पश्चिम बंगाल में कोलकाता की एक मशहूर सड़क का नाम बदलने पर बड़ा राजनीतिक विवाद शुरू हो गया है। मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने 'सुहरावर्दी एवेन्यू' का नाम बदलकर 'गोपाल मुखर्जी रोड' कर दिया है। सरकार का मानना है कि उसने दंगा कराने वाले शख्स का नाम हटाया है लेकिन नया विवाद यह खड़ा हो गया है कि नाम बदलने के चक्कर में सरकार ने एक गलत सुहरावर्दी का नाम हटा दिया है। 'द टेलिग्राफ' की रिपोर्ट के मुताबिक, यह सड़क दंगा कराने वाले हुसैन शहीद सुहरावर्दी के नाम पर नहीं, बल्कि उनके चाचा डॉक्टर हसन सुहरावर्दी के नाम पर थी, जो एक मशहूर डॉक्टर और शिक्षक थे।

 

इस गलतफहमी पर कांग्रेस नेता पवन खेड़ा ने कहा कि हसन सुहरावर्दी बहुत पढ़े-लिखे इंसान थे और का उनका दंगों से कोई संबंध नहीं था। वहीं, टीएमसी नेताओं ने आरोप लगाया कि सरकार ने बिना सोचे-समझे एक डॉक्टर का नाम सड़क से हटा दिया है। दूसरी तरफ, शुभेंदु अधिकारी का कहना है कि दंगे कराने वाले के नाम पर सड़क होना गलत था और न्याय करने के लिए यह नाम बदला गया है।

 

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'द टेलिग्राफ' की रिपोर्ट के मुताबिक, सरकार ने जिस सुहरावर्दी को समझकर नाम हटाया, वह कोई और थे। इतिहासकार किंगशुक चटर्जी का कहना है कि जब बंगाल में दंगे हुए, उसके बाद से लोग 'सुहरावर्दी' सरनेम सुनते ही दंगों के आरोपी हुसैन सुहरावर्दी के बारे में सोचने लगे। कोलकाता नगर निगम ने 8 मार्च 1933 को ही इस सड़क का नाम 'सुहरावर्दी एवेन्यू' रखा था। उस समय हसन सुहरावर्दी की जमीन और घर इसी रोड पर थे, इसलिए यह सड़क उनके नाम पर रखी गई थी।

कौन थे हसन सुहरावर्दी?

'द टेलिग्राफ' की रिपोर्ट के मुताबिक, हसन सुहरावर्दी कोई नेता नहीं थे और न ही उनका दंगों से कोई संबंध था। वह एक डॉक्टर थे जो ऑपरेशन करते थे, कॉलेज में पढ़ाते थे और कलकत्ता यूनिवर्सिटी के वाइस चांसलर भी थे। कांग्रेस नेता पवन खेड़ा ने बताया कि हसन सुहरावर्दी बहुत पढ़े-लिखे इंसान थे और उन्हें खुद रवींद्रनाथ टैगोर ने शांतिनिकेतन आने का न्योता दिया था। रिश्ते में हसन सुहरावर्दी, दंगा कराने वाले हुसैन शहीद सुहरावर्दी के चाचा थे।

जिस सुहरावर्दी के नाम पर यह सारा झगड़ा हो रहा है, उनका पूरा नाम हुसैन शहीद सुहरावर्दी था। साल 1946 में जब बंगाल में बहुत बड़े दंगे हुए थे, तब हुसैन शहीद सुहरावर्दी वहां के मुख्यमंत्री थे। लोग उन्हें इतिहास में बंगाल का कसाई भी कहते हैं और उन्हें ही उन दंगों का सबसे बड़ा जिम्मेदार माना जाता है।

 

इतिहासकार चटर्जी का कहना है कि बहुत कम लोग जानते हैं कि यूनिवर्सिटी के बड़े अधिकारी कौन थे लेकिन कोलकाता के बीच में बनी यह सुहरावर्दी सड़क हमेशा से कुछ राजनीतिक दलों और लोगों के बीच बहस का मुद्दा रही है। बंगाल में पहली बार बीजेपी की सरकार बनी है, इसलिए सरकार ने आते ही इस सड़क का नाम बदलने का बड़ा कदम उठा लिया।

 

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कौन थे गोपाल मुखर्जी?

अब बात करते हैं उस व्यक्ति की जिनके नाम पर अब इस सड़क का नाम 'गोपाल मुखर्जी रोड' रखा गया है। गोपाल मुखर्जी कोलकाता के एक स्थानीय नेता थे। साल 1946 में जब 'डायरेक्ट एक्शन डे' के मौके पर कोलकाता में दंगे भड़के, तो हिंदुओं की रक्षा के लिए गोपाल मुखर्जी ने 'भारतीय जातीय बाहिनी' नाम का एक संगठन बनाया। उन्होंने लोगों को इकट्ठा किया और दंगे के मैदान में उतर गए। कहा जाता है कि शुरुआत में प्रीमियर सुहरावर्दी ने हिंदुओं पर हमले करने की खुली छूट दे रखी थी लेकिन जब गोपाल मुखर्जी की अगुआई में हिंदुओं ने भी डटकर मुकाबला किया और दंगे की आग दोनों तरफ फैल गई, तब जाकर सुहरावर्दी को सेना बुलानी पड़ी और उसके बाद ही दंगे शांत हुए।