उत्तर प्रदेश के 75 जिलों में लोग, लू से जूझ रहे हैं। भीषण गर्मी की वजह से लोग बीमार पड़ रहे हैं। सभी जिलों में अघोषित बिजली कटौती हो रही है, जिसकी वजह से लोग परेशान हैं और बिजली विभाग के खिलाफ आक्रोश जाहिर कर रहे हैं। उत्तर प्रदेश की आबादी 24 करोड़ से ज्यादा है, इसका एक बड़ा हिस्सा, गांवों में बसता है। ग्रामीण इलाकों में बिजली कटौती इस हद तक है कि लोग रात में बाहर बैठकर वक्त काटने को मजबूर हैं। 

आबादी के लिहाज से यूपी, देश का सबसे बड़ा राज्य है। गर्मी में बिजली की खपत आमतौर पर बढ़ी ही रहती है। यूपी में बिजली कटौती को लेकर आक्रोश बढ़ता जा रहा है। लोग बिजली मंत्री एके शर्मा का इस्तीफा तक मांग रहे हैं। गर्मी में बिजली कटने से बेहाल लोग, जगह-जगह पावर हाउस पहुंच रहे हैं, अधिकारियों से उलझ रहे हैं। सोशल मीडिया पर ऐसे वीडियो छाए हैं। 

24 करोड़ की आबादी और बिजली की बढ़ती मांग

उत्तर प्रदेश में इस गर्मी में बिजली की मांग 32,000 से 33,000 मेगावाट तक पहुंचने की उम्मीद है। उपभोक्ता संगठनों ने पहले ही आगाह किया था कि अभी बुनियादी ढांचा ठीक नहीं है, इसलिए बिजली सप्लाई में दिक्कत आनी तय है। राज्य में फिलहाल 3.72 करोड़ से ज्यादा बिजली उपभोक्ता हैं, इनकी कुल स्वीकृत लोड 80,000 मेगावाट से ज्यादा है।

 

132 केवी सबस्टेशनों की उपलब्ध क्षमता सिर्फ  60,000 मेगावाट ही है। इससे स्वीकृत लोड और सबस्टेशन क्षमता के बीच करीब 20,000 मेगावाट का बड़ा अंतर हो गया है। ऑल इंडिया पावर इंजीनियर्स फेडरेशन के चेयरमैन शैलेंद्र दुबे ने भी यह दावा किया था कि बढ़ती मांग और बुनियादी ढांचे की कमियों को दुरुस्त करना जरूरी है। 

 

उत्तर प्रदेश पावर कॉर्पोरेशन लिमिटेड (UPPCL) के डायरेक्टर (डिस्ट्रीब्यूशन) ज्ञानेंद्र धर द्विवेदी ने हाल ही में कहा था, 'राज्य की पीक डिमांड आमतौर पर 31,000-32,000 मेगावाट रहती है, जो इस साल 33,000 मेगावाट तक जा सकती है। मौजूदा व्यवस्था लगभग दोगुनी मांग को भी संभालने में सक्षम है।' 

ज्ञानेंद्र धर द्विवेदी के दावों से उलट, जमीनी हकीकत कुछ और है। लोग बिजली की वजह से परेशान हैं। 

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बिजली मंत्री AK शर्मा का क्या कहना है?

एके शर्मा, मंत्री, विद्युद विभाग:-
यूपी में कल रात की पीक डिमांड 30395 मेगावाट तक पहुंच गई थी। लगता है कुछ लोग उत्तर प्रदेश को बदनाम करने का प्रण करके बैठे हैं। पहले सिर्फ पांच गांवों में बिजली आती थी तो उन्हें समस्या नहीं लगती थी। अब पूरे राज्य में बिजली आती है, हर गांव हर गली में रोस्टर के अनुसार 18 से 24 घंटे आती है। कुछ गांव या कुछ शहरों के कुछ मुहल्लों में व्यवधान आता है तो बड़ी बात बन जाती है। यूपी में बत्ती गुल, बिजली संकट और बिजली व्यवस्था ध्वस्त जैसी क्षवि बनाते और बनवाते हैं। यह राज्य का और उसके विद्युत कर्मियों का अपमान है। 

सरकारी दावों पर एक नजर

एके शर्मा ने कहा, 'प्रदेश के 75 जिलों में लगभग 58 हजार ग्राम पंचायतें हैं। लगभग 3 लाख विद्युतीकृत गांव और मजरे हैं। सब जगह विद्युत आपूर्ति हो रही है। 762 नगरीय निकाय हैं, जिनमें 17 महानगर, नगर निगम, 200 नगर पालिका और 545 नगर पंचायतें आती हैं। इनमें भी निरंतर विद्युत आपूर्ति जारी है।'

यूपी का पावर ग्रिड: उम्मीदें बड़ी, हकीकत जुदा

यूपी में 80 फीसदी बिजली कोयले से पैदा होती है। प्रदेश में 30 से ज्यादा बड़े थर्मल प्लांट और हाइड्रो पावर प्लांट हैं। NTPC और संयुक्त उपक्रमों के कई केंद्रीय संयंत्र भी राज्य में बिजली आपूर्ति देते हैं। राज्य की आबादी बड़ी है तो बिजली की उम्मीदें भी ज्यादा हैं। उत्तर प्रदेश में बिजली की कुल स्थापित क्षमता अभी 31,600 मेगावाट से ज्यादा हो गई है लेकिन इसे दुरुस्त करने की जरूरत है। योगी आदित्यनाथ के सरकार में साल 2017 से अब तक, बिजली उत्पादन बढ़ाने के लिए कई बड़े सुपरक्रिटिकल पावर प्लांट प्रोजेक्ट्स शुरू करने की कवायद हुई है लेकिन सुधार की गुंजाइश है।


ओबरा-सी करीब 1320 मेगावाट की क्षमता से काम कर रहा है, जवाहरपुर की क्षमता 1320 मेगावाट है। घाटमपुर 1980 मेगावाट और पनकी 660 मेगावाट क्षमता के साथ काम कर रहा है। राज्य में भले ही उत्पादन रिकॉर्ड स्तर पर हो रहा हो लेकिन बिजली कटौती की बात झुठलाई नहीं जा सकती है। योगी सरकार ने बुंदेलखंड ग्रीन एनर्जी कॉरिडोर के तहत बड़े पैमाने पर नए सौर ऊर्जा प्लांट स्थापित किए हैं लेकिन यह भी बुनियादी स्तर पर ही है। मायवती और अखिलेश यादव ने अपने कार्यकाल के दौरान जिन प्लांट की शुरुआत की थी, अब तक उन पर ही काम चल रहा है। 

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सोनभद्र में अनपरा-डी थर्मल पावर प्लांट चालू हुआ, बारा और ललितपुर जैसे निजी-सार्वजनिक भागीदारी वाले बड़े पावर प्लांट प्रोजेक्ट्स को तेजी से आगे बढ़ाकर ग्रिड भी मदद कर रहे हैं। मायवती के कार्यकाल में क्रांतिकारी कदम उठाए गए थे। बजाज हिंदुस्तान और जेपी ग्रुप जैसे प्राइवेट प्लेयर को मौका दिया गया, खूब बिजलीघर बने।  

 

 

योगी सरकार ने क्या किया है?

उत्तर प्रदेश में योगी सरकार के कार्यकाल में लगाए गए कई नए थर्मल पावर प्लांट अब पूरी तरह चल रहे हैं। गाटमपुर (कानपुर), खुर्जा (बुलंदशहर), ओबरा-सी, जवाहरपुर (एटा) और पंकी जैसे बड़े प्रोजेक्ट्स की नई सुपरक्रिटिकल यूनिट्स चालू हो चुकी हैं। कई यूनिट्स 2024-2025 में ही कॉमर्शियल प्रोडक्शन शुरू कर चुकी हैं। 

क्या चुनौती है?

उत्तर प्रदेश में बिजली की मांग 30,000 मेगावाट से पार कर चुकी है, लेकिन उत्पादन अभी भी बहुत कम है। सरकार 10 नए थर्मल प्लांट और पुरानी यूनिट्स के विस्तार से हजारों मेगावाट बिजली बढ़ा रही है, लेकिन इनमें 80 प्रतिशत से ज्यादा हिस्सा कोयला आधारित थर्मल पावर पर निर्भर है। ग्लोबल वार्मिंग के इस दौर में कोयले पर इतनी भारी निर्भरता ऊर्जा सुरक्षा तो दे सकती है पर यह सबसे बड़ी कमजोरी भी बन गई है। कोयले की सप्लाई चेन में कोई रुकावट आई या रेलवे पर दबाव बढ़ा तो पूरे राज्य में ब्लैकआउट का खतरा मंडराता है। पुरानी उपेक्षा के कारण बिजली की मांग और आपूर्ति के बीच बड़ा अंतर बरकरार है। यही वजह है कि लोग परेशान हैं। 

 

 

जब बिजली है तो लोगों को मिल क्यों नहीं रही है?

यूपी में बिजली की मांग बढ़कर 30395 मेगावाट तक पहुंच गई है। यह आंकड़ा, शनिवार का है। उत्पादन पर्याप्त होने के बाद भी बिजली के वितरण में खामी आ रही है। बिजली मंत्री एके शर्मा खुद मान रहे हैं कि जर्जर तार, ओवरलोडेड ट्रांसफार्मर और तकनीकी कमियों के कारण सप्लाई लाइनें ट्रिप हो रही हैं। 

कैसे बेहतर हो सकती है बिजली सप्लाई?

पीक ऑवर्स के लोड को संभालने के लिए रिन्यूएबल एनर्जी पर जोर देना होगा। अब रूफटॉप सोलर तकनीत अत्याधुनिक हो चुकी है। अगर किफायती दरों पर बिजली मिले तो कम खपत वाले घरों की ऊर्जा जरूरतें आसानी से पूरी हो सकती हैं, सरकारी व्यवधान से उन्हें परेशान नहीं होना पड़ेगा। सार्वजनिक-निजी भागीदारी पर जोर दिया जाए,जवाबदेही तय की जाए और बुनियादी ढांचे को सुधारा जाए। सौर ऊर्जा और विंड एनर्जी पर भी जोर देने की जरूरत है।

उत्तर प्रदेश राज्य विद्युत उपभोक्ता परिषद के अध्यक्ष और केंद्रीय सलाहकार समिति के सदस्य अवधेश कुमार वर्मा का कहना है, 'ग्रामीण इलाकों में 5 से 8 घंटे ही बिजली मिल पा रही है, जबकि निर्देश 18 घंटे बिजली आपूर्ति की है। कहीं बिजली खराब होती है, कहीं मरम्मत समय से नहीं हो पाती है। संविदा कर्मियों की कमी है, ज्यादा मैन पावर की जरूरत है।

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विद्युत उपभोक्ता परिषद के अध्यक्ष अवधेश कुमार वर्मा ने दावा किया है कि बिजली कंपनियां, कर्मचारियों की किल्लत से जूझ रही हैं। पहले संविदा कर्मचारियों की छंटनी की गई, अब कई सबस्टेशन ऐसे हैं, जहां एक शिफ्ट में काम होता है। अगर कोई खामी आती है तो घंटों इंतजार करना पड़ता है। अवधेश कुमार वर्मा ने इंडियन एक्सप्रेस से बातचीत में दावा किया है कि कई सब स्टेशन ऐसे हैं, जहां 5 से ज्यादा फीडर संभालते हैं। ऐसे में अगर 2 फीडर एक साथ खराब होते हैं तो ठीक करने में घंटों लग जाते हैं, जिससे जनता भड़क जाती है। 

तीसरी मुश्किल, जिस पर काम बात होती है                                                                                      

उत्तर प्रदेश पावर कॉर्पोरेशन लिमिटेड (UPPCL) और बिजली वितरण कंपनियां भारी वित्तीय घाटे से जूझ रहे हैं। इन पर करोड़ों का बकाया है। सरकारी विभागों के बिल नहीं जमा हैं, बड़े बकायदारों की लंबी लिस्ट है। साल वर्ष 2024-25 में घाटा बढ़कर करीब 1.18 लाख करोड़ रुपये पहुंच गया है। पिछले चार साल में यह घाटा 29 हजार करोड़ रुपये बढ़ा है।