पंजाब और हरियाणा के बीच पानी के मुद्दे और चंड़ीगढ़ के मुद्दे पर विवाद को लेकर पिछले लंबे समय से राजनीति होती आई है। पंजाब और हरियाणा का कभी साझा इतिहास रहा है और यह दोनों राज्य आज एक दूसरे से अपने अधिकार मांग रहे हैं। आज दोनों राज्यों की राजनीति अलग-अलग है लेकिन स्वतंत्र भारत में इन दोनों राज्यों की एक ही विधानसभा थी। हालांकि, आजादी के कुछ समय बाद ही पंजाब एक नहीं रहा। पंजाब में भाषा और धर्म के नाम पर अलग राज्य बनाने की मांग उठने लगी और आखिरकार 1 नवंबर 1966 को केंद्र सरकार को जनता की मांग को स्वीकार करना पड़ा और हरियाणा का उदय एक नए राज्य के रूप में हुआ। 

 

करीब दो दशकों तक पंजाब की राजनीति भाषा, पहचान, धर्म और विस्थापन के मुद्दों पर ही होती रही। उभरते हुए भारत के सामने राज्यों के पुनर्गठन की एक बड़ी समस्या थी। 1947 से 1966 तक का पंजाब देश की सबसे जटिल राजनीतिक प्रयोगशालाओं में से एक रहा। 

 

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पंजाब का बदलता मैप, Photo Credit: Desi Radio

1947 का विभाजन और संयुक्त पंजाब का उदय

15 अगस्त 1947 को भारत देश आजाद हुआ लेकिन पंजाब में यह आजादी एक बड़ी त्रासदी लेकर आई। भारत और पाकिस्तान दो अलग देश बने और इसका सबसे ज्यादा असर पंजाब पर पड़ा ब्रिटिश भारत का पंजाब दो हिस्सों में बंट गया। पश्चिम पंजाब पाकिस्तान में चला गया और पूर्वी पंजाब भारत के हिस्से में आया। लाखों लोग रातोंरात शरणार्थी बन गए। हिंदू और सिख परिवार पाकिस्तान से भारत आए जबकि बड़ी मुस्लिम आबादी भारत छोड़कर पाकिस्तान चली गई। पंजाब को शांत करना आजाद भारत की पहली मुस्किलों में से एक था और विस्थापितों को घर देना एक बड़ा मुद्दा बन गया था। 

 

आजादी के बाद भारत के हिस्से में आए पंजाब को संयुक्त पंजाब के नाम से भी जाना जाता है। इसे ईस्ट पंजाब कहा जाता था। इसमें आज का पूरा पंजाब शामिल था। इसके साथ-साथ वर्तमान हरियाणा, हिमाचल प्रदेश के कई हिस्से और चंडीगढ़ भी शामिल थे। 

पंजाब के पहले सीएम?

उस दौर में पूरे देश की तरह ही पंजाब में भी कांग्रेस पार्टी का बोलबाला था। कांग्रेस सबसे मजबूत राजनीतिक शक्ति थी और कांग्रेस नेतृत्व ने डॉ. गोपी चंद भार्गव को पूर्वी पंजाब का नेतृत्व सौंपा। वह स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े हुए थे और उनके राजनीतिक अनुभव के कारण माना जाता है कि सरदाल पटेल ने उन्हें चुना था।

पंडित नेहरू के साथ डॉ. गोपी चंद भार्गव

उन्होंने 15 अगस्त 1947 को पूर्वी पंजाब के मुख्यमंत्री के रूप में पद संभाला। उनके सामने कई बड़े मुद्दे थे जिनमें पाकिस्तान से आए लाखों शरणार्थियों को बसाना था। इसके साथ ही जमीनों का बंटवारा और किसानों की समस्याएं कई मुद्दे प्रमुख थे। 

भाषा पर केंद्रीत हुई राजनीति 

जैसे ही पंजाब शर्णार्थियों की समस्या से उभरा, पंजाब के सामने एक बड़ा सवाल आ खड़ा हुआ और वह सवाल सीधा पहचान से जुड़ा था। 1950 के दशक में भारत के सामने राज्यों के पुनर्गठन की मांग शुरू हो गई और इसमें भी भाषाई आधार पर पुनर्गठन की मांग की गई। आंध्र प्रदेश बनने के बाद दूसरे राज्यों में भी भाषा आधारित पुनर्गठन की मांग और ज्यादा तेज हुई। पंजाब के सामने सवाल था कि क्या राज्य की भाषा पंजाबी होगी या हिंदी? इसी सवाल ने पंजाब की राजनीति को हमेशा के लिए बदल दिया। 

पंजाबी सूबा आंदोलन

 

1950 के दशक में भाषा जनगणना का एक बड़ा मुद्दा बन गई। शिरोमणि अकाली दल पंजाब में एक बड़ी राजनीतिक शक्ति के रूप में उभर रहा था। अकाली दल और पंजाबी समर्थक समूह चाहते थे कि पंजाबी भाषा को राज्य की पहचान बनाया जाए। वहीं, हिंदी भाषा के क्षेत्रों (हिमाचल, हरियाणा) में इसका विरोध हुआ। धीरे-धीरे यह मुद्दा पंजाब का सबसे बड़ा मुद्दा बन गया। 

पंजाबी सूबा आंदोलन

1950 के दशक में पंजाब में पंजाबी को लेकर बवाल होना शुरू हो गया। यह मुद्दा अब भाषाई मुद्दे से आगे बढ़कर धार्मिक मुद्दा भी बनता जा रहा था। सिखों के नेता फतेह सिंह ने भाषा को आधार बनाकर एक अलग राज्य की मांग की ताकि सिखों की पहचान को संरक्षित किया जा सके। केंद्र सरकार ऐसा करने के पक्ष में नहीं थी क्योंकि ऐसा करने का मतलब था धार्मिक आधार पर राज्य का विभाजन। राज्य पुनर्गठन आयोग ने पंजाबी को हिंदी से अलग ना मानते हुए इस अलग राज्य के प्रस्ताव को खारिज कर दिया था। राज्य पुनर्गठन अधिनियम के अनुसार, पटियाला और पूर्वी पंजाब राज्य संघ (PEPSU) का पंजाब के साथ 1956 में विलय कर दिया गया था। हालांकि, राज्य में अभी भी एक बड़ा हिस्सा हिंदी भाषी था। 

मास्टर तारा सिंह

अकाली दल के नेता मास्टर तारा सिंह ने पंजाबी सूबा आंदोलन का एक बड़ा चेहरा बनकर उभरे। उन्होंने पंजाब के पुनर्गठन को एक राजनीतिक आंदोलन बना दिया था। उनका तर्क था कि भारत में दूसरे राज्यों को भाषाई पहचान मिली है तो पंजाब को क्यों नहीं? 1960 के दशक में पंजाबी सूबा आंदोलन तेज हुआ। वहीं, प्रताप सिंह कैरों आधुनिक पंजाब के निर्माण में लगे हुए थे। वह कृषि, सुधारों, सड़कों, प्रशासन और उद्योगों पर काम कर रहे थे लेकिन विपक्ष सत्ता के केंद्रीयकरण का आरोप लगा रहा था। 

हिंदी-पंजाबी विवाद

1956 के बाद पंजाबी सूबा आंदोलन और ज्यादा तेज हो गया और पंजाब की राजनीति सरल होने के बजाय और ज्यादा जटिल हो गई। 960 के दशक तक आते-आते आंदोलन निर्णायक चरण में पहुंच गया। राज्य में कई जगहों पर प्रदर्शन हुए, गिरफ्तारियां हुईं, अकाली दल ने बड़े पैमाने पर राजनीतिक अभियान चलाया और इस आंदोलन को एक राजनीतिक आंदोलन से ज्यादा पहचान का आंदोलन बना दिया। 

हरियाणा के नेताओं ने भी अलग राज्य की मांग तेज कर दी। उनका कहना था कि पंजाब भाषा के आधार पर बनेगा तो हिंदी भाषी क्षेत्र भी अलग होना चाहिए। धीरे-धीरे हरियाणा को अलग राज्य बनाने की मांग मजबूत होती गई। 1960 के दशक तक केंद्र सरकार समझ गई थी कि अब पूरे क्षेत्र को एक रख पाना मु्श्किल है। इसके बाद राज्य पुनर्गठन को लेकर बातचीत शुरू हुई और राज्यों की सीमाओं पर चर्चा हुई। इसके बाद केंद्र सरकार ने पुनर्गठन पर अंति मुहर लगा दी। 

1966 के बाद बदला हुआ पंजाब

1 नवंबर 1966 का दिन पंजाब के लिए 15 अगस्त 1947 के दिन की तरह ही था। लंबे समय से आंदोलन कर रहे लोगों की अलग पंजाबी सूबा यानी राज्य की मांग पूरी हो गई। पंजाब पुनर्गठन विधेयक, 1966 का उद्देश्य मौजूदा राज्य का पुनर्गठन करके पंजाब और हरियाणा नामक दो अलग-अलग राज्य और चंडीगढ़ नामक एक नया केंद्र शासित प्रदेश बनाना और मौजूदा राज्य के कुछ क्षेत्रों को हिमाचल प्रदेश केंद्र शासित प्रदेश में स्थानांतरित करना था। 

पंजाब हरियाणा के बीच विवाद

पंजाब और हरियाणा 1966 में अलग राज्य बन गए, लेकिन करीब 60 साल बाद भी कुछ बड़े मुद्दे पूरी तरह हल नहीं हो पाए हैं। 1966 में पंजाब पुनर्गठन के समय चंडीगढ़ को केंद्र शासित क्षेत्र बनाया गया। साथ ही इसे पंजाब और हरियाणा दोनों की राजधानी बनाया गया। चंडीगढ़ संयुक्त पंजाब की राजधानी के रूप में विकसित किया गया था लेकिन अब फिर से पंजाब का विभाजन हो गया था। इसके अलावा सतलुज-यमुना लिंक (SYL) पंजाब और हरियाणा के बीच एक संवेदनशील मुद्दा बना हुआ है। 1966 में सीमा तय होने के बाद भी कुछ इलाकों को लेकर राजनीतिक बहस समय-समय पर उठती रहती है। कई पंजाबी भाषी क्षेत्र हरियाणा और कई हिंदी भाषी इलाके हरियाणा में हैं। आज भी पंजाब और हरियाणा के चुनावों में यह मुद्दे उठते रहते हैं।