मिडिल ईस्ट की जियोपॉलिटिक्स अब किसी एक महाशक्ति के इशारे पर चलने वाली पुरानी रुपरेखा पर आगे नहीं बढ़ते दिख रही है। ईरान पर हालिया अमेरिकी सैन्य दबाव और क्षेत्रीय अनिश्चितताओं के बीच दुनिया के इस सबसे संवेदनशील हिस्से में एक नई कहानी लिखी जा रही है। इस नई व्यवस्था का मूल मंत्र है, बहु-ध्रुवीय संतुलन यानी किसी एक बड़ी ताकत की मनमानी के आगे झुकने के बजाय अपने रणनीतिक और आर्थिक विकल्पों का दायरा बढ़ाना। 

 

21 अक्टूबर को तेहरान, दुशान्बे और मुंबई से आई तीन अलग-अलग घटनाओं की धुरी इसी एक बड़े बदलाव की तरफ इशारा करती है। अब सवाल उठता है कि क्या ऐसा सच में है कि पश्चिमी एशिया और भारत एक 'सुपरपावर' के भरोसे नहीं रहना चाहते?

 

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ईरान और रूस

ईरान की राजधानी तेहरान में ईरानी विदेश मंत्री अब्बास अराघची और रूसी विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव की मुलाकात हुई। दोनों की ओर से जारी बयान को केवल औपचारिक कूटनीति मानना गलत होगा। अराघची का यह कहना कि तेहरान-मॉस्को संबंध इतने अच्छे कभी नहीं रहे। उन्होंने यह भी कहा कि लावरोव का अमेरिका-इजरायल की कार्रवाई को 'अवैध' ठहराना साफ करता है कि पश्चिमी प्रतिबंधों और दबाव ने दोनों देशों को एक अटूट साझेदारी में बांध दिया है।

 

दोनों ही देशों ने अपने रिश्ते में सुधार कर रहे हैं। इसका प्रत्यक्ष प्रमाण हैं 730 किलोमीटर लंबी नई रेल लाइन परियोजना और 'रणनीतिक साझेदारी समझौते' की आधिकारिक शुरुआत। अमेरिका के एकतरफा रवैये के खिलाफ दोनों देश न केवल संयुक्त राष्ट्र जैसे अंतरराष्ट्रीय मंचों पर एक-दूसरे का बचाव कर रहे हैं बल्कि कैस्पियन सागर में सुरक्षा और अंतरराष्ट्रीय नॉर्थ-साउथ ट्रांसपोर्ट कॉरिडोर (INSTC) के जरिए एक वैकल्पिक व्यापार मार्ग भी बना रहे हैं।

'इंडिया-फर्स्ट' रणनीति

ताजिकिस्तान के दुशान्बे में SCO बैठक के दौरान भारत के रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने चाबहार पोर्ट और INSTC की पैरवी को किसी 'अमेरिका विरोधी' गुट में भारत के शामिल होने के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। यह पूरी तरह भारत का अपना रणनीतिक हित है। पाकिस्तान द्वारा जमीनी रास्ता रोके जाने के बाद, चाबहार भारत के लिए अफगानिस्तान और संसाधन-समृद्ध मध्य एशिया तक पहुंचने का केवल एक भरोसेमंद लाइफलाइन है।

 

राजनाथ सिंह का यह कहना कि कनेक्टिविटी परियोजनाएं संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता के सम्मान पर आधारित होनी चाहिए। यह एक तरफ चीन की 'बेल्ट एंड रोड' (BRI) नीति का जवाब है तो दूसरी तरफ दुनिया को यह स्पष्ट संकेत भी है कि भारत अपने व्यापारिक हित साधने के लिए किसी भी देश के दबाव में अपनी कनेक्टिविटी योजनाओं से समझौता नहीं करेगा।

भारत और UAE

एक तरफ तेहरान में रूस-ईरान मिल रहे थे तो दूसरी तरफ मुंबई में भारत और UAE के बीच रिश्तों को आगे बढ़ाया जा रहा था। UAE के विदेश मंत्री शेख अब्दुल्ला बिन जायद अल नाहयान का यह कहना कि दोनों देश इस ओर काम कर रहे हैं कि वे और भी करीब आए। यह दिखाता है कि पश्चिम एशिया का यह सबसे बड़ा आर्थिक केंद्र अपनी रणनीतियों में संतुलन बना रहा है।

 

अमेरिका और चीन के बाद UAE भारत का तीसरा सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार है। क्षेत्रीय तनाव और तेल संकट के दौर में UAE और भारत के बीच व्यापार, निवेश, ऊर्जा और लॉजिस्टिक्स का यह मजबूत नेटवर्क दोनों देशों को वैश्विक मंदी या तेल संकट के झटकों से बचाता है। UAE की रणनीति साफ है। वह पारंपरिक पश्चिमी सहयोगियों पर पूरी तरह निर्भर रहने के बजाय भारत जैसी तेजी से उभरती आर्थिक ताकत के साथ लंबे समय के लिए आर्थिक सुरक्षा सुनिश्चित कर रहा है।

 

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इन तीनों घटनाओं के बाद यह नहीं कहा जा रहा है कि यह सभी देश अमेरिका से अलग कोई गुट बना रहे हैं। ऐसा दिख रहा है कि इस अनिश्चित समय में एक ही धुरी पर निर्भर रहना किसी भी विकासशील देश के लिए चुनौतीपूर्ण हो सकता है। ईरान और रूस अपने अस्तित्व के लिए पश्चिम से अलग नए रास्ते बना रहे हैं। भारत अमेरिका के साथ संबंध मजबूत रखते हुए भी चाबहार के जरिए अपने क्षेत्रीय व्यापारिक हितों की रक्षा कर रहा है।

 

UAE वैश्विक अनिश्चितता के बीच भारत के साथ आर्थिक रिश्ते मजबूत कर अपनी अर्थव्यवस्था को सुरक्षित कर रहा है। पश्चिम एशिया और भारत की यह रणनीति साबित करती है कि आने वाले दशक में वही देश और अर्थव्यवस्थाएं सुरक्षित रहेंगी जो किसी एक महाशक्ति पर निर्भर बनने के बजाय अपने रणनीतिक और आर्थिक विकल्प खुला रखेंगी।