पिछले कुछ दिनों से पंजाब में हरिके पत्तन (हरिके बैराज) काफी चर्चा में है। यह वही जगह है जहां सतलुज और ब्यास नही मिलती हैं। इसके अचानक चर्चा में आने का मुख्य कारण फिल्म सतलुज है। इस फिल्म में मानवाधिकार कार्यकर्ता जसवंत सिंह खालड़ा को दिखाया गया है। किस तरह से पंजाब पुलिस ने फेक एनकाउंटर किए थे फिल्म इसी विवाद के पर केंद्रित है। इस फिल्म के बाद से हरिके पत्तन फिर से चर्चा में है। मंगलवार को हरिके पत्तन पर अरदास करवाई गई और अकाल तख्त से निर्देश दिया गया कि यहां जसवंत सिंह खालड़ा की याद में और उन लोगों की याद में एक शहीदी स्मारक बनाया जाएगा जिनके शव उग्रवाद के दौरान पंजाब में लावारिस पाए गए थे। 

मंगलवार को सैंकड़ों की संख्या में लोग यहां इकट्ठा हुए थे और अकाल तख्त के जत्थेदार ज्ञानी कुलदीप सिह गरगज्ज ने उग्रवाद के दौरान लावारिस मारे गए लोगों और जसवंत सिंह खालड़ा की आत्मा की शांति के लिए अरदास की गई थी। इस अरदास के बाद जत्थेदार ने यह घोषणा की कि वहां शहीदी स्मारक बनाया जाएगा। 

 

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खालड़ा को बताया कौमी शहीद

जत्थेदार ने अरदास के बाद कहा कि हमारे पंथ का कोई भी शहीद गुमनाम नहीं है। आज पूरा पंथ शहीदों को याद कर रहा है। शहीदों को याद रखना पंथ का कर्तव्य है। कौम खालड़ा को कौमी शहीद मानता है और मानता रहेगा। ज्ञानी कुलदी सिंह ने कहा कि हम उस स्थान पर इकट्ठा हुए हैं जहां पंजाब के अनगिनत बेटों और बेटियों की हत्या कर दी गई और शवों को नदियों में बहा दिया गया। इस स्थान को शहीदी पत्तन के नाम से जाना जाएगा। 

लावारिसों का रिकॉर्ड रखेगा अकाल तख्त साहिब

जत्थेदार ने एसजीपीसी को समुदाय के सहयोग से हरिके पट्टन में शहीदी पट्टन बनाने का निर्देश दिया है। इसके साथ ही उन्होंने अकाल तख्त को उन लोगों को डॉक्यूमेंटे्सन करने के लिए कहा जिन्हें कथित तौर पर 1982 और 1995 के बीच अज्ञात व्यक्तियों के रूप में मार दिया गया था। उन्होंने कहा कि ये अभिलेख अकाल तख्त साहिब के अभिलेखागार का हिस्सा बनेंगे। उन्होंने कहा, 'ये अभिलेख सुनिश्चित करेंगे कि हमारे बच्चों के बलिदान मिटाए ना जाएं और आने वाली पीढ़ियों के लिए एक स्थायी प्रमाण के रूप में काम करेंगे।'

 

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हरिके पत्तन से फेंकी जाती थी लाशें

जसवंत सिंह खालड़ा ने पंजाब पुलिस के फर्जी एनकाउंटर्स की पोल खोल दी थी। खालड़ा ने लावारिस लाशों के रूप में जलाए जा रहे शवों का रिकॉर्ड निकाला था। पंजाब पुलिस ने कथित तौर पर 1990 के दशक में कई फर्जी एनकाउंटर किए और कई लाशों को इसी हरिके पत्तन से नदी में फेंक दिया। खालड़ा ने खुल 2000 से ज्यादा लावारिश लाशों के दाह संस्कार का खुलासा किया था।

 

 जसवंत सिंह खालड़ा को भी 6 सितंबर 1955 को अमृतसर स्थित उनके घर से अगवा कर लिया गया और पंजाब पुलिस कर्मियों ने उनकी हत्या कर दी थी। इसके बाद कथित तौर पर उनकी लाश को भी इसी हरिके पत्तन से फेंक दिया गया था। सतलुज फिल्म में इसी को दिखाया गया है।