उत्तर प्रदेश में पैरामेडिकल शिक्षा व्यवस्था में बड़ा बदलाव होने जा रहा है। प्रदेश सरकार अलग-अलग जांच मशीनों के लिए अलग-अलग डिप्लोमा कोर्स की मौजूदा व्यवस्था खत्म करने की तैयारी में है। नई व्यवस्था लागू होने के बाद एक्सरे, एमआरआई, सीटी स्कैन समेत एक ही श्रेणी की कई जांच मशीनों का संचालन एक संयुक्त डिग्री के आधार पर किया जा सकेगा। इसके लिए एकीकृत पाठ्यक्रम तैयार किए जा रहे हैं।

 इस बदलाव के साथ प्रदेश में वर्तमान में संचालित 36 से अधिक डिप्लोमा और 14 सर्टिफिकेट कोर्स में व्यापक फेरबदल होगा और 36 से अधिक डिप्लोमा पाठ्यक्रम बंद किए जाएंगे। सरकार का उद्देश्य छात्रों को रोजगारोन्मुख शिक्षा देना, अनावश्यक पाठ्यक्रमों को समाप्त करना और सरकारी नौकरियों में शैक्षिक योग्यता व समकक्षता को लेकर होने वाले विवाद को खत्म करना है। राष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त पाठ्यक्रमों के आधार पर नई व्यवस्था लागू की जाएगी।

अभी जितनी मशीनें, उतने डिप्लोमा कोर्स

प्रदेश में अभी जांच की लगभग हर मशीन के लिए अलग-अलग डिप्लोमा कोर्स संचालित किए जा रहे हैं। सरकारी और निजी चिकित्सा संस्थानों में करीब 36 डिप्लोमा और 14 सर्टिफिकेट पाठ्यक्रम चल रहे हैं। अधिकांश कोर्स किसी एक विशेष मशीन या जांच प्रणाली को ध्यान में रखकर बनाए गए हैं। ऐसे में छात्रों को अलग-अलग मशीनों पर काम करने के लिए अलग-अलग डिप्लोमा करना पड़ता है।राज्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्यकार परिषद (स्टेट मेडिकल फैकल्टी) को इस वर्ष केवल पांच नए पाठ्यक्रमों की मंजूरी मिली है। इनमें डिप्लोमा इन एनेस्थीसियोलॉजी एंड ओटी टेक्नोलॉजी, डिप्लोमा इन रेडियोथेरेपी टेक्नोलॉजी, डिप्लोमा इन डायलिसिस टेक्नोलॉजी, डिप्लोमा इन हेल्थ इंफॉर्मेशन मैनेजमेंट और डिप्लोमा इन मेडिकल लैबोरेटरी टेक्नोलॉजी शामिल हैं। इन कोर्सों में प्रवेश प्रक्रिया शुरू हो चुकी है।

 

यह भी पढ़ें: लखनऊ अग्निकांड: चार मौजूदा DM समेत दर्जनों IAS, PCS अफसरों पर गिर सकती है गाज

एक डिग्री से चलेंगी कई जांच मशीनें

नई व्यवस्था के तहत एक्सरे, एमआरआई और सीटी स्कैन जैसी इमेजिंग मशीनों के संचालन के लिए एक संयुक्त पाठ्यक्रम तैयार किया जा रहा है। इसी प्रकार ईसीजी, टीएमटी, ईको, होल्टर मॉनिटर जैसी हृदय जांच मशीनों के लिए भी एक ही कोर्स प्रस्तावित है। पेट, किडनी और अन्य जांच प्रणालियों के लिए भी इसी तरह के संयुक्त पाठ्यक्रम विकसित किए जा रहे हैं। इससे एक डिग्री हासिल करने वाला छात्र एक ही श्रेणी की कई मशीनों का संचालन कर सकेगा।

देश के दूसरे राज्यों के मॉडल का होगा अध्ययन

नई शिक्षा व्यवस्था तैयार करने के लिए पैरामेडिकल विशेषज्ञों की टीम देश के विभिन्न राज्यों में संचालित पाठ्यक्रमों का अध्ययन कर रही है। जिन पाठ्यक्रमों को नेशनल एलाइड एंड हेल्थकेयर काउंसिल से मंजूरी प्राप्त होगी, उन्हें उत्तर प्रदेश में भी लागू किया जाएगा। इससे राज्य की पैरामेडिकल शिक्षा राष्ट्रीय मानकों के अनुरूप हो जाएगी।

इन 36 से अधिक पाठ्यक्रमों को बंद करने की तैयारी

सरकार जिन पाठ्यक्रमों को बंद करने की तैयारी कर रही है, उनमें डिप्लोमा इन ऑडियो एंड स्पीच थेरेपी, डिप्लोमा इन ब्लड ट्रांसफ्यूजन, डिप्लोमा इन प्लास्टिक सर्जरी, डायलिसिस टेक्नीशियन, इमरजेंसी एंड ट्रॉमा केयर टेक्नीशियन, हॉस्पिटल रिकॉर्ड कीपिंग, डिप्लोमा इन ऑर्थोपेडिक्स, मिनिमल एक्सेस सर्जिकल टेक्नीशियन, डिप्लोमा इन सैनिटरी तथा सर्टिफिकेट इन नर्सिंग असिस्टेंट समेत कुल 36 से अधिक कोर्स शामिल हैं।

इनमें से करीब 22 पाठ्यक्रम ऐसे हैं, जिन्हें अब तक नेशनल एलाइड एंड हेल्थकेयर काउंसिल से मान्यता नहीं मिली है। ऐसे कोर्सों में फिलहाल पढ़ाई बंद कर दी जाएगी। भविष्य में मंजूरी मिलने पर इन्हें फिर से शुरू किया जा सकेगा। इसी तरह सर्टिफिकेट इन बेबी केयर, सर्टिफिकेट इन इमरजेंसी केयर समेत अन्य सर्टिफिकेट कोर्स भी प्रभावित होंगे।

सरकारी नौकरियों में खत्म होगा योग्यता का विवाद

विशेषज्ञों का मानना है कि पैरामेडिकल की डिग्री लेने के बाद छात्रों को सीधे रोजगार मिलने में आसानी होनी चाहिए। इसी उद्देश्य से पाठ्यक्रमों को जांच आधारित बनाया जा रहा है। संयुक्त पाठ्यक्रम लागू होने के बाद छात्रों को अलग-अलग डिप्लोमा करने की आवश्यकता नहीं होगी। साथ ही सरकारी नौकरियों में शैक्षिक योग्यता और समकक्षता को लेकर वर्षों से चल रहे विवाद भी समाप्त हो जाएंगे।

 

यह भी पढ़ें: 'अपनी पत्नी को छोड़ दूंगा' कहकर दरोगा ने महिला संग बनाए संबंध, हो गया सस्पेंड

प्रमुख सचिव ने बताया बदलाव का उद्देश्य

चिकित्सा शिक्षा एवं चिकित्सा एवं परिवार कल्याण विभाग के प्रमुख सचिव अमित गुप्ता चौधरी ने कहा कि सरकार की प्राथमिकता ऐसे पाठ्यक्रम तैयार करना है जिनकी डिग्री लेने के बाद छात्रों को तुरंत रोजगार मिल सके। जिन कोर्सों की उपयोगिता समाप्त हो चुकी है या जिन्हें आवश्यक मान्यता नहीं मिली है, उन्हें बंद किया जा रहा है। वहीं भविष्य की जरूरतों और आधुनिक चिकित्सा व्यवस्था को ध्यान में रखते हुए नए संयुक्त पाठ्यक्रम लागू किए जाएंगे।

क्या होगा फायदा?

नई व्यवस्था लागू होने के बाद पैरामेडिकल छात्रों को कम समय में अधिक दक्षता मिलेगी। एक ही डिग्री के आधार पर कई जांच मशीनों का संचालन करने की पात्रता प्राप्त होगी। इससे रोजगार के अवसर बढ़ेंगे, पाठ्यक्रम सरल होंगे और स्वास्थ्य सेवाओं में प्रशिक्षित मानव संसाधन की उपलब्धता भी बेहतर होगी। यह बदलाव उत्तर प्रदेश की पैरामेडिकल शिक्षा व्यवस्था में सबसे बड़े सुधारों में से एक माना जा रहा है।