हिमाचल प्रदेश के बढ़ते कर्ज के दबाव के बीच राज्य सरकार ने अब कर्ज लेने के बजाय कर्ज के बेहतर प्रबंधन पर फोकस किया है। सरकार ने वर्ष 2026-27 से 2029-30 तक के लिए मध्यम अवधि की ऋण प्रबंधन रणनीति तैयार की है। इसके तहत अगले चार वर्षों में राज्य के ऋण-GSDP अनुपात को घटाकर 40.64 प्रतिशत तक लाने का लक्ष्य रखा गया है। राज्य पर करीब 1.10 लाख करोड़ रुपये का कर्ज है। ऐसे में सरकार की नई रणनीति का फोकस महंगे और कम अवधि वाले ऋणों पर निर्भरता कम करने, ब्याज का बोझ घटाने और लंबी अवधि के वित्तीय संसाधन जुटाने पर है।

 

सरकार की रणनीति के तहत पांच वर्ष तक की अवधि वाले नए बाजार ऋण से यथासंभव दूरी बनाए रखने की योजना है। इसके बजाय 15 से 20 वर्ष या उससे अधिक अवधि वाले बॉन्ड के माध्यम से वित्तीय जरूरतें पूरी करने पर जोर दिया जाएगा। लंबी अवधि के ऋण का उद्देश्य तत्काल पुनर्भुगतान के दबाव को कम करना और राज्य के नकदी प्रवाह को बेहतर तरीके से प्रबंधित करना है। 

राज्य सरकार के सामने कर्ज की राशि के साथ-साथ उस पर चुकाया जाने वाला ब्याज भी बड़ी चुनौती है। नई रणनीति में औसत ब्याज लागत को मौजूदा करीब 6.77 प्रतिशत के स्तर से और नीचे लाने का लक्ष्य रखा गया है। सरकार कम ब्याज दर वाले विकल्पों को प्राथमिकता देकर आने वाले वर्षों में ब्याज भुगतान पर पड़ने वाले दबाव को कम करना चाहती है।

कर्ज की औसत अवधि 11 साल तक बढ़ाने की तैयारी

ऋण प्रबंधन रणनीति में कर्ज की औसत परिपक्वता अवधि बढ़ाने पर भी जोर दिया गया है। इसे करीब 11 वर्ष तक ले जाने की तैयारी है। इससे पुराने ऋणों के भुगतान का दबाव एक साथ आने के बजाय लंबी अवधि में फैल सकेगा। राज्य सरकार की रणनीति में केंद्र से मिलने वाले 50 वर्ष की अवधि वाले ब्याजमुक्त ऋण का अधिकतम इस्तेमाल भी शामिल है। इस तरह के ऋण से राज्य को अपेक्षाकृत कम वित्तीय बोझ के साथ बुनियादी ढांचा और विकास परियोजनाएं आगे बढ़ाने में मदद मिल सकती है।

 

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सिर्फ नया कर्ज नहीं, कर्ज का बेहतर प्रबंधन

सरकार का यह रोडमैप ऐसे समय में आया है जब हिमाचल की वित्तीय स्थिति में कर्ज एक बड़ा मुद्दा बना हुआ है। नई रणनीति का उद्देश्य केवल कर्ज की राशि को नियंत्रित करना नहीं, बल्कि कर्ज की लागत, अवधि और पुनर्भुगतान की समय-सारणी को बेहतर ढंग से प्रबंधित करना है। सरकार ने वर्ष 2029-30 तक ऋण-GSDP अनुपात को 40.64 प्रतिशत तक लाने का लक्ष्य रखा है। इसके लिए बाजार से लिए जाने वाले ऋण की अवधि, ब्याज दर और उपलब्ध केंद्रीय वित्तीय विकल्पों को ध्यान में रखते हुए ऋण पोर्टफोलियो को व्यवस्थित करने की दिशा में कदम उठाए जाएंगे।

आने वाले वर्षों में क्या बदलेगा?

सरकार की प्रस्तावित रणनीति का असर तीन प्रमुख स्तरों पर देखने को मिलेगा। इनमें महंगे कर्ज पर निर्भरता कम करना, लंबी अवधि के ऋण को प्राथमिकता देना और ब्याज भुगतान के दबाव को नियंत्रित करना शामिल है। यदि तय रोडमैप के अनुसार ऋण-GSDP अनुपात में कमी आती है, तो राज्य के वित्तीय प्रबंधन पर दबाव कम करने में मदद मिल सकती है।