कर्नाटक में एक महिला ने आरोप लगाया था कि उसे पौष्टिक भोजन नहीं दिया जाता, पति के खाना खाने के बाद ही उसे भोजन करने की अनुमति मिलती थी और सास उससे डोसा या रागी मुड्डे बनाने कि लिए कहती थीं। उसने यह भी दावा किया कि मानसिक तनाव के कारण उसके बाल झड़ने लगे थे। इन आरोपों के आधार पर ससुराल पक्ष के खिलाफ उस महिला ने क्रूरता का मामला दर्ज किया गया था।

 

इस पर कर्नाटक हाई कोर्ट ने कहा कि घर-परिवार में होने वाले हर छोटे-मोटे झगड़े या मतभेद को भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 85 (पहले IPS की धारा 498ए) के तहत क्रूरता या दहेज प्रताड़ना नहीं माना जा सकता है। अदालत ने महिला की शिकायत में लगाए गए आरोपों पर सवाल उठाते हुए कह कि किसी भी मामले को आपराधिक अपराध मामले से पहले उसके सभी तथ्यों और परिस्थितियों की गंभीरता से जांच करना जरूरी है।

 

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हाई कोर्ट ने महिला से पूछे सवाल

सुनवाई के दौरा न्यायमूर्ति एम नागप्रसन्ना ने सवाल किया कि क्या बहू से डोसा या रागी मुड्डे बनाने के लिए कहना, पौष्टिक भोजन न मिना या बाल झड़ना धारा 85 के तहत क्रूरता माना जा सकता है। उन्होंने कहा कि हर घरेलू वावाद को आपराधिक मुकदमे का आधार नहीं बनाया जा सकता। अदालत ने महिला के उस आरोप का भी जिक्र किया, जिसमें उसने कहा था कि पति ने उसे मीरा शैंपू इस्तेमाल करने के लिए मजबूर किया। इस पर अदालत ने टिप्पणी की कि इस तरह की छोटी-छोटी पारिवारिक बातें अपने आप में आपराधिक क्रूरता नहीं बन जातीं।

 

हाई कोर्ट ने कहा कि यदि पति-पत्नी के बीच इस तरह के विवाद हैं तो उन्हें तलाक की कार्यवाही में आधार बनाया जा सकता है लेकिन उन्हें सीधे दहेज उत्पीड़न या क्रूरता का मामला नहीं कहा जा सकता। अदालत ने साफ किया कि वैवाहिक जीवन में होने वाली सामान्य नोकझोंक और गंभीर उत्पीड़न के बीच कानूनी अंतर समझना जरूरी है।

 

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ससुराल पक्ष की याचिका पर हो रही थी सुनवाई

यह सुनवाई महिला की सास और अन्य रिश्तेदारों द्वारा दायर उस याचिका पर हो रही थी जिसमें उन्होंने अपने खिलाफ दर्ज आपराधिक कार्यवाही रद्द करने की मांग की थी। अदालत ने महिला से कहा कि यदि उसके साथ वास्तव में गंभीर उत्पीड़न हुआ है तो वह स्पष्ट तथ्यों के साथ उसे बताए। केवल घरेलू असहमति या पारिवारिक मतभेद को धारा 85 के तहत क्रूरता का मामला बताकर पेश नहीं किया जा सकता। अदालत ने यह भी कहा कि पति के बाद खाना खाने जैसी शिकायतें पारिवारिक विवाद का हिस्सा हो सकती हैं लेकिन उन्हें स्वतः आपराधिक अपराध नहीं माना जा सकता।