बिहार के पटना में मीठापुर इलाके से पुलिस की स्पेशल विजिलेंस यूनिट (SVU) ने एक आदमी को पकड़ा है। पुलिस का कहना है कि यह आदमी इस पूरे घोटाले का सबसे बड़ा राजदार है। वह कोई मामूली कर्मचारी नहीं था बल्कि पिछले 15 सालों से टेंडर माफिया के पूरे नेटवर्क को संभाल रहा था और पैसों का लेन-देन देखता था। वह एक बड़े टेंडर कारोबारी की कई फर्जी कंपनियों में कागजी डायरेक्टर भी बना हुआ था। इस मैनेजर का पकड़ा जाना बहुत बड़ी कामयाबी माना जा रहा है क्योंकि इससे कई बड़े राज सामने आ सकते हैं।
पकड़े जाने के बाद शुरुआती पूछताछ में मैनेजर ने कई बड़ी बातें बताई हैं। उसने माना है कि उसका मुख्य काम अधिकारियों तक रिश्वत का पैसा पहुंचाना था। इसके अलावा वह अवैध कमाई से दूसरों के नाम पर जमीन और मकान खरीदने का पूरा इंतजाम भी करता था। पुलिस को उम्मीद है कि इससे पूछताछ के बाद फर्जी कंपनियों और पैसों के लेन-देन की पूरी सच्चाई सामने आ जाएगी। इसलिए पुलिस अब उसे रिमांड पर लेकर और गहराई से पूछताछ करने की तैयारी कर रही है।
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फर्जी बिलों से निकाला जाता था कैश
जांच में यह भी पता चला है कि टेंडर कारोबारी की कंपनी 'मातृस्वा कंस्ट्रक्शन' में खर्चों को बहुत बढ़ा-चढ़ाकर दिखाया जाता था। गाड़ियों के पेट्रोल-डीजल के फर्जी बिल बनाए जाते थे और कागजों पर झूठे खर्च दिखाकर बैंक खातों से बहुत सारा कैश निकाला जाता था। इसी कैश का इस्तेमाल अफसरों को रिश्वत देने के लिए किया जाता था। पुलिस अब इन फर्जी बिलों और बैंक के लेन-देन के पक्के सबूत जुटा रही है।
अधिकारियों का कहना है कि टेंडर कारोबारी से जुड़ी जितनी भी बेनामी संपत्तियां खरीदी गई उन सबमें इस मैनेजर का हाथ था। जमीन और मकान को खोजना उन्हें खरीदने की प्लानिंग करना, कागजी कार्रवाई पूरी करना और असली मालिक का नाम छिपाना यह सारा काम यही मैनेजर संभालता था। अब पुलिस इसकी मदद से इस पूरे नेटवर्क का पता लगाने की कोशिश कर रही है।
125 करोड़ रुपये के टेंडर में हेराफेरी
इस मामले में 125 करोड़ रुपये के एक बड़े सरकारी टेंडर पर भी सवाल उठे हैं। आरोप है कि जल संसाधन विभाग में अपनी जान-पहचान और पावर का इस्तेमाल करके सुपौल के बीरपुर का एक बड़ा प्रोजेक्ट पहले अहमदाबाद की 'शेवरॉक्स' कंपनी को दिलाया गया। बाद में इस टेंडर को अंदरूनी समझौते के जरिए कारोबारी की कंपनी 'मातृस्वा कंस्ट्रक्शन' को ट्रांसफर कर दिया गया। पुलिस इस पूरे सौदे की कानूनी जांच कर रही है।
जांच के मुताबिक दोनों मुख्य आरोपियों की दोस्ती साल 2010 में शुरू हुई थी। उस समय वह टेंडर कारोबारी कचरा फेंकने वाले डस्टबिन सप्लाई करने का छोटा काम करता था। धीरे-धीरे दोनों बहुत करीब आ गए और कारोबारी ने इस मैनेजर को अपनी कई कंपनियों में डायरेक्टर बना दिया। इनमें से कई कंपनियां सिर्फ कागजों पर चल रही थीं और उनका इस्तेमाल केवल काले धन को छिपाने के लिए किया जाता था।
IAS अधिकारी पर भी जांच
पुलिस इस पूरे मामले की जांच एफआईआर नंबर 5/25 के तहत कर रही है। इस जांच के केंद्र में जल संसाधन विभाग के तत्कालीन सचिव और आईएएस अधिकारी संजीव हंस हैं। जांच टीम यह पता लगा रही है कि इस टेंडर नेटवर्क और आईएएस अधिकारी के बीच क्या कनेक्शन था।
इस घोटाले में एक और व्यक्ति का नाम सामने आया है जो कमीशन का हिसाब रखता था। उसका काम अधिकारियों को दी जाने वाली 2 प्रतिशत से लेकर 10 प्रतिशत तक की रिश्वत का पूरा लिखित रिकॉर्ड रखना था। पुलिस अब उसके डिजिटल रिकॉर्ड और पैसों के दस्तावेजों को खंगाल रही है।
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मोबाइल से मिले सरकारी सीक्रेट डॉक्यूमेंट्स
मुख्य आरोपी कारोबारी के मोबाइल फोन से कई गोपनीय सरकारी कागज मिले हैं। अब सबसे बड़ी चिंता और जांच का विषय यह है कि ये सीक्रेट सरकारी कागज एक प्राइवेट कारोबारी के पास कैसे पहुंचे और विभाग के किस व्यक्ति ने ये कागज उसे लीक किए थे।
मामले में एक और चौंकाने वाला आरोप लगा है। पुलिस का कहना है कि एक महिला को चुप रखने के लिए कारोबारी की कंपनी से 20 लाख रुपये ट्रांसफर किए गए थे। यह पेमेंट कथित तौर पर उस समय के एक बड़े अधिकारी के कहने पर किया गया था। इस आरोप पर अभी जांच चल रही है।
