शनिवार को दो और बच्चों की मौत हुई है। दावा किया जा रहा है कि 18 मई से अब तक बच्चों की मौत का आंकड़ा 28 तक पहुंच गया है लेकिन सरकारी आंकड़े कुछ और ही कह रहे हैं। 

 

सरकारी आंकड़ों के अनुसार अब तक 10 बच्चों की मौत दर्ज की गई है। विपक्ष का आरोप है कि मौतों का वास्तविक आंकड़ा सरकारी आंकड़ों से कहीं अधिक है और सरकार जानकारी छुपा रही है। सवाल यह भी उठ रहा है कि बालाघाट में हो रही बच्चों की मौत के पीछे की वजह क्या है, क्या इसके पीछे टीकाकरण और पोषण की कमी जिम्मेदार है?

 

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बच्चों की मौत की बड़ी वजह

अखिल भारतीय आदिवासी कांग्रेस के अध्यक्ष डॉ. विक्रांत भूरिया ने मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव को 30 अगस्त 2026 को लिखे एक पत्र में दावा किया है कि बालाघाट में बैगा समाज के 26 आदिवासी बच्चों की मौत हो चुकी है। उन्होंने लिखा की कुपोषण, मलेरिया एवं खसरा जैसी बीमारियों से हुई मृत्यु कोई सामान्य घटना नहीं है। यह प्रदेश की स्वास्थ्य व्यवस्था की गंभीर विफलता और सरकारी तंत्र की घोर लापरवाही का परिणाम है।

 

 

पत्र में डॉ. विक्रांत भूरिया ने यह भी लिखा कि बैगा समाज विशेष रूप से कमजोर जनजातीय समूह (PVTG) है। अगर समय पर बच्चों की स्वास्थ्य जांच, टीकाकरण, मलेरिया की रोकथाम और समुचित उपचार सुनिश्चित किया जाता, तो अनेक मासूम जिंदगियां बचाई जा सकती थीं।

नक्सल प्रभावित गांव, इसलिए नहीं पहुंचा इलाज? 

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, इस पूरे मामले पर बालाघाट कलेक्टर कुमार सत्यम ने बताया कि सभी मौतों को हाल की घटना से जोड़कर देखना ठीक नहीं है, क्योंकि इनमें से कुछ मौतें काफी पहले की हैं। कलेक्टर के मुताबिक ज्यादातर प्रभावित गांव नक्सल प्रभावित रहे हैं, जिस वजह से शुरुआत में मरीजों को दवा पहुंचाना और अस्पताल तक ले जाना भी मुश्किल था।

 

आंकड़ों पर नजर डालें तो बालाघाट में 5 साल तक के करीब सवा लाख बच्चों में से 17 प्रतिशत बच्चे कुपोषित या बहुत गंभीर रूप से कुपोषित हैं। जिन इलाकों में मौतें हुई हैं, वहां 36 प्रतिशत बच्चों का विकास तय मानकों से कम है और 33 प्रतिशत बच्चे अपनी उम्र के हिसाब से कम वजन के हैं।  

टीकाकरण और पोषण की कमी बनी वजह?

ICMR कोलकाता और नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ वायरोलॉजी पुणे की जांच में मौतों की वजह मलेरिया और खसरा संक्रमण पाई गई। मीडिया रिपोर्ट्स में सामने आया है कि जिन बच्चों में खसरे का संक्रमण मिला, वे सभी नियमित टीकाकरण से छूटे हुए थे। यानी सीधे तौर पर टीका लगा होता तो यह बीमारी शायद रोकी जा सकती थी। यही बात  डॉ. विक्रांत भूरिया ने भी अपने पत्र में कही है। हालांकि, 20 अगस्त से प्रशासन ने विशेष खसरा-रुबेला टीकाकरण अभियान शुरू कर दिया है। 

 

इसके अलावा, बताया जा रहा है कि जिले के जिन इलाकों में मौतें हुई हैं, वहां 36 प्रतिशत बच्चों का विकास तय मानकों से कम है और 33 प्रतिशत बच्चे अपनी उम्र के हिसाब से कम वजन के हैं। गांव वालों का कहना है कि करीब 6 महीने से पोषण आहार (टेक होम राशन) नहीं मिला था, जिससे बच्चों की रोग-प्रतिरोधक क्षमता और कमजोर हुई है। दोनों साथ मिलकर अब घातक बन रहे हैं। 

 

दरअसल, कुपोषित बच्चों का शरीर पहले से ही कमजोर होता है, ऐसे में जब वही बच्चे टीकाकरण से भी छूट जाएं, तो मलेरिया या खसरे जैसी सामान्य तौर पर रोकी जा सकने वाली बीमारी भी जानलेवा बन जाती है।   

आदिवासी समाज में आक्रोश

बच्चों की मौत को लेकर आदिवासी समाज में गुस्सा है। बालाघाट में जनपद पंचायत के सामने समाज के लोग प्रदर्शन कर रहे हैं और पीड़ित परिवारों को उचित मुआवजा देने और लापरवाह अधिकारियों पर कार्रवाई करने की मांग कर रहे हैं।