खत्म होती डेडलाइन, 2300 मील से ज्यादा की दूरी...संगीनों के साये में 103 बंधकों की जिदंगी। 70 का दशक, न कोई सटीक खुफिया जानकारी और सरकार भी खिलाफ। तभी एक फैसले ने दुनिया के सबसे साहसिक और करिश्माई ऑपरेशन की नींव रखी। आज भी मिलिट्री के इतिहास, भूभोल और पाठ्यक्रम में इस ऑपरेशन को समझाया व पढ़ाया जाता है।
आतंकियों से बातचीत की आड़ में ऑपरेशन की तैयारी शुरू की गई। प्रधानमंत्री से ग्रीन सिग्नल मिलते ही चार विमानों से कमांडो दस्ता उड़ा और महज 58 मिनट के ऑपरेशन के बाद बंधकों की अपने वतन में वापसी सुनिश्चित हुई। उस वक्त पूरा देश अगवानी को उतर पड़ा। ऐसा स्वागत शायद ही किसी सैन्य अभियान से लौटे सैनिकों को हुआ होगा। दुनिया इसे 'ऑपरेशन एंटेबे' नाम से जानती है। आज बात इजरायली सेना के इसी साहसिक कारनामे की।
यह भी पढ़ें: तन्हाई में नहीं रहेंगे इमरान, हाई कोर्ट से बुशरा बीबी को भी मिली बड़ी राहत
एथेंस से विमान किया गया अगवा
27 जून 1976 को एयर फ्रांस की फ्लाइट ने इजरायल के बेन गुरियन एयरपोर्ट से उड़ान भरी। जहाज को फ्रांस की राजधानी पेरिस जाना था। 12 चालक दल के सदस्य समेत कुल 260 यात्री सवार थे। ग्रीस की राजधानी एथेंस में जब फ्लाइट रुकी, तभी चार आतंकी भी उस पर सवार हो गए।
आतंकियों ने कुछ देर में ही जहाज पर नियंत्रण कर लिया और उसे लीबिया के बेंगाजी एयरपोर्ट की तरफ जबरन मुड़वाया। यहां विमान में ईंधन भरा गया। तीन और आंतकी विमान में सवार हो गए। इसके बाद आतंकियों ने विमान को युगांडा की राजधानी एंटेबे स्थित एयरपोर्ट ले जाया गया। इसके पीछे एक वजह यह था कि युगांडा के राष्ट्रपति इदी अमीन कट्टरपंथी और इजरायली विरोधी रुख वाला था।
इन चार ने किया था हाईजैक
- विल्फ्रेड बोसे
- ब्रिगिट कुहलमैन
- फायज अब्दुल रहीम अल-जबर
- जायल अल-अर्जा
कौन थे अगवा करने वाले?
इनमे से दो आतंकी जर्मन थे। वहीं दो फिलिस्तीनी आतंकी पीएफएलपी-ईओ से जुड़े थे। पीएफएलपी-ईओ फिलिस्तीन की आजादी का एक मोर्चा था। हाईजैक के दो दिन बाद आतंकियों ने 29 जून को गैर-यहूदी और गैर-इजरायलियों को रिहा कर दिया। इसके बाद 105 इजरायली नागरिकों को एंटेबे एयरपोर्ट के पुराने टर्मिनल में ढहराया गया। उस वक्त युगांडा में तानाशाह इदी अमीन का शासन था। उसने इजरायल के खिलाफ जाकर आतंकियों का समर्थन किया।
आतंकियों ने इदी अमीन के माध्यम से इजरायल को दो दिन तक का अल्टीमेटम भेजा। 1 जुलाई तक इजरायली जेलों में बंद 50 कैदियों को रिहा करने... नहीं तो बंधकों को मारने की धमकी दी। इजरायल के पास सिर्फ 48 घंटे का समय था। समय तेजी से घट रहा था और खुफिया जानकारी के नाम पर कुछ नहीं था।
बातचीत की आड़ में सैन्य तैयारी
हर तरह के दांव और हाथ-पैर मारने के बावजूद इजरायल को कोई उम्मीद की किरण नहीं दिख रही थी। जब कोई रास्ता नहीं बचा तो इजरायल ने आतंकियों से बातचीत करना ही उचित समझा। इजरायल ने बातचीत करने की घोषणा की। नतीजा यह हुआ कि आतंकियों ने अल्टीमेटम को तीन दिन बढ़ाकर 4 जुलाई कर दिया। इतना ही समय इजरायली सेना की तैयारी के लिए काफी साबित हुआ।
यह भी पढ़ें: फिंगरप्रिंट से DNA तक, नेपाल में कैसे करें अपनों की पहचान? दूतावास ने बताया
इजरायल की सेना और खुफिया एजेंसी ने इन तीन दिनों में खुफिया जानकारी जुटाई। अभ्यास और सभी तैयारी करने के बाद 1 जुलाई को ऑपरेशन के मुख्य कमांडर ब्रिगेडियर जनरल (सेवानिवृत्त) डैन शोमरॉन, जो बाद में आईडीएफ के चीफ ऑफ स्टाफ बने, ने तत्कालीन प्रधानमंत्री यित्जाक राबिन और रक्षा मंत्री शिमोन पेरेस व चीफ ऑफ स्टाफ के सामने अपना प्लान रखा।
कम ऊंचाई पर उड़े विमान, ताकि रडार को चकमा दिया जा सके
तीन दिन और तैयारी करने के बाद आखिरकार इजरायल की सरकार ने 4 जुलाई को ऑपरेशन की मंजूरी दी। ऑपरेशन थंडरबोल्ट कोडनेम दिया गया। 4 जुलाई की रात इजरायली वायु सेना के चार हरक्यूलिस विमान जिबूती के रास्ते बेहद कम ऊंचाई में युगांडा की तरफ बढ़े, ताकि रडार को चकमा दिया जा सके।
चार जुलाई की रात इजरायली एयरफोर्स का पहला हरक्यूलिस विमान एंटाबे एयरपोर्ट पर उतरा। विमान से एक काली रंग की मर्सिडीज कार उतारी गई। यह कार इदी अमीन की कार जैसी थी। इजरायली कमांडो ने मर्सिडीज कार का इस्तेमाल युगांडा के सैनिकों को चकमा देने में किया, ताकि उन्हें लगे कि यह राष्ट्रपति का काफिला है।
जब ऑपरेशन का रहस्य खुल गया
प्लान यह था कि कोई गोली नहीं चलाएगा। खुद को ऐसे पेश करना है कि मानो युगांडा के सैनिक हो। मर्सिडीज कार पुराने टर्मिनल इमारत की तरफ बढ़ने लगी, जहां पर बंधकों को रखा गया था। कार जैसे ही इमारत के पास पहुंची तो हथियारों से लैस युगांडा के एक सैनिक पर इजरायली सैनिक ने फायरिंग कर दी। इसी के बाद पूरे ऑपरेशन का सीक्रेट खुल गया। इजरायली सैन्य टुकड़ी की अगुवाई योनातन नेतन्याहू के हाथ में थी।
6 मिनट में आतंकियों को मारा, 58 मिनट में ऑपरेशन पूरा
पहले विमान के उतरने के 6 मिनट के बाद दूसरा और तीसरा इजरायली विमान पहुंचा। कुछ ही देर बाद चौथे विमान ने भी लैंडिंग की। युगांडा की सेना ने एयरपोर्ट को पहले से ही घेर रखा था। इजरायल को इसकी भनक थी। तभी दूसरे और तीसरे विमान में अतरिक्त जवानों को भेजा था, ताकि मामला बिगड़ने पर मोर्चा संभाला जा सके। चौथा विमान खाली था। उस में एंटेबे से इजरायल तक आने-जाने का ईंधन भरा था। प्लान के मुताबिक इसका इस्तेमाल बंधकों को सुरक्षित निकालने में किया जाना था।
इजरायल के लेफ्टिनेंट कर्नल (रिटायर्ड) एवी मोर के मुताबिक इजरायली सेना ने महज छह मिनट में सभी आतंकवादियों को मार दिया था। चौथे विमान के पहुंचने से 20 मिनट के भीतर ही बंधकों को विमान पर चढ़ाया जाने लगा था। एंटेबे से उड़ान भरते ही हमारा मिशन सफल हो चुका था।
सभी इजरायल सैनिक विमानों में लौट चुके थे, लेकिन योनातन नेतन्याहू का पता नहीं चला। गोली लगने से उनकी जान चली गई थी। खोजबीन के बाद उनके शव को विमान में रखा गया। एंटेबे एयरपोर्ट पर पहले विमान के उतरने के महज 58 मिनट के भीतर इजरायल ने बंधकों को छुड़ाकर सैन्य इतिहास का सबसे बड़ा करिश्मा रच दिया। ऑपरेशन के दौरान 3 बंधकों की जान गई। छह बंधक और पांच सैनिक घायल हुए। लेफ्टिनेंट कर्नल योनातन नेतन्याहू ने शहादत हासिल की। बाद में नेतन्याहू के सम्मान में इस अभियान का नाम ' ऑपरेशन योनातन' कर दिया गया।
हाईजैकर्स का क्या हुआ?
इजरायली कार्रवाई में युगांडा के 20 सैनिक और सभी सातों हाईजैकर्स को ढेर कर दिया गया। जब इजरायल ने इस ऑपरेशन को अंजाम दिया तो उस वक्त इदी अमीन मॉरीशस की यात्रा पर थे। 75 साल की एक महिला बंधक अस्पताल में भर्ती थी। आईडीएफ को यह जानकारी नहीं थी। मॉरीशस से लौटने के बाद इदी अमीन के आदेश पर उस बुजुर्ग महिला को मौत के घाट उतार दिया गया।
4 जुलाई 1976 की सुबह जब इजरायली वायुसेना के चारों विमान बेन गुरियन एयरपोर्ट पर उतरे तो उनके स्वागत को लाखों की भीड़ खड़ी थी। इजरायली सैनिकों का इतना भव्य स्वागत सैन्य इतिहास के विरले उदाहरण में से एक बन गया। इस ऑपरेशन की कामयाबी का अंदाजा आप इसी बात से लगा सकते हैं कि इस पर लाखों लेख लिखे जा चुके। दर्जनों पुस्तकें छप चुकीं और बड़ी तादाद पर फिल्में और वेब सीरीज बनीं।
इजरायली सेना के गोलानी इन्फैंट्री ब्रिगेड, आईडीएफ के पैराट्रूपर और सायेरेत मतकाल के 176 जवानों ने स्तब्ध करने वाले ऑपरेशन को अंजाम दिया। इस सफल ऑपरेशन ने न केवल आईडीएफ की प्रतिष्ठा को बुलंदियों पर पहुंचाया, बल्कि दुनियाभर में इजरायल की शक्तिशाली छवि उभारी।
