राजधानी दिल्ली में 'लाल डोरा' एक बार फिर चर्चा में है। दिल्ली में लाल डोरा और आबादी वाले गांवों की जमीनों और मकानों का डिजिटल रिकॉर्ड तैयार करने के लिए सीएम रेखा गुप्ता आदेश दे चुकी हैं। इसी को लेकर 'इंडिया इंटरनेशनल सटेंर' में आयोजित किया गया। कार्यक्रम में लाल डोरा क्या है? इसमें आने वाले गांवों की राजस्व सीमा और आधनिुनिक महानगर के भीतर दिल्ली के ऐतिहासिक गांवों की स्थिति को लेकर चर्चा की गई।

 

'बियॉन्ड द लाल डोरा: लंडै, लेजिटिमेसी एंड द वैनिशिगं कॉमन्स इन दिल्लीज अर्बन विलेजेज' कार्यक्रम में बुद्धजीवियों ने दिल्ली के गांवों की बदलती स्थिति पर विचार किया। इसमें शामिल वक्ताओं ने दिल्ली के शहरी गांवों की जमीन, साझे संसाधनों, यहां बोली जाने वाले भाषा, आजीविका के साधन और समुदाय में मिल-जुलकर रहने वाली संस्कृति को सामने रखा।

दिल्ली देहात प्रोजेक्ट क्या है?

दिल्ली देहात प्रोजेक्ट में दिल्ली के 300 से अधिक गांवों के इतिहास, यहां की पारिस्थितिकी और लोगों के जीवन के अनभुवों का अभिलेखीय शोध, मौखिक इतिहास, मैदानी अध्ययन, सार्वजर्वनिक लेखन और सामुदायिक दस्तावेजीकरण के जरिए संकलन किया है। रेखा गुप्ता सरकार ने लाल डोरा को डिजिटल रिकॉर्ड में बेशक जोड़ रही है, लेकिन इस कार्यक्रम में इन गावों को लेकर संवाद और बातचीत की गई। 

 

दिल्ली देहात प्रोजेक्ट के संस्थापक पुनीत सिंह सिंघल और सह-सस्ंथापक पार्थ शौकीन और गगनदीप सिंह हैं। कार्यक्रम में गांवों के जुड़े शोध, दस्तावेजीकरण, व्यवस्थागत और आयोजन संबंधी सहयोग कुमकुम जयराम, बिंदु रोमी गर्जुर और अक्षय कुमार ने दिया। कार्यक्रर्यम का संचालन राजवर्धन सिंह ने किया।

सम्मेलन में बताया गया कि आज जिस इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में कार्यक्रम हो रहा है- यह कभी दिल्ली के ऐतिहासिक खरैपुर गांव में था। इसमें बताया गया कि आज की आधुनिक और व्यवस्थित नियोजित दिल्ली पुराने गांवों के भूगोल के ऊपर खड़ी है।

 

लाल डोरा और शहरी गांवों की कानूनी चर्चा

सीनियर वकील नवीन आर. नाथ ने दिल्ली में गांव की जमीन के जटिल कानूनी इतिहास के बारे में कहा कि कई दशक पुराने विवाद आज भी अनसलुझे हैं। ऐसे मामले भी हैं जहां चकबंदी और मालिकाना हक से जुड़े सवाल पीढ़ियों से चले आ रहे हैं। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि पुराने गांवों में संपत्ति संबंध हमेशा उस तरह के औपचारिक दस्तावेजों के आधार पर विकसित नहीं हुए थे, जिनकी अपेक्षा आज की नियोजन व्यवस्था करती है। कई मामलों में जमीन और निर्मित स्थान का बंटवारा, लेन-देन और स्वामित्व की समझ किसी एक औपचारिक शहरी प्राधिकरण के बजाय लोगों द्वारा मौखिक रूप से तय होती थी।

दिल्ली देहात प्रोजेक्ट की टिप्पणी

प्रोजेक्ट इस कानूनी अस्पष्टता को नियोजन से लंबे समय तक हुए बहिष्करण के व्यापक इतिहास के भीतर देखता है। दिल्ली के गांवों में आग लगने, इमारत गिरने या दूसरी त्रासदियां होने पर अक्सर गांवों को ही दोषी ठहरा दिया जाता है। मानो घनत्व, अनौपचारिकता या तथाकथित ‘अवधैता’ ही इन खतरों की पूरी वजह हो।

गांवों की हकीकत और नियोजन में कमी

हकीकत इससे कहीं अधिक जटिल है। इनमें से बहुत-सी परिस्थितियां दशकों के ऐसे नियोजन वातावरण में विकसित हुईं, जहां नियम अस्पष्ट थे, बुनियादी ढांचा कमजोर था, काननू का अमल चुनिंदा ढंग से हुआ और संस्थागत उपेक्षा बनी रही। शहर के विस्तार के साथ गांव आर्थिक और भौगोलिक रूप से दिल्ली में शामिल तो होते गए, लेकिन नगर प्रशासन और नियोजन व्यवस्था में उनका समावेश उतनी ही स्पष्टता से नहीं हुआ।

कमियों की जवाबदेही जरूरी

इसलिए जहां असुरक्षित निर्माण या नियमों के उल्लघंन हुए हैं, वहां जवाबदेही जरूरी है। लेकिन उन खतरों के लिए गांवों को सुविधाजनक खलनायक नहीं बनाया जा सकता, जिन्हें पैदा करने में शहर की अपनी प्रशासनिक विफलताओं की भी भूमिका रही है। लाल डोरा का सवाल केवल नियमों से छूट का सवाल नहीं है बल्कि यह इस बात का भी सवाल है कि जब किसी बस्ती को दशकों तक ग्रामीण और शहरी व्यवस्थाओं के बीच छोड़ दिया जाए, बिना किसी स्पष्ट संस्थागत सक्रंमण के, तो उसके क्या परिणाम होते हैं।