वाजना श्रामिका रैतु कांग्रेस पार्टी (YSRCP) के अध्यक्ष और आंध्र प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री वाईएस जगन मोहन रेड्डी ने रविवार को कहा कि चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति के बिल पर नेशनल डेमोक्रेटिक अलायंस (NDA) सरकार का समर्थन करना उनकी पार्टी की गलती थी। जगन रेड्डी ने कहा है कि पार्टी को अब इसका पछतावा है। उन्होंने मांग की कि कानून में बदलाव कर चयन समिति में फिर से भारत के मुख्य न्यायाधीश को रखा जाए।
सोमवार को उनके इस बयान पर मुख्यमंत्री एन चंद्रबाबू नायडू ने उंदावल्ली में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस बुलाई। सीएम नायडू ने तंजिया लहजे में कहा कि पहले जगन रेड्डी ने मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) की नियुक्ति की प्रक्रिया का समर्थन किया था। अब चुनाव आयोग (EC) उनकी बात नहीं मानता, इसलिए वह विरोध कर रहे हैं।
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क्या सवाल उठा रहे हैं जगन रेड्डी?
चुनाव आयोग की चयन प्रक्रिया में अभी मुख्य चनाव आयुक्त और दो अन्य आयुक्तों का चयन तीन सदस्यों की समिति करती है। प्रधानमंत्री, एक केंद्रीय मंत्री और लोकसभा में नेता विपक्ष होते हैं। जगन रेड्डी का कहना है कि इस व्यवस्था से चुनाव आयोग की बनावट एकतरफा हो गई है। उनके शब्दों में यह ऐसा है, जैसे छात्र खुद अपना परीक्षक चुन रहे हों।
YSRCP ने साल 2023 में इस कानून को लोकसभा और राज्यसभा, दोनों में समर्थन दिया था। तब विपक्ष ने समिति से CJI को बाहर रखने पर आपत्ति जताई थी। अब यह कानून अभी सुप्रीम कोर्ट में चुनौती के दायरे में है।
अभी बगावत नई-नई है?
जगन रेड्डी चुनाव आयोग की कार्यशैली पर पहले भी सवाल उठा चुके हैं। सितंबर में इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट सामने आई थी। दावा किया गया था कि चुनाव आयोग में सब ठीक नहीं है। मतदाता सूची के संशोधन ( SIR ) के दौरान दो चुनाव आयुक्त विवेक जोशी और सुखबीर सिंह संधू ने आपत्ति जताई थी। मुख्य चुनाव आयुक्त ने उनकी आपत्तियों को स्वीकार नहीं किया था। जगन रेड्डी ने तब कहा था कि जनता को जानना चाहिए कि किन मामलों में आपत्तियां दर्ज की गईं थीं, उन पर क्या कार्रवाई की गई है।
NDA और YSRCP का रिश्ता कैसा है?
YSRCP के नेताओं का कहना है कि पार्टी ने हमेशा कहा था कि सरकार को उसका समर्थन मुद्दों पर आधारित रहेगा। उनके मुताबिक इस मुद्दे पर जनता को सरकार से ज्यादा भरोसा चाहिए। यह भी सच है कि भारतीय जनता पार्टी की अगुवाई वाले एनडीए गठबंधन के साथ जगन रेड्डी की पार्टी औपचारिक तौर पर कभी गठबंधन में शामिल नहीं हुई है। गठबंधन न होने के बाद भी पार्टी ने कई बार एनडीए का साथ दिया है। साल 2019 से 2024 के बीच सत्ता में रहते हुए नागरिकता संशोधन कानून (CAA), प्रस्तावित राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (NRC) और अनुच्छेद 370 हटाने को लेकर YSRCP ने एनडीए का साथ दिया है। साल 2020 में विवादित कृषि कानूनों पर केंद्र का साथ पार्टी ने दिया था। साल 2023 में विपक्ष के बहिष्कार के बावजूद YSRCP के सांसद नए संसद भवन के उद्घाटन में पहुंचे थे।
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राजनीतिक तौर पर किस हाल में है YSRCP?
साल 2024 का चुनाव YSRCP के लिए ठीक नहीं रहा। पार्टी सत्ता से बाहर हुई और लोकसभा में उसके सिर्फ 4 सांसद रह गए। जब बारी विपक्ष चुनने की आई तो NDA के स्पीकर उम्मीदवार के साथ यह दल खड़ा रहा। साल 2025 में उपराष्ट्रपति पद के लिए सी पी राधाकृष्णन को एनडीए ने आगे किया। यहां भी दल ने एनडीए का साथ दिया। परिसीमन विधेयक पर भी पार्टी ने साथ देने से इनकार नहीं किया। यह विपक्ष की राजनीति के लिए चौंकाने वाला रहा।
अतीत से सबक ले रही है YSRCP?
- विधानसभा चुनाव
आंध्र प्रदेश की सबसे मजबूत राजनीतिक दल बनकर उभरी YSRCP यह लय बरकरार ही नहीं रख पाई। 4 जून 2024 को नतीजे आए तो तेलुगु देशम पार्टी ने 175 सीटों में से 135 सीटें जीत लीं। यह कुल सीटों का लगभग 77 फीसदी है। टीडीपी को प्रचंड बहुमत मिला। जन सेना पार्टी को 21 सीटें मिलीं। भारतीय जनता पार्टी को 8 सीटें हासिल हुईं। तीनों दलों ने गठबंधन कर चुनाव लड़ा था। जिस पार्टी ने साल 2019 में 151 सीटें जीत ली थीं, 86 फीसदी सीटों पर कब्जा था, वह 12 सीट भी नहीं बचा पाई। YSRCP के पास सिर्फ 11 विधायक हैं। 6 प्रतिशत भी विधानसभा में प्रतिनिधित्व नहीं है। 2019 में टीडीपी के पास केवल 23 सीटें थीं, जन सेना के पास 1 और भारतीय जनता पार्टी के पास एक भी नहीं। जन सेना, टीडीपी और बीजेपी का ऐसा गठजोड़ बना है कि केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार इस जोड़ पर टिकी हुई है। - लोकसभा चुनाव
सााल 2024 के लोकसभा चुनाव में टीडीपी 16 सांसदों के साथ सबसे बड़ी पार्टी बनी। राज्य में YSRCP को सिर्फ 4 सीटें मिलीं, बीजेपी 3 सीटों पर आई और जनसेना पार्टी के 2 सांसद जीते। साल 2019 में ये आंकड़े बिलकुल अलग थे। पार्टी के पास 22 सांसद थे। अब जगन रेड्डी के सामने चुनौती है कि किसी भी तरह से राजनीतिक तौर पर हाशिए पर हैं, उस स्थिति से बाहर निकलें।
वामदलों से उम्मीद क्यों?
YSRCP को अब लगने लगा है कि आंध्र प्रदेश में बड़े पैमाने पर मतदाताओं के नाम काटे गए हैं। यही बात CPI(M) और CPI और विपक्षी दल कर रहे हैं। अब विपक्ष के तौर YSRCP को भी खुद को मजबूत विपक्ष के तौर पर दिखाना चाहती है। पार्टी उन लोगों के साथ अपना समर्थन जता रही है, जिनके नाम वोटर लिस्ट से बाहर हुए हैं। सत्तारूढ़ गठबंधन, चुनाव आयोग के साथ खड़ा है।
अब CJP वाला भी दांव चल रहे जगन रेड्डी?
जगन रेड्डी ने कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के नेताओं का भी खुलकर समर्थन किया है। CJP के सौरभ दास और आशुतोष रांका को जंतर-मंतर पर तिरंगा फहराने के बाद गिरफ्तार किया गया था। जगन रेड्डी ने कहा कि गिरफ्तारियों से कुछ हल नहीं होगा, इससे हालात और बिगड़ेंगे। तेलंगाना की भारत राष्ट्र समिति (BRS) और तमिलनाडु की DMK भी CJP के समर्थन में है। अब जगन रेड्डी भी खुद को युवाओं के हिमायती के तौर पर पेश कर रहे हैं।
क्या अस्तित्व बचाने की लड़ाई लड़ रही है YSRCP?
अभी तक के सियासी समीकरण बता रहे हैं कि एनडीए गठबंधन मजबूत है। जनसेना, बीजेपी और टीडीपी एक-दूसरे का साथ हर मोर्चे पर दे रहे हैं। YSRCP विपक्ष में है, बीजेपी का साथ देने के बाद भी बीजेपी अपने दोनों सहयोगी दलों का साथ छोड़कर अचानक YSRCP का साथ नहीं देगी। ऐस में YSRCP के पास सिर्फ एक ही राह नजर आ रही है कि सत्ता का विरोध और विपक्ष के साथ बेहतर तालमेल।
अगर वाम दल और अन्य छोटे दल साथ मिल जाएं तो हो सकता है कि जमीनी स्तर पर अपना खोया जनाधार, जगन रेड्डी वापस पा सके। उनकी बहन वाईएस शर्मिला राज्य कांग्रेस की कमान संभाल रही हैं। उनके साथ जगन रेड्डी के रिश्ते बेहद तल्ख हैं। अभी कांग्रेस के साथ वह जाते नजर भी नहीं आ रहे हैं। ऐसे में तीसरे मोर्चे के बैनर तले वह खुद को साबित करने की लड़ाई कर रहे हैं।
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क्यों खास हैं जगन मोहन रेड्डी, कितने मजबूत?
जगन मोहन रेड्डी के पिता वाईएस राजशेखर रेड्डी 2 बार के मुख्यमंत्री थे। उनकी बहन शर्मिला भी राजनीति में हैं लेकिन धुर विरोधी हैं। जगन रेड्डी ने अपनी राजनीति कांग्रेस से शुरू की और 2009 में कडप्पा से सांसद चुने गए। उसी साल पिता का हेलिकॉप्टर हादसे में निधन हुआ। पिता के निधन के बाद ओडारपु यात्रा को लेकर पार्टी नेतृत्व से टकराव हो गया।
नवंबर 2010 में उन्होंने पार्टी और लोकसभा सीट छोड़ दी। मार्च 2011 में YSR कांग्रेस पार्टी बनाई। उसी साल कडप्पा उपचुनाव में 5,45,043 वोट के अंतर से जीते। CBI ने 27 मई 2012 को उन्हें अवैध संपत्ति जुटाने के आरोपों में गिरफ्तार किया। वह करीब 16 महीने जेल में रहे और 24 सितंबर 2013 को रिहा हुए। पार्टी इसे राजनीतिक साजिश बताती रही है।
कैसे बढ़ा सियासी कद?
साल 2014 में पार्टी को 175 में से 67 सीटें मिलीं और वे नेता प्रतिपक्ष बने। नवंबर 2017 से जनवरी 2019 तक 3,000 किलोमीटर की प्रजा संकल्प पदयात्रा की। साल 2019 में पार्टी ने 175 में से 151 विधानसभा सीटें और 25 में से 22 लोकसभा सीटें जीतीं। उन्होंने 30 मई 2019 को शपथ ली और जून 2024 तक मुख्यमंत्री पद पर बने रहे। सत्ता से बाहर गए जगन मोहन रेड्डी, विरोध के जरिए सत्ता में आने की तैयारी कर रहे हैं।
