लाहौल-स्पीति की ऊंची पहाड़ियों में स्थित घेपन ग्लेशियल झील के बढ़े हुए जलस्तर ने संभावित आपदा के खतरे को लेकर प्रशासन की चिंता बढ़ा दी है। स्थिति की गंभीरता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि उपायुक्त एवं जिला आपदा प्रबंधन प्राधिकरण की अध्यक्ष किरण भड़ाना ने खुद करीब 14 किलोमीटर की कठिन पैदल चढ़ाई कर लगभग 4,070 मीटर की ऊंचाई पर स्थित झील का स्थल निरीक्षण किया।
डीसी के साथ विभिन्न विभागों के 15 अधिकारियों और कर्मचारियों की टीम भी झील क्षेत्र तक पहुंची। टीम ने मौके पर झील के जलस्तर, आसपास के भू-भाग, संभावित जल बहाव मार्ग और क्षेत्र की भौगोलिक परिस्थितियों का बारीकी से जायजा लिया। प्रशासन का फोकस अब किसी संभावित घटना के बाद राहत पहुंचाने से ज्यादा घटना से पहले चेतावनी, निकासी और त्वरित प्रतिक्रिया की व्यवस्था मजबूत करने पर है।
5 मिनट में आबादी तक पहुंच सकता है पानी
प्रशासनिक आकलन के मुताबिक यदि झील से अचानक बड़े पैमाने पर पानी का बहाव शुरू होता है तो भौगोलिक परिस्थितियों के कारण पानी आबादी वाले क्षेत्रों तक बहुत कम समय में पहुंच सकता है। डीसी के निरीक्षण के बाद सामने आए आकलन में यह समय करीब 5 मिनट तक कम होने की आशंका जताई गई है। यही वजह है कि प्रशासन के सामने सबसे बड़ी चुनौती लोगों को समय रहते चेतावनी देने और संवेदनशील क्षेत्रों से सुरक्षित स्थानों तक पहुंचाने की है।
घेपन झील को लेकर प्रशासन पहले ही निचले क्षेत्रों में संभावित खतरे का आकलन शुरू कर चुका है। सिस्सू से पांगी के संसारी बॉर्डर तक चंद्रभागा नदी किनारे 32 रिहायशी क्षेत्रों में हाई फ्लड लेवल (HFL) की मार्किंग की जा रही है। इन स्थानों पर करीब 128 बुर्जियां लगाए जाने की योजना है। प्रशासन ने नदी के बेहद करीब नए निर्माण से बचने की हिदायत भी दी है। संवेदनशील इलाकों में लोगों और महत्वपूर्ण संस्थानों की स्थिति को भी चिह्नित किया जा रहा है।
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अब झील पर 24 घंटे नजर की तैयारी
घेपन झील पर अर्ली वार्निंग सिस्टम स्थापित करने की दिशा में भी काम चल रहा है। प्रस्तावित प्रणाली का उद्देश्य झील के जलस्तर और अन्य महत्वपूर्ण मानकों की लगातार निगरानी कर संभावित खतरे की स्थिति में समय रहते चेतावनी उपलब्ध करवाना है। इसके लिए सी-डैक तिरुवनंतपुरम की तकनीक का इस्तेमाल किए जाने की जानकारी प्रशासन पहले दे चुका है। प्रशासन ने झील और आसपास के क्षेत्र का वैज्ञानिक अध्ययन कराने पर भी जोर दिया है।
भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण (GSI) की विशेषज्ञ टीम द्वारा झील की मैपिंग, जल प्रवाह, गहराई, संभावित भूस्खलन और हिमस्खलन वाले क्षेत्रों समेत अन्य पहलुओं का अध्ययन किया जा रहा है। डीसी के ताजा स्थल निरीक्षण में भी वैज्ञानिक आकलन को लगातार अपडेट करने और बदलती परिस्थितियों के अनुरूप आपदा प्रबंधन योजना को मजबूत करने पर जोर दिया गया। झील क्षेत्र की दुर्गमता और संभावित खतरे की कम चेतावनी अवधि को देखते हुए प्रशासन अब इवैक्युएशन प्लान, मॉक ड्रिल और इमरजेंसी रेस्पॉन्स को मजबूत करने की दिशा में काम कर रहा है।
संभावित आपदा की स्थिति में किस गांव अथवा क्षेत्र के लोगों को किस रास्ते से सुरक्षित स्थान तक पहुंचाया जाएगा, चेतावनी कैसे जारी होगी और विभिन्न विभाग किस समय कौन-सी जिम्मेदारी संभालेंगे, इन सभी बिंदुओं पर समन्वित तैयारी की जरूरत पर जोर दिया गया है।
दुर्गम हिमालय में बदलता मौसम सबसे बड़ी चुनौती
करीब 4,070 मीटर की ऊंचाई पर स्थित घेपन झील का क्षेत्र अत्यंत दुर्गम है। यहां मौसम, ग्लेशियरों और पहाड़ी भू-भाग की परिस्थितियां तेजी से बदल सकती हैं। ऐसे में प्रशासन के लिए केवल झील के जलस्तर की निगरानी पर्याप्त नहीं है, बल्कि आसपास के ग्लेशियरों, ढलानों और संभावित जल बहाव मार्गों पर भी नजर रखना जरूरी है। डीसी के निरीक्षण का संदेश स्पष्ट है, संभावित खतरे को लेकर इंतजार करने के बजाय पहले से तैयारी मजबूत करनी होगी। प्रशासन ने सभी संबंधित विभागों के बीच बेहतर समन्वय, नियमित निगरानी, वैज्ञानिक आकलन और समयबद्ध आपदा तैयारी को प्राथमिकता देने पर जोर दिया है।
