हिमाचल प्रदेश की राजधानी शिमला की ग्रामीण राजनीति में भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) ने बड़ा सियासी उलटफेर करते हुए करीब 26 साल बाद जिला परिषद की सत्ता में वापसी कर ली है। जिला परिषद के अध्यक्ष पद पर भूपेंद्र सिंह सिसोदिया और उपाध्यक्ष पद पर भरत सिंह कलांटा के चुने जाने के साथ ही लंबे समय से कांग्रेस के प्रभाव में रही जिला परिषद की कमान बीजेपी के हाथ आ गई है। अध्यक्ष और उपाध्यक्ष के निर्वाचन के बाद बीजेपी समर्थकों ने जमकर नारेबाजी की और जीत का जश्न मनाया। यह जश्न इसलिए भी खास हो गया क्योंकि बीजेपी और कांग्रेस के बीट कांटे की टक्कर थी और निर्दलीय वोटों ने अहम भूमिका निभाई। 

 

शिमला जिला परिषद में कुल 25 सदस्य हैं और अध्यक्ष-उपाध्यक्ष के चुनाव में बहुमत के लिए 13 सदस्यों का समर्थन जरूरी था। 31 मई को आए चुनाव परिणाम में बीजेपी समर्थित उम्मीदवारों ने 11 सीटों पर जीत दर्ज की, जबकि कांग्रेस को 10 सीटें मिलीं और चार सीटों पर अन्य उम्मीदवार विजयी रहे। पिछली जिला परिषद में बीजेपी महज चार सीटों तक सीमित थी, जबकि कांग्रेस के पास 13 सीटें थीं। इस लिहाज से बीजेपी का चार से 11 सीटों तक पहुंचना ही बड़ा राजनीतिक बदलाव माना गया। इसके बाद दो निर्दलीय सदस्यों के समर्थन से बीजेपी समर्थक खेमे की संख्या 13 हो गई। यही संख्या अध्यक्ष पद के लिए जरूरी बहुमत थी। अगस्त में बीजेपी ने 13 समर्थित सदस्यों के साथ शक्ति प्रदर्शन भी किया था और दावा किया था कि उसके पास स्पष्ट बहुमत है। 

 

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  • कुल जिला परिषद वार्ड: 25
  • बहुमत का आंकड़ा: 13
  • बीजेपी: 11 सीटें
  • कांग्रेस: 10 सीटें
  • अन्य: 4 सीटें
  • बीजेपी समर्थित संख्या: 13
  • अध्यक्ष: भूपेंद्र सिंह सिसोदिया
  • उपाध्यक्ष: भरत सिंह कलांटा

100 दिन से ज्यादा चला सत्ता का संग्राम

इस बार जिला परिषद के अध्यक्ष और उपाध्यक्ष का चुनाव आसान नहीं रहा। चुनाव परिणाम 31 मई को आने के बाद भी करीब 102 दिन तक दोनों पद खाली रहे। इस दौरान बीजेपी और कांग्रेस के बीच निर्दलीय सदस्यों को अपने पक्ष में करने को लेकर सियासी खींचतान चलती रही। दोनों दल अपने-अपने बहुमत के दावे करते रहे। बीजेपी समर्थित 13 जिला परिषद सदस्यों ने चुनाव में देरी को लेकर हाईकोर्ट का दरवाजा भी खटखटाया था। अदालत में दाखिल याचिका में चुनाव प्रक्रिया में देरी का मुद्दा उठाया गया। 

चुनाव टलने से भी बढ़ा सियासी तापमान

अध्यक्ष और उपाध्यक्ष के चुनाव के लिए पहले भी बैठक बुलाई गई थी, लेकिन पर्याप्त सदस्य उपस्थित नहीं होने के कारण प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ सकी। इसके बाद बीजेपी ने प्रशासन पर चुनाव टालने का आरोप लगाया, जबकि कांग्रेस ने भी अपने पक्ष में पर्याप्त समर्थन होने का दावा किया। अगस्त में बीजेपी अपने समर्थित जिला परिषद सदस्यों को हरियाणा ले गई थी, जिसे संभावित जोड़तोड़ से बचाने की रणनीति के तौर पर देखा गया। 

कांग्रेस के गढ़ में बीजेपी का बड़ा संदेश

शिमला जिला परिषद पर बीजेपी की यह जीत इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि जिला परिषद की राजनीति में लंबे समय से कांग्रेस का प्रभाव रहा है। 2021 के चुनाव में शिमला की 24 सीटों में बीजेपी को सिर्फ चार सीटें मिली थीं, जबकि कांग्रेस ने 12 सीटें जीती थीं। 2026 में बीजेपी का आंकड़ा 11 तक पहुंचना और फिर निर्दलीय समर्थन से सत्ता हासिल करना उसके संगठनात्मक विस्तार का संकेत माना जा रहा है। 

 

खास बात यह है कि बीजेपी ने ग्रामीण शिमला के उन इलाकों में भी अपना प्रभाव बढ़ाया है, जहां पारंपरिक तौर पर कांग्रेस मजबूत मानी जाती रही है। झाकड़ी, बगलती, क्वार, खशधार, भलूण, चंदलोग-नेरूवा, गोरली-मड़ावग, टियाली, चमियाणा, खटनोल और कुमारसैन जैसे वार्डों में बीजेपी समर्थित उम्मीदवारों ने जीत दर्ज की। 

2027 विधानसभा चुनाव से पहले सियासी संकेत

जिला परिषद के इस परिणाम को आगामी विधानसभा चुनाव की दृष्टि से भी अहम माना जा रहा है। जिला परिषद चुनावों को पहले ही विधानसभा चुनाव से पहले का ‘सेमीफाइनल’ बताया जा रहा था। ऐसे में शिमला में बीजेपी का सत्ता पर काबिज होना कांग्रेस के लिए संगठनात्मक स्तर पर चुनौती माना जा सकता है। 

 

हालांकि, जिला परिषद चुनाव सीधे तौर पर विधानसभा चुनाव का परिणाम तय नहीं करते, लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों में पार्टी के संगठन, स्थानीय नेतृत्व और कार्यकर्ताओं के मनोबल के लिहाज से इनका खास महत्व होता है। बीजेपी के लिए शिमला जिला परिषद पर कब्जा इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे पार्टी को आगामी विधानसभा चुनाव से पहले एक बड़ा मनोवैज्ञानिक बढ़ावा मिला है।

 

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सियासत का नया संदेश

बीजेपी की इस जीत का सबसे बड़ा संदेश यही है कि शिमला की ग्रामीण राजनीति में सत्ता का समीकरण बदल रहा है। चार सीटों से 11 सीटों तक पहुंचने और फिर निर्दलीय सदस्यों के समर्थन से 13 का बहुमत जुटाकर अध्यक्ष और उपाध्यक्ष दोनों पद हासिल करना बीजेपी के लिए महज स्थानीय निकाय की जीत नहीं, बल्कि संगठनात्मक मजबूती का प्रदर्शन भी है।

अब निगाहें इस बात पर रहेंगी कि जिला परिषद की नई बीजेपी समर्थित टीम ग्रामीण क्षेत्रों में विकास, सड़क, पेयजल, स्वास्थ्य, शिक्षा और पर्यटन से जुड़े मुद्दों को किस तरह प्राथमिकता देती है और इसका राजनीतिक लाभ आगामी विधानसभा चुनाव में पार्टी कितना उठा पाती है।