उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 से पहले भारतीय जनता पार्टी के सामने सबसे बड़ी चुनौती अब विपक्ष नहीं, बल्कि अपने सहयोगी दलों को संतुष्ट रखना बनती जा रही है। पश्चिम में रालोद, पूर्वांचल में अपना दल (एस) और सुभासपा पहले से अधिक हिस्सेदारी की उम्मीद लगाए बैठे हैं। इसी बीच बिहार की जदयू और लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) के बाद अब महाराष्ट्र की रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इंडिया (RBI-आठवले) ने भी यूपी में सीटों की दावेदारी ठोक दी है।

आरपीआई ने भारतीय जनता पार्टी से चार से पांच विधानसभा सीटें मांगी हैं और साफ कर दिया है कि यदि सम्मानजनक हिस्सेदारी नहीं मिली तो वह 20 से 25 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारेगी। ऐसे में 403 सीटों वाले उत्तर प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी के लिए सहयोगियों के बीच संतुलन बनाना सबसे कठिन राजनीतिक परीक्षा बनता जा रहा है।

चार-पांच सीटें दें, नहीं तो 20-25 सीटों पर लड़ेंगे : आठवले

आरपीआई के राष्ट्रीय अध्यक्ष एवं केंद्रीय सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता राज्य मंत्री डॉ. रामदास आठवले ने रविवार को लखनऊ में आयोजित प्रेसवार्ता में कहा कि उनकी पार्टी उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव भारतीय जनता पार्टी के साथ मिलकर लड़ना चाहती है। इसके लिए भारतीय जनता पार्टी से चार से पांच विधानसभा सीटों की मांग की गई है।

आठवले ने कहा कि सीटों पर सहमति नहीं बनी तो पार्टी 20 से 25 विधानसभा सीटों पर अपने प्रत्याशी उतारेगी, जबकि शेष सीटों पर भारतीय जनता पार्टी का समर्थन करेगी। उन्होंने कहा कि भारतीय जनता पार्टी ने जिस तरह अपना दल (एस) और सुभासपा जैसे सहयोगी दलों को प्रतिनिधित्व दिया है, उसी तरह आरपीआई को भी उत्तर प्रदेश में उचित भागीदारी मिलनी चाहिए।

 

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चार बड़े सम्मेलन कर संगठन बढ़ाने की तैयारी

रामदास आठवले ने बताया कि पार्टी प्रदेश में संगठन विस्तार अभियान शुरू करेगी। पहला कार्यकर्ता सम्मेलन 13 सितंबर को मुरादाबाद, दूसरा 25 सितंबर को आगरा, तीसरा दीपावली से पहले आजमगढ़ में आयोजित होगा। इसके बाद 26 नवंबर, संविधान दिवस पर लखनऊ में विशाल महासम्मेलन किया जाएगा।

 

पार्टी का दावा है कि इसमें प्रदेशभर से लाखों कार्यकर्ता शामिल होंगे और विधानसभा चुनाव की रणनीति को अंतिम रूप दिया जाएगा।दिल्ली के जंतर-मंतर पर हुए प्रदर्शन और केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग पर पूछे गए सवाल के जवाब में आठवले ने कहा कि पेपर लीक के मुद्दे पर युवाओं में नाराजगी थी, लेकिन केंद्र सरकार ने युवाओं की मांगों को स्वीकार करते हुए आवश्यक कदम उठाए हैं।

पश्चिम से पूर्वांचल तक सहयोगियों की अपनी-अपनी दावेदारी

भारतीय जनता पार्टी के सामने सबसे बड़ी चुनौती क्षेत्रीय और सामाजिक समीकरणों को साधने की है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश में जयंत चौधरी की राष्ट्रीय लोकदल (रालोद) जाट और किसान वोटों के आधार पर मजबूत दावेदारी रखती है। पूर्वांचल में ओमप्रकाश राजभर की सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी (सुभासपा) राजभर समाज के प्रभाव वाले क्षेत्रों में अधिक सीटों की उम्मीद कर रही है। वहीं अपना दल (एस) कुर्मी मतदाताओं के प्रभाव वाले इलाकों में अपनी हिस्सेदारी बढ़ाना चाहता है।

 

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बिहार और महाराष्ट्र की एंट्री से बढ़ा दबाव

बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की जनता दल (यूनाइटेड) और केंद्रीय मंत्री चिराग पासवान की लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) पहले ही उत्तर प्रदेश में चुनाव लड़ने का ऐलान कर चुकी हैं। दोनों दल पूर्वांचल और बिहार सीमा से लगे जिलों में अपनी राजनीतिक जमीन तलाश रहे हैं, जहां सामाजिक और जातीय समीकरण उनके पक्ष में माने जाते हैं।


अब महाराष्ट्र से आरपीआई (आठवले) की सक्रियता ने भारतीय जनता पार्टी के सामने नई चुनौती खड़ी कर दी है। आरपीआई उत्तर प्रदेश की बड़ी दलित आबादी के बीच अपनी राजनीतिक मौजूदगी दर्ज कराना चाहती है। पार्टी का मानना है कि यदि वह एनडीए का हिस्सा है तो उसे भी विधानसभा चुनाव में सम्मानजनक हिस्सेदारी मिलनी चाहिए।

भारतीय जनता पार्टी के लिए सबसे कठिन होगा सीटों का संतुलन

भारतीय जनता पार्टी पहले से अपना दल (एस), सुभासपा और रालोद के साथ गठबंधन में है। अब जदयू, लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) और आरपीआई भी हिस्सेदारी की मांग कर रही हैं। ऐसे में यदि भारतीय जनता पार्टी सभी सहयोगियों को उनकी अपेक्षा के अनुसार सीटें देती है तो उसे अपनी कई परंपरागत सीटें छोड़नी पड़ सकती हैं। वहीं मांग पूरी नहीं होने की स्थिति में कुछ सहयोगी दल सीमित सीटों पर अलग चुनाव लड़ने का रास्ता भी चुन सकते हैं।

2027 से पहले एनडीए की सबसे बड़ी परीक्षा

उत्तर प्रदेश की 403 विधानसभा सीटों पर जीत का लक्ष्य लेकर चल रही भारतीय जनता पार्टी के लिए अब सबसे बड़ी चुनौती विपक्षी दलों से मुकाबला भर नहीं है। असली परीक्षा अपने सहयोगियों को साथ रखते हुए ऐसा सीट बंटवारा करना होगा, जिससे कोई दल असंतुष्ट न हो। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि आने वाले महीनों में उत्तर प्रदेश की राजनीति का सबसे बड़ा मुद्दा विपक्ष के हमले नहीं, बल्कि एनडीए के भीतर सीट शेयरिंग का गणित और सहयोगियों की बढ़ती दावेदारियां होंगी।