पंजाब की राजनीति में आजकल सिखों की सर्वोच्च धार्मिक संस्था श्री अकाल तख्त साहिब और पंजाब सरकार के मुखिया सीएम भगवंत मान के बीच टकराव देखने को मिल रहा है। एक तरफ श्री अकाल तख्त साहिब ने पंजाब सरकार के बेअदबी से जुड़े कानून का यह कहकर विरोध किया है कि सरकार ने कानून बनाने से पहले उनकी राय नहीं ली। दूसरी तरफ सीएम भगवंत मान की एक कथित वायरल वीडियो के मामले में उन्हें  ‘गुरु-द्रोही’ और ‘खालसा पंथ विरोधी’ करार दिया है। इसके साथ ही सिख समुदाय से उनसे दूरी बनाए रखने की अपील भी की गई है। 

 

आम आदमी पार्टी पंजाब में अकाल तख्त के इस रुख से काफी असहज है और पार्टी के लिए इस स्थिति से बाहर निकलना काफी मुश्किल हो गया है। पंजाब के सीएम भगवंत मान ने वायरल वीडियो के संबंध में कहा है कि वीडियो में दिख रहा व्यक्ति कोई और है। उन्होंने दावा किया कि अकाल तख्त में हुई राजनीतिक नियुक्तियों की वजह से उनके खिलाफ फैसला सुनाया गया है। 

 

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पहले भी हो चुके हैं कई टकराव

पंजाब में अकाल तख्त सिर्फ धार्मिक या सामाजिक जीवन में ही नहीं बल्कि राजनीति में भी काफी अहमियत रखता है। पंजाब की राजनीति में कई बार अकाल तख्त और राजनेताओं के बीच टकराव देखने को मिला है। इससे पहले सुखबीर बादल को भी अकाल तख्त ने सजा सुनाई थी। अकाल तख्त के सामने शिकायतें पहुंचीं कि 2007 से 2017 के बीच उनकी पार्टी की सरकार के दौरान और उनके गृह मंत्री रहते हुए  कुछ ऐसे फैसले हुए जिनसे सिख पंथ की छवि और धार्मिक भावनाओं को नुकसान पहुंचा। इस मामले में सुखबीर बादल को अकाल तख्त ने धार्मिक सजा सुनाते हुए तनखैया घोषित कर दिया। इसके बाद सुखबीर बादल को अकाल तख्त के फैसले को मानना पड़ा था। 

बेअदबी को लेकर हुआ था टकराव

बेअदबी पंजाब की राजनीति में एक बड़ा मुद्दा रहा है। 2007 से 2017 तक शिरोमणि अकाली दल और भारतीय जनता पार्टी के गठबंधन की सरकार पंजाब में थी। इस दौरान पंजाब में कई ऐसी घटनाएं हुई जिनके चलते सरकार और अकाल तख्त में टकराव देखने को मिला। 2015 के बेअदबी कांड और बहबल कलां गोलीकांड के बाद तो सीएम प्रकाश सिंह बादल की मुश्किलें काफी ज्यादा बढ़ गई थी। अकाल तख्त की ओर से भी सरकार पर कड़े फैसले लेने का दबाव था। इसके अलावा डेरा सच्चा सौदा के प्रमुख गुरमीत सिंह राम रहीम को माफी के मामले में भी सरकार और अकाल तख्त के बीच टकराव देखने को मिला था। 

अमरिंदर सिंह की सरकार में भी हुआ टकराव

अकाल तख्त साहिब और कैप्टन अमरिंदर सिंह की सरकार के बीच भी कई बार छोटे-बड़े टकराव देखने को मिले। कैप्टन अमरिंदर सिंह की सरकार के साथ अकाल तख्त का मुख्य टकराव का उदाहरण 1984 से सिख-विरोधी दंगे और उनसे जुड़ी घटनाओं में न्याया की मांग को लेकर हुआ था। अकाल तख्त लगातार सिख मामलों पर सख्त रुख चाहता था जबकि सरकार संवैधानिक प्रक्रिया की बात कर रही थी।

 

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भगवंत मान सरकार से टकराव

अकाल तख्त सिखों की सर्वोच्च संस्था है ऐसे में कोई भी राजनीतिक दल सीधे तौर पर अकाल तख्त से पंगा लेने की कोशिश नहीं करता है। हालांकि, अकाल तख्त कई बार सरकारों पर धार्मिक मामलों में तेजी से एक्शन लेने की मांग करता है या अन्य मांगों को लेकर दोनों में टकराव देखने को मिलता है। 

 

पंजाब में सरकार बनने के बाद अकाल तख्त ने कई मौकों पर केंद्र और पंजाब सरकार से सिख बंदियों की रिहाई और सिख मामलों पर स्पष्ट रुख अपनाने की मांग की। अकाल तख्त का कहना था कि सरकार को धार्मिक भावनाओं के मुद्दों पर काम करना चाहिए। इसके अलावा 'जागृत जोत श्री गुरु ग्रंथ साहिब सत्कार (संशोधन) विधेयक, 2026' को लेकर भी सरकार और अकाल तख्त के बीच टकराव देखने को मिल रहा है। अकाल तख्त का कहना है कि बिना पंथ की सलाह के कानून बनाया गया है। इसके अलावा अब भगवंत मान की वीडियो से जुड़ा विवाद भी सरकार और अकाल तख्त के बीच टकराव के रूप में देखा जा रहा है।