पहाड़ों पर विकास की रफ्तार के बीच नियमों की ऊंचाई कितनी रह गई है? सोलन-बड़ोग में बहुमंजिला निर्माण से जुड़े मामले ने यह सवाल एक बार फिर खड़ा कर दिया है। यहां 21 निर्माण परियोजनाओं की जांच में आठ ऐसी इमारतें सामने आई हैं, जिनमें छह मंजिल से अधिक निर्माण पाया गया। अब हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने राज्य सरकार से पूछा है कि पहाड़ी क्षेत्रों में अधिकतम 25 मीटर ऊंचाई निर्धारित होने के बावजूद इससे ऊंची इमारतों को आखिर किस आधार पर मंजूरी दी गई। 

मामला केवल मंजूर मंजिलों से अधिक निर्माण का नहीं है। अदालत ने भवनों के बीच पर्याप्त दूरी, अग्नि सुरक्षा, पर्यावरणीय स्वीकृतियों और संरचनात्मक मानकों पर भी सवाल उठाए हैं। साथ ही, यह जानना चाहा है कि इन परियोजनाओं की वास्तविक स्थिति की निगरानी किस तरह की गई और क्या निर्माण स्वीकृत नक्शों के अनुरूप हुआ है।

 

हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश गुरमीत सिंह संधावालिया और न्यायमूर्ति बिपिन चंद्र नेगी की पीठ ने सरकारी हलफनामों और उनके साथ पेश तस्वीरों का अवलोकन करने के बाद राज्य सरकार से विस्तृत जानकारी तलब की है। अदालत की चिंता इस बात को लेकर भी है कि कई निर्माण स्थलों की मौजूदा स्थिति का पूरा ब्योरा संबंधित अधिकारियों के पास उपलब्ध नहीं है। इससे भवन निर्माण की निगरानी और नियामकीय व्यवस्था की प्रभावशीलता पर सवाल उठते हैं।

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21 परियोजनाओं की जांच, आठ में छह से ज्यादा मंजिलें

यह मामला सोलन-बड़ोग क्षेत्र में कथित अनियमित निर्माण से संबंधित है। हाईकोर्ट के 15 सितंबर 2026 के आदेश के अनुपालन में नगर एवं ग्राम नियोजन विभाग के अवर सचिव सुख राम ठाकुर ने हलफनामा दाखिल किया था। इसके अनुसार, 21 बहुमंजिला निर्माण परियोजनाओं की जांच के लिए राज्य नगर नियोजक की अध्यक्षता में समिति गठित की गई थी। समिति को परियोजनाओं के लिए हिमाचल प्रदेश भू-राजस्व एवं काश्तकारी सुधार अधिनियम, 1972 की धारा 118 के तहत जमीन खरीदने की अनुमतियों और स्वीकृत भवन नक्शों की पड़ताल करनी थी। जांच में 21 में से आठ परियोजनाओं में छह मंजिल से अधिक निर्माण पाया गया। यानी जांच के दायरे में आई परियोजनाओं में करीब 38 फीसदी में छह मंजिल की सीमा से आगे निर्माण सामने आया।

राज्य सरकार के अनुसार, इन परियोजनाओं को निर्माण की मंजूरी हाईकोर्ट के 11 मई 2026 के उस आदेश से पहले दी गई थी, जिसमें सोलन में छह मंजिल से अधिक ऊंची इमारतों के निर्माण पर रोक लगाई गई थी। इसके बाद सरकार ने 29 अगस्त 2026 को भी छह मंजिल से अधिक निर्माण रोकने के निर्देश जारी किए। हालांकि, पहले से स्वीकृत परियोजनाओं में वास्तविक निर्माण कितना हुआ और किन नियमों का पालन किया गया, यह अब भी जांच का महत्वपूर्ण पहलू है। अदालत ने उन 21 परियोजनाओं का विस्तृत ब्योरा मांगा है, जिनके संबंध में निर्माण रोकने के नोटिस जारी किए गए हैं।

 

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25 मीटर की सीमा, मंजूरी का आधार क्या?

हाईकोर्ट ने रेगुलेशंस फॉर डेवलपमेंट ऑफ अपार्टमेंट्स एंड कॉलोनिज का उल्लेख करते हुए कहा कि इन नियमों के तहत मैदानी क्षेत्रों में इमारतों की अधिकतम ऊंचाई 30 मीटर, जबकि पहाड़ी क्षेत्रों में ढलानदार छत सहित 25 मीटर निर्धारित है। अदालत ने राज्य सरकार से स्पष्ट करने को कहा है कि 25 मीटर से अधिक ऊंचाई वाली इमारतों को किन नियमों और प्रावधानों के तहत मंजूरी दी गई।

यह भी बताना होगा कि बड़ी निर्माण परियोजनाओं को उनके क्षेत्रफल और लागू नियमों के अनुसार जरूरी पर्यावरणीय स्वीकृतियां मिली थीं या नहीं। करीब 25 मीटर की ऊंचाई सामान्यतः छह से सात मंजिल के बराबर हो सकती है, लेकिन यह भवन की मंजिलों की ऊंचाई और डिजाइन पर निर्भर करता है। इसलिए केवल मंजिलों की संख्या ही नहीं, बल्कि इमारत की वास्तविक ऊंचाई और स्वीकृत मानकों का पालन भी जांच का विषय है। अदालत ने तस्वीरों में दिखाई दे रहे बड़े अपार्टमेंट ब्लॉकों की संरचना पर भी प्रथम दृष्टया चिंता जताई है। पीठ ने भवनों के अलग-अलग ब्लॉकों और फ्लैटों के बीच पर्याप्त दूरी के संबंध में जानकारी मांगी है।

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आग लगी तो बचाव कैसे होगा?

बहुमंजिला इमारतों में अग्नि सुरक्षा केवल औपचारिक मंजूरी का विषय नहीं, बल्कि आपात स्थिति में जान बचाने से जुड़ा सवाल है। अदालत ने पूछा है कि संबंधित परियोजनाओं में आग से बचाव के लिए पर्याप्त खुली जगह छोड़ी गई है या नहीं और अग्नि सुरक्षा संबंधी मानकों का पालन किया गया है या नहीं। पीठ ने भवनों के बीच न्यूनतम दूरी निर्धारित करने वाले नियमों और जरूरी अग्नि सुरक्षा मंजूरियों का ब्योरा भी मांगा है। 

पहाड़ी क्षेत्रों में यह सवाल और महत्वपूर्ण हो जाता है। संकरे पहुंच मार्ग, ढलानदार जमीन और सीमित खुली जगह के कारण आग या अन्य दुर्घटना के समय राहत एवं बचाव कार्य चुनौतीपूर्ण हो सकते हैं। ऐसे में केवल इमारत की मजबूती ही नहीं, बल्कि अग्निशमन वाहनों की पहुंच, निकासी के रास्ते और भवनों के बीच पर्याप्त दूरी भी सुरक्षा का अहम हिस्सा हैं। यदि निर्माण के दौरान इन पहलुओं की अनदेखी हुई है तो दुर्घटना की स्थिति में उसका असर केवल संबंधित इमारत तक सीमित नहीं रह सकता।

जमीन खरीद की अनुमतियों का भी खुलेगा हिसाब

हाईकोर्ट की पड़ताल अब भवन निर्माण से आगे बढ़कर जमीन खरीद की अनुमति देने की प्रक्रिया तक पहुंच गई है। अदालत ने राज्य सरकार को पिछले दस वर्षों में हिमाचल प्रदेश भू-राजस्व एवं काश्तकारी सुधार अधिनियम, 1972 की धारा 118 के तहत पूरे प्रदेश में दी गई अनुमतियों का विस्तृत ब्योरा पेश करने को कहा है। इसमें कुल्लू, कांगड़ा और सिरमौर जिलों से संबंधित अनुमतियों की जानकारी भी मांगी गई है। राज्य के अतिरिक्त मुख्य सचिव (राजस्व) अनिल चौहान की ओर से दाखिल अलग हलफनामे के अनुसार, सोलन जिले के बड़ोग पटवार सर्किल में गैर-कृषकों को कुल 187 अनुमतियां दी गईं।

इनमें 64 अनुमतियां: विभिन्न उद्देश्यों के लिए जमीन खरीदने से संबंधित, 123 अनुमतियां निर्मित संपत्तियों अथवा फ्लैटों की खरीद से संबंधित हैं। वहीं, पिछले दस वर्षों में शिमला जिले में धारा 118 के तहत कुल 801 अनुमतियां जारी की गईं। सिरमौर जिले की नाहन तहसील में 270 अनुमतियां दी गईं। इनमें 159 औद्योगिक और पर्यटन संबंधी उद्देश्यों के लिए, जबकि 111 आवासीय और पर्यटन संबंधी उद्देश्यों के लिए थीं। इन आंकड़ों के बीच अदालत की पड़ताल का एक अहम पहलू यह है कि जमीन खरीद की अनुमति, भवन निर्माण की स्वीकृति और वास्तविक निर्माण के बीच नियामकीय निगरानी किस तरह काम करती है।

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दो साल में निर्माण पूरा करने की शर्त पर भी नजर

अदालत ने नियोजन संबंधी अनुमतियों की वैधता और निर्माण पूरा करने की समयसीमा पर भी ध्यान दिया है। सामान्य तौर पर ऐसी अनुमतियां निर्धारित शर्तों के तहत दो वर्षों के भीतर निर्माण पूरा करने के लिए दी जाती हैं। समय बढ़ाने के लिए निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार आवेदन और मंजूरी जरूरी होती है। संबंधित वैधानिक प्रावधानों के तहत तय अवधि में निर्माण नहीं होने पर अनुमति स्वतः निरस्त भी हो सकती है।

पीठ ने इस पहलू पर भी गौर किया कि धारा 118 के तहत जमीन खरीदने की अनुमति प्राप्त करने के बाद कई डेवलपर छह मंजिल से अधिक ऊंची इमारतों की स्वीकृति हासिल कर चुके हैं। इससे सवाल उठता है कि जमीन खरीदने की अनुमति से लेकर निर्माण पूरा होने तक संबंधित विभागों के बीच समन्वय और निगरानी कितनी प्रभावी रही। क्या स्वीकृत नक्शों और वास्तविक निर्माण का नियमित मिलान हुआ? क्या नियमों के उल्लंघन पर समय रहते कार्रवाई की गई? सरकार के जवाब से इन सवालों पर स्थिति स्पष्ट होने की उम्मीद है।

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पहाड़ों में विकास बनाम सुरक्षा की चुनौती

सोलन-बड़ोग का मामला हिमाचल के उन पहाड़ी शहरों के लिए भी महत्वपूर्ण है, जहां पर्यटन, होटल कारोबार, अपार्टमेंट और व्यावसायिक निर्माण गतिविधियां तेजी से बढ़ रही हैं। निवेश और निर्माण से आर्थिक अवसर पैदा होते हैं, लेकिन पहाड़ों की भौगोलिक संवेदनशीलता को देखते हुए विकास के मानकों पर सख्ती भी जरूरी है। ऊंचाई की सीमा, जमीन की प्रकृति, पर्यावरणीय स्वीकृति, संरचनात्मक सुरक्षा, अग्निशमन व्यवस्था और आपातकालीन पहुंच जैसे पहलुओं को अलग-अलग नहीं देखा जा सकता। 

हाईकोर्ट की पड़ताल अब यह तय करने की दिशा में अहम साबित हो सकती है कि संबंधित परियोजनाओं को मंजूरी देने का आधार क्या था, निर्माण की निगरानी कैसे हुई और यदि नियमों का उल्लंघन हुआ है तो इसके लिए जवाबदेही किसकी बनती है। अब नजर सरकार के जवाब पर है। सवाल सिर्फ आठ इमारतों में छह से अधिक मंजिलें मिलने का नहीं, बल्कि उस व्यवस्था का भी है, जिसके तहत पहाड़ों पर निर्माण को मंजूरी दी जाती है और फिर उसके अनुपालन की निगरानी की जाती है।