एथेनॉल मिश्रित पेट्रोल इन दिनों देश की राष्ट्रीय बहस का मुद्दा है। गली के चौराहों से संसद के गलियारों तक लोग E20 पेट्रोल पर सवाल उठा रहे हैं। केंद्र सरकार का कहना है कि एथेनॉल नीति वैश्विक मानकों के अनुरूप है, इसका गाड़ियों पर कोई खराब असर नहीं पड़ता है, अगर ईंधन के क्षेत्र में विदेशी निर्भरता कम करनी है तो इसे अपनाना पड़ेगा। सरकार और मोटर कंपनियां E20 नहीं, E35 और E80 तक का सपना दिखा चुकी हैं।
अमेरिका और ब्राजील की एथेनॉल नीतियां, दुनियाभर में लोकप्रिय हैं। अमेरिका के पास E80 तक के इस्तेमाल लायक गाड़ियों की क्षमता है लेकिन इस्तेमाल 10 से 15 फीसदी तक सीमित है। वहीं ब्राजील में E18 से लेकर E27.5 जैसे मिश्रण को सरकार मंजूर कर चुकी है। अमेरिका दुनिया का सबसे बड़ा एथेनॉल उत्पादक देश है, वहीं ब्राजील दूसरे नंबर पर है। भारत में सरकार E20 की नीति पर आलोचना का शिकार है। सरकार ने संसद में भी कह दिया है कि अब एथेनॉल नीति से पीछे नहीं हटेंगे।
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एथेनॉल पर हंगामा क्यों बरपा है?
भारत में 1 अप्रैल 2026 से पूरे देश में E20 पेट्रोल अनिवार्य कर दिया गया है। E20 पर लोगों का कहना है कि इसके इस्तेमाल से लोगों की कार खराब हो रही है, गाड़ी के माइलेज पर असर आ रहा है। मनीष कश्यप समेत कई यूट्यूबर और इन्फ्लुएंसर ने भी एथेनॉल ब्लेंडिंग के खिलाफ आवाज उठाई। छत्तीसगढ़ के रायपुर में जिला उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग ने एक कार मालिक के पक्ष में फैसला सुनाया।
केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी ने माइलेज पर हल्का असर मानते हुए इंजन खराबी के दावों को एक सिरे से खारिज कर दिया। उनका कहना है कि गाड़ियों के खराब होने की खबरें झूठी हैं, यह सिर्फ सरकार के फैसले की आलोचना के लिए किया जा रहा है। गलत दावे किए जा रहे हैं, सोशल मीडिया पर भ्रम फैलाया जा रहा है।
नितिन गडकरी, केंद्रीय मंत्री:-
यह एक झूठी कहानी फैलाई जा रही है। E20 को देशभर में लाने से पहले ARAI लैब और गाड़ी कंपनियों ने कई टेस्ट किए थे। पुरानी गाड़ियों में कुछ पार्ट्स पर थोड़ा असर पड़ सकता है। इसलिए सर्विसिंग के समय कंपनियां उन्हें मुफ्त में बदल रही हैं। एक भी ऐसी गाड़ी दिखाओ जो E20 से खराब हुई हो।
एथेनॉल क्या है?
एथेनॉल एक रासायनिक यौगिक है जिसका रासायनिक सूत्र C₂H₅OH है। इसे C₂H₆O के तौर पर भी लिखा जाता है। इसे ही एथिल अल्कोहल भी कहते हैं। यह एक रंगहीन, ज्वलनशील तरल है। इसमें तेज गंध होती है। इसे फर्मेंटेशन के बाद शर्करा या स्टार्च युक्त पदार्थों से औद्योगिक स्तर पर एथिलीन के हाइड्रेशन से तैयार किया जाता है।
एथेनॉल पर काम 18वीं शताब्दी के अंत से ही होने लगा था। वैज्ञानिक एंटोनी लेवोजियर ने शुरुआती दौर में इस पर शोध किया था। उन्होंने कार्बन, हाइड्रोजन और ऑक्सीजन का विश्लेषण किया था। स्विस रसायन वैज्ञानिक निकोलस-थियोडोर ने इसका सूत्र तय किया था।
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भारत में कैसे इसे तैयार किया जाता है?
भारत में एथेनॉल गन्ने के शीरे, रस और मक्का से तैयार किया जा रहा है। इसे अनाज से भी तैयार किया जाता है, जिसमें पहले इनके स्टार्च या शूगर को यीस्ट की मदद से फर्मेंट किया जाता है। यह प्रक्रिया जब पूरी होती है, तब यह अल्कोहल और कार्बन डाइऑक्साइड में बदल जाता है। मिश्रण को डिस्टिलेशन के जरिए गर्म करके एथेनॉल को अलग किया जाता है। मॉलिक्यूलर सीव तकनीक से इसे 99.5 फीसदी शुद्ध निर्जल एथेनॉल में बदला जाता है। यह शराब की तरह पी न जा सके इसलिए इसमें कुछ रासायनिक यौगिक मिलाते हैं। इसे मिलाकर, सरकार के एथेनॉल ब्लेंडेड पेट्रोल कार्यक्रम के तहत ऑयल कंपनियों को बेचा जाता है।
एथेनॉल ब्लेंडिंग क्या है?
एथेनॉल ब्लेंडिंग का मतलब पेट्रोल एक तय प्रतिशत एथेनॉल मिलना है। जैसे E20 का मतलब 80 फीसदी पेट्रोल में 20 फीसदी एथेनॉल का मिलाना है।
भारत की एथेनॉल नीति क्या है?
भारत में इसे एथेनॉल ब्लेंडेंड प्रोग्राम (EBP) के तहत लागू किया गया है। इसका मकसद कच्चे तेल के आयात पर निर्भरता कम करना, विदेशी मुद्रा बचाना, प्रदूषण कम करना और किसानों की आय बढ़ाना है। भारत सरकार ने साल 2030 तक यह तय किया था कि एथेनॉल ब्लेंडिंग की तरफ आगे बढ़ेगा। सरकार ने साल 2025 में इसे लागू किया और 12 अप्रैल 2026 तक पूरे देश में E20 को अनिवार्य कर दिया। अब ज्यादातर पेट्रोल पंप पर शुद्ध पेट्रोल या E10 विकल्प नहीं मिल रहे हैं।
एथेनॉल से गाड़ी चलती कैसे है?
तुषार उपाध्याय, ऑटोमोबाइल इंजीनियर है। खबरगांव ने जब यह सवाल किया कि कैसे E20 फ्यूल से गाड़ी चलती है, उन्होंने इसकी प्रक्रिया बताई। इंजन के भीतर एथेनॉल हवा के साथ मिलकर एक ज्वलनशील मिश्रण बनाता है, जिसे इनटेक स्ट्रोक के दौरान सिलेंडर में खींचा जाता है। पिस्टन के ऊपर उठने पर कंप्रेशन स्ट्रोक में यह मिश्रण दबाव के साथ सिकुड़ता है, जिससे इसका तापमान बढ़ जाता है। जैसे ही पिस्टन कंप्रेशन के शिखर पर पहुंचता है, स्पार्क प्लग एक चिंगारी छोड़ता है, जो इस हवा-एथेनॉल मिश्रण को जला देती है।
एथेनॉल का ऑक्टेन रेटिंग पेट्रोल से ज्यादा होता है, यह ज्यादा नियंत्रित और तेजी से जलता है, जिससे नॉकिंग की समस्या कम होती है। इस दहन से तेजी से गैसें फैलती हैं और भारी मात्रा में ऊर्जा निकलती है, जो पिस्टन को नीचे की ओर धकेलती है। इसी ताकत से क्रैंकशाफ्ट घूमता है। यही ऊर्जा गाड़ी के पहियों तक पहुंचकर उसे रफ्तार देती है। इंजन के भीतर दहन के बाद बची गैसें एग्जॉस्ट स्ट्रोक में सिलेंडर से बाहर निकल जाती हैं।
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एथेनॉल के नुकसान क्या हैं?
सोसाइटी ऑफ इंडियन ऑटोमोबाइल मैन्युफैक्चरर्स (SIAM) का कहना है कि हो सकता है कि एथेनॉल ब्लेंडिंग की वजह से 2 से 4 फीसदी तक एवरेज कम हो सकता है। एथेनॉल में पेट्रोल के मुकाबले कम ऊर्जा होती है। इन दिनों लोग 5 से 10 प्रतिशत गिरावट की बात कर रहे हैं लेकिन यह दावे हैं, इसे कार कंपनियां खारिज करती हैं।
1 अप्रैल 2023 के बाद बनी गाड़ियां E20 पेट्रोल के अनुकूल हैं तो उन पर असर नहीं पड़ता है। भारत में महानगरों को छोड़कर, ग्रामीण इलाकों में 15 साल पुरानी गाड़ियां, रिन्यू कराकर दौड़ाई जाती हैं। पुराने वाहनों पर असर दिखने की बात ऑटोमोबाइल इंजीनियर और गैराज मैकेनिक भी कर रहे हैं। पुरानी गाड़ियों पर ड्राइवरों और कार मैकेनिकों का कहना है कि कभी-कभी स्टार्ट करने में परेशानी आ रही है, कॉर्बोरेटर और फ्यूल फिल्टर जाम होने की शिकायत मिल रही है।
किन गाड़ियों पर दिख रहा है असर?
दिलीप यादव सिद्धार्थनगर में गैराज मैकेनिक हैं। उनका कहना है कि हाल के महीनों में लोग पुरानी गाड़ियों के खराब होने की शिकायत लेकर ज्यादा आ रहे हैं। पुरानी गाड़ियों में रबर और पॉलिमर पार्ट्स का इस्तेमाल ज्यादा होता है। ऑटोमोबाइल इंजीनियर तुषार उपाध्याय बताते हैं एथेनॉल हवा से नमी खींचता है और पेट्रोल से ज्यादा मजबूत सॉल्वेंट है, जिससे टैंक और फ्यूल लाइन में फेज में दिक्कत आती है। रबर पार्ट्स फूल जाते हैं, फट जाते हैं या फिल्टर जाम हो जाते हैं। ड्राइवरों का कहना है कि उन्हें हाई ब्लेंड इस्तेमाल करने के लिए मजबूर किया जा रहा है।
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एथेनॉल से गाड़ियों के लिए बेहतर क्यों है?
साइंसस डायरेक्ट की ने इराक की अल-फुरात अल-अवसत टेक्निकल यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं की एक रिपोर्ट हाल ही में जारी की थी। इस स्टडी के मुताबिक पेट्रोल में एथेनॉल मिलाने से इंजन की ताकत और कार्यक्षमता दोनों में बड़ा सुधार होता है। शोधकर्ताओं ने एक सिंगल-सिलेंडर इंजन में 10% से लेकर 40% तक एथेनॉल मिलाकर जांच की।
नतीजों में देखा गया कि जैसे-जैसे एथेनॉल की मात्रा बढ़ाई गई, इंजन कम ईंधन खर्च करके ज्यादा पावर देने लगा। सबसे बेहतर नतीजे E40 के मिश्रण पर मिले, जहां इंजन की ऊर्जा को काम में बदलने की क्षमता में करीब 26 फीसदी की बढ़ोतरी हुई। इसे थर्मल एफिशिएंसी कहते हैं। ईंधन की खपत में लगभग 17 फीसदी की कमी दर्ज की गई।
E10, 20, 40 का मतलब क्या है?
पेट्रोल में एथेनॉल मिलाकर अलग-अलग मिश्रण तैयार किया जाता है। भारत में E20 पर काम चल रहा है। E10 का मतलब है 10 फीसदी एथेनॉल और 90 फीसदी पेट्रोल, E20 का मतलब है 20 प्रतिशत एथेनॉल और 80 फीसदी पेट्रोल।
एथेनॉल की वकालत क्यों करती है सरकार?
पेट्रोलियम एंव नेचुरल गैस मंत्रालय ने इंडियन ऑल कॉर्पोरेशन लिमिटेड, द ऑटोमेटिव रिसर्च एसोसिएशन ऑफ इंडिया और सोसाइटी ऑफ ऑटोमेटिव रिसर्च एसोसिएशन ऑफ इंडिया की रिसर्च के हवाले से कहा था कि E-20 से तेज एक्सीलरेशन, बेहतर राइड क्वालिटी और E-10 की तुलना में 30% कम कार्बन उत्सर्जन होता है। एथनॉल का ऑक्टेन नंबर ज्यादा (108.5) होने से इंजन बेहतर चलता है।
मंत्रालय का कहना है कि E-20 से माइलेज में गिरावट की खबरें गलत हैं। माइलेज ड्राइविंग स्टाइल, मेंटेनेंस, टायर प्रेशर, AC जैसे कई कारकों पर निर्भर करता है। कई कंपनियों की गाड़ियां 2009 से ही E-20 के लिए तैयार हैं। ब्राजील कई सालों से E-27 पर बिना किसी समस्या के चल रहा है।
सरकार का कहना है कि टोयोटा, होंडा, हुंडई जैसी कंपनियां वहां भी वाहन बनाती हैं। पुरानी गाड़ियों में कुछ रबर पार्ट्स बदलने पड़ सकते हैं, लेकिन यह सस्ता और आसान है। पेट्रोल का कहना है कि एथेनॉल महंगा है फिर भी सरकार कार्यक्रम चला रही है क्योंकि इससे ऊर्जा सुरक्षा, किसानों की आय और पर्यावरण को फायदा हो रहा है।
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क्या E-20 की वजह से बीमा नहीं मिलता?
पेट्रोलियम मंत्रालय ने कहा है कि E-20 से कार की बीमा की वैधता प्रभावित होने की अफवाह गलत है। सरकार ने कहा है कि E-20 से आगे बढ़ने का फैसला जल्दबाजी में नहीं लिया जाएगा। 31 अक्टूबर 2026 तक E-20 का रोडमैप पुराना ही रहेगा। सरकार का कहना है कि E-20 स्वच्छ ईंधन की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है और इसे उपभोक्ताओं के हित में संतुलित तरीके से लागू किया जा रहा है।
एथनॉल से देश को क्या मिलता है?
भारत सरकार का तर्क है कि बायोफ्यूल और नेचुरल गैस, देश के ईंधन के लिए सेतु का काम कर रही हैं। ये देश को 2070 तक नेट जीरो लक्ष्य हासिल करने में मदद करेंगे। नीति आयोग की रिपोर्ट बताती है कि गन्ने से बने एथनॉल से ग्रीनहाउस गैस 65 फीसदी कम होती है, जबकि मक्के से बने एथनॉल से 50 फीसदी कमी देखी जाती है।
मंत्रालय का कहना है कि E-20 कार्यक्रमों से किसानों को बड़ी राहत मिली है। इससे गन्ने के बकाए खत्म हुए, मक्का की खेती लाभकारी बनी और किसानों की आय बढ़ी। मंत्रालय का कहना है कि विदर्भ जैसे क्षेत्रों में किसान आत्महत्या की समस्या भी कम हुई है।
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व्यापार में कितना मुनाफा पहुंचा?
साल 2014-15 से 2024-25 पब्लिक सेक्टर की तेल कंपनियों ने E-20 ब्लेंडिंग से 1,44,087 करोड़ रुपये से ज्यादा विदेशी मुद्रा बचाई। करीब 245 लाख मीट्रिक टन कच्चा तेल आयात कम हुआ और 736 लाख मीट्रिक टन CO2 उत्सर्जन घटा, जो 30 करोड़ पेड़ लगाने के बराबर है। इस साल E-20 से किसानों को 40,000 करोड़ रुपये मिलने की उम्मीद है।
