पश्चिम बंगाल के फलता विधानसभा क्षेत्र में पुनर्मतदान के बाद रविवार वोटों की गिनती जारी है। 19 दौर की गिनती के बाद बीजेपी उम्मीदवार देबांग्शु पांडा 99,433 वोटों से आगे चल रहे हैं। चुनाव आयोग के आंकड़ों के मुताबिक दूसरे नंबर पर मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) के उम्मीदवार शंभुनाथ कुर्मी को महज 38,285 वोट मिले हैं। तीसरे नंबर पर कांग्रेस के अब्दुर रज्जाक मोल्ला हैं, जिन्हें 9,763  वोट मिले हैं।

 

वहीं, पहले तृणमूल कांग्रेस उम्मीदवार रहे जहांगीर खान ने पुनर्मतदान से दो दिन पहले चुनाव नहीं लड़ने की घोषणा कर दी थी। उन्होंने इसे अपना निजी फैसला बताया था। चुनाव लड़ने से पीछे हट चुके जहांगीर खान को 7,440 वोट हासिल हुए हैं। 

87 प्रतिशत से अधिक हुई थी वोटिंग

चुनाव आयोग के एक अधिकारी ने बताया कि मतगणना कड़ी सुरक्षा व्यवस्था के बीच सुबह आठ बजे शुरू हुई। दक्षिण 24 परगना जिले के निर्वाचन क्षेत्र के सभी 285 बूथ पर 21 मई को पुनर्मतदान कराया गया था। इससे पहले ईवीएम में छेड़छाड़ और अन्य अनियमितताओं के आरोपों के बाद 29 अप्रैल को हुए मतदान को रद्द कर दिया गया था। पुनर्मतदान में 2.36 लाख मतदाताओं में से 87 प्रतिशत से अधिक ने वोटिंग की थी। 

 

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जहांगीर खान ने दोबारा हुए चुनाव में अपना वोट भी नहीं डाला था, ऐसे में चुनाव से बाहर होने के बावजूद उन्हें 4 फीसदी से ज्यादा वोट मिले हैं।

जहांगीर ने चुनाव से नाम वापस क्यों लिया?

जहांगीर खान ने 19 मई को, दोबारा वोटिंग से ठीक दो दिन पहले चुनाव से नाम वापस लेने का एलान किया था। उन्होंने अपनी वजहों में मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी के विकास के वादे भी बताए। 41 साल के जहांगीर खान एक जाने-माने मुस्लिम बिजनेसमैन और हिंदू-बहुल राज्य में राजनीति का बड़ा चेहरा हैं। जहांगीर ने कहा, 'मुख्यमंत्री ने फलता के विकास के लिए एक खास पैकेज का एलान किया है इसीलिए मैंने इस इलाके में दोबारा वोटिंग से हटने का फैसला किया है।'

 

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उन्होंने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में बताया, 'मैं फलता का बेटा हूं और मैं चाहता हूं कि यह इलाका शांति से रहे और आगे बढ़े। मैंने सपना देखा था कि फलता 'सोनार' (सुनहरा) फलता बने। मैं फलता और इसके लोगों के लिए शांति और खुशहाली पक्का करने के लिए पीछे हट रहा हूं।'

जहांगीर EVM पर क्यों बने रहे?

जहांगीर खान का चुनाव से सार्वजनिक तौर से बाहर होना असल में एक राजनीतिक एलान था। रिप्रेजेंटेशन ऑफ द पीपल एक्ट, 1951 के सेक्शन 37 के मुताबिक, किसी उम्मीदवार को कानूनी तौर पर सिर्फ कागज़ों की शुरुआती जांच के बाद एक तय डेडलाइन तक ही अपना नॉमिनेशन वापस लेने की इजाजत है। एक बार वह टाइमलाइन खत्म हो जाने के बाद, चुनाव लड़ने वाले उम्मीदवार की फाइनल लिस्ट कानूनी तौर पर लॉक हो जाती है।