केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (CBSE) ने कक्षा छह और उससे ऊपर की कक्षाओं में कन्नड़ को अनिवार्य तृतीय भाषा के तौर पर शामिल किया है। मगर अब पाठ्यपुस्तक की सामग्री और शीर्षक का कर्नाटक में विरोध होने लगा है। आलोचकों ने कन्नड़ पुस्तक के माध्यम से धर्म, संस्कृति और शाहाकारी खाने को थोपने का आरोप लगाया। यह भी कहा कि कन्नड़ भाषा की पुस्तक में कर्नाटक के साहित्य और लोकगीतों को जगह नहीं दी गई है। उनकी जगह धार्मिक कहानियों, शाकाहारी भोजन और भगवान से जुड़ी कथाओं पर जोर दिया गया है।
डेक्कन हेराल्ड की खबर के मुताबिक पीपुल्स अलायंस फॉर फंडामेंटल राइट टू एजुकेशन ने पाठ्यपुस्तक की सामग्री पर आपत्ति जताई। आरोप लगाया कि किताबों का सियासत और संस्कृति थोपने के हथियार के तौर पर इस्तेमाल किया जा रहा है। यह खतरनाक है। संगठन ने छठी कक्षा की आर3 कन्नड़ पुस्तक को चौंकाने वाला बताया।
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'कर्नाटक की संस्कृति को नहीं मिली जगह'
संगठन का कहना है, 'किताब में कर्नाटक की सामाजिक और सांस्कृतिक विविधता को शामिल नहीं किया गया है। तटीय कर्नाटक, उत्तरी कर्नाटक, मालेनाडु और पुराने मैसूर इलाके की लोककथाओं, साहित्य और जीवन का एक अंश नहीं है।'
किताबों के नाम पर भी आपत्ति
अखबार ने शिक्षाविद् वीपी निरंजनारध्या का बयान भी छापा, जिन्होंने पुस्तक के नाम 'कृष्ण' पर आपत्ति जताई। उन्होंने पूछा कि किताब का नाम कृष्ण क्यों रखा गया? सिर्फ छठी ही नहीं, तीसरी कक्षा में भी किताब का नाम 'मृदुला' रखा गया है। ये क्या है? उन्होंने पूछा कि क्या यह किताबों का भगवाकरण करने की साजिश तो नहीं है।
कर्नाटक की परंपराओं की अनदेखी
वीपी निरंजनारध्या का कहना है कि कर्नाटक की पहचान पम्पा, कुवेम्पु, कारंथ और बसवन्ना के विचारों पर आधारित है। मगर एनसीईआरटी ने इसे 'कृष्ण' नाम दे दिया है। एनसीईआरटी ने स्थानीय बौद्धिक और सांस्कृतिक परंपराओं की अनदेखी की और उसकी जगह ईश्वर व धर्म की सियासत की तरफ कदम बढ़ाया है। यह निंदनीय है।
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सिर्फ सात्विक भोजन को बढ़ावा
'स्वास्थ्य ही धन है' पाठ पर भी कर्नाटक के शिक्षाविद वीपी निरंजनारध्या ने आपत्ति दर्ज कराई। उनका तर्क है कि यह पाठ सिर्फ 'सात्विक भोजन' को बढ़ावा देता है। वीपी निरंजनारध्या ने कहा कि संतुलित भोजन को दर्शाने वाली थाली की फोटो में सिर्फ फल, दूध, सब्जी और रोटी को दिखाया गया है। इसमें अंडे, मछली और मांस गायब है।
उनका कहना है कि सिर्फ शाकाहारी भोजन को ही संतुलित बताना भोजन का सियासीकरण है। उन्होंने सवाल पूछा कि अंडे, मछली, चिकन, मटन, तटीय क्षेत्रों के बच्चों की 'मछली', उत्तरी कर्नाटक की मूंगफली के तेल वाली ज्वार की रोटी कहां हैं।


