अमेरिका और ईरान के बीच पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद में हुई शांति वार्ता खत्म हो गई। यह बात बिना किसी समझौते के खत्म हो गई है। साल 1979 में हुई इस्लामिक क्रांति के बाद साल 1979 के बाद से कभी, ईरान और अमेरिका बातचीत के लिए एक मंच पर नहीं आए थे। दशकों बाद 21 घंटे तक दोनों देशों के बीच वार्ता चली लेकिन बेनतीजा रही।
अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने कहा कि अमेरिका ने अपना 'बेहतरीन और अंतिम' प्रस्ताव दे दिया है। उन्होंने ईरान को चेतावनी देते हुए कहा कि अब गेंद ईरान के पाले में है। जेडी वेंस का कहना है कि अमेरिका काफी लचीला और समझौता करने को तैयार था, लेकिन ईरान अपनी शर्तें मानने को तैयार नहीं हुआ।
ईरान ने बातचीत के असफल होने का ठीकरा अमेरिका पर फोड़ा है। ईरान के विदेश मंत्रालय ने कहा है कि अमेरिकी ने ज्यादा और अनुचित मांगे रखी हैं, जिन्हें स्वीकार ही नहीं किया जा सकता है।
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किन मुद्दों पर अटकी बात?
- यूरेनियम संवर्धन: अमेरिका चाहता था कि ईरान अपने परमाणु कार्यक्रम को खत्म करे, यूरेनियम अमेरिका को लौटाए, ईरान इसके लिए तैयार नहीं हुआ।
- स्ट्रेट ऑफ होर्मुज: अमेरिका होर्मुज पर नियंत्रण चाहता है, ईरान अपना नियंत्रण छोड़ने के लिए तैयार नहीं है। ईरान की सहमति के बिना, इस स्ट्रेट से कोई विमान नहीं गुजरेगा।
- जंग में हुए नुकसान का मुआवजा: यह युद्ध, इजरायल और अमेरिका ने मिलकर ईरान पर थोपा है। ईरान ने युद्ध के लिए मुआवजा मांगा, अमेरिका ने इसमें भी अनाकानी की।
- प्रतिबंध हटाना: ईरान चाहता था कि अमेरिकी और दुनिया के सारे प्रतिबंध ईरान से खत्म किए जाएं, अमेरिका इसके लिए भी तैयार नहीं हुआ।
ईरान क्या चाहता है?
ईरान ने कहा है कि इस्लामिक रिपब्लिक, परमाणु बम नहीं बनाना चाहता, सिर्फ शांतिपूर्ण परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम चलाना चाहता है। अमेरिका ईरान से पूरी गारंटी चाहता है कि वह कभी भी परमाणु हथियार नहीं बनाएगा। ईरान अभी भी यूरेनियम संवर्धन का अधिकार छोड़ने को तैयार नहीं दिख रहा है। ईरान संवर्धन नहीं रोकेगा।
ईरान ने साफ कहा है कि हार्मुज स्ट्रेट की स्थिति में तब तक कोई बदलाव नहीं होगा जब तक अमेरिका उचित समझौता नहीं करता। ईरान ने कहा कि वह बातचीत में कोई जल्दबाजी नहीं कर रहा है। अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने कहा कि कुछ मुद्दों पर दोनों पक्ष सहमत हो गए थे, लेकिन मुख्य मुद्दों पर समझौता नहीं हो सका।
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अमेरिका क्या कह रहा है?
जेडी वेंस ने कहा है कि समझौते का असफल रहना, ईरान के लिए अमेरिका से ज्यादा नुकसानदायक है। अब सवाल यह है कि ईरान अगला कदम क्या उठाएगा और क्या ट्रंप फिर से ईरान की सभ्यता को मिटाने का दावा करेंगे या नहीं। दुनियाभर के देश, इस तनाव को लेकर आशंका में हैं।
