दिवाली या किसी भी बड़े उत्सव पर जब देश भर में पटाखे छूटते हैं तो उसके पीछे तमिलनाडु के एक छोटे से शहर शिवकाशी की बहुत बड़ी भूमिका होती है। करीब 1,070 से ज्यादा लाइसेंस प्राप्त मैन्युफैक्चरिंग यूनिट्स के साथ शिवकाशी भारत के संगठित पटाखा कारोबार का लगभग 85% हिस्सा संभालता है। देश के कुल पटाखा उत्पादन में इसका योगदान करीब 90% बताया जाता है। लगभग 3 लाख लोगों को सीधा रोजगार और 5 लाख परिवारों की आजीविका इसी एक शहर पर टिकी हुई है। लेकिन अर्थशास्त्र के नजरिए से देखें तो यह मॉडल एक दोधारी तलवार जैसा है। 

 

एक ही भौगोलिक क्षेत्र में किसी पूरे उद्योग का केंद्रित होना, जिसे इंडस्ट्रियल क्लस्टर कहा जाता है, लागत कम करने और संसाधनों के इस्तेमाल में तो मददगार साबित होता है। इसी के साथ अगर किसी दुर्घटना, भारी बारिश या कड़े प्रशासनिक प्रतिबंधों के कारण शिवकाशी में उत्पादन थम जाए तो इसका सीधा असर पूरे देश की दिवाली और पटाखा बाजार पर पड़ता है।

 

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कैसे बना भारत की 'पटाखा राजधानी'?

शिवकाशी में इस सफर की शुरुआत 1920 के दशक में हुई थी। पी. अय्या नाडार और शन्मुगा नाडार जैसे शुरुआती उद्यमियों ने यहां सबसे पहले माचिस बनाने का काम शुरू किया। 1925 में नेशनल फायरवर्क्स की नींव पड़ी और द्वितीय विश्व युद्ध (1938-1944) के दौरान जब विदेशों से पटाखों का आयात रुका तो स्थानीय कारोबार को तेजी से फलने-फूलने का मौका मिला।

 

शिवकाशी के इस केंद्र के रूप में उभरने के पीछे कुछ मुख्य कारण रहे। पहला, यहां की शुष्क और गर्म जलवायु पटाखों के निर्माण और सुखाने की प्रक्रिया के लिए मुफीद रही। दूसरा, खेती की सीमित संभावनाओं के कारण स्थानीय लोगों को गैर-कृषि रोजगार का बेहतर विकल्प मिला। और तीसरा, माचिस उद्योग के अनुभव ने स्थानीय उद्यमियों को केमिकल और बारूद के इस्तेमाल की शुरुआती समझ दी।

एक ही जगह फैक्ट्रियां होने की 'ताकत' और 'कमजोरी'

जब एक ही शहर में पूरा उद्योग बस जाता है तो उसे एग्लोमिनेशन इकोनॉमी कहते हैं। शिवकाशी का पूरा ढांचा एक आत्मनिर्भर इकोसिस्टम की तरह काम करता है। बारूद और केमिकल सप्लायर, पैकिंग बॉक्स बनाने वाली कंपनियां, लेबल प्रिंटिंग प्रेस (शहर में 500 से अधिक प्रिंटिंग यूनिट्स) और ट्रांसपोर्ट नेटवर्क सब कुछ कुछ किलोमीटर के दायरे में मौजूद हैं। साथ ही एक ही जगह पर कच्चा माल और अनुभवी कारीगर मिलने से उत्पादन लागत नियंत्रित रहती है।

 

इसी में जोखिम भी शामिल है। यदि त्योहारों के सीजन से ठीक पहले शिवकाशी में भारी बारिश हो जाए या कोई बड़ा हादसा हो जाए तो विकल्प के तौर पर देश के पास कोई दूसरा बड़ा पटाखा क्लस्टर मौजूद नहीं है। पटाखा निर्माण एक संवेदनशील और खतरनाक काम है। Explosives Act, 1884 और Explosives Rules, 2008 के तहत PESO (पेट्रोलियम एंड एक्सप्लोसिव्स सेफ्टी ऑर्गनाइजेशन) के कड़े नियम लागू होते हैं। किसी एक फैक्ट्री में लापरवाही या विस्फोट से आसपास के पूरे नेटवर्क पर नियामकीय कार्रवाई का खतरा मंडराने लगता है।

 

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चीन का लियुयांग बनाम भारत का शिवकाशी

अगर वैश्विक स्तर पर तुलना करें तो चीन का हुनान प्रांत स्थित लियुयांग शहर दुनिया का सबसे बड़ा पटाखा उत्पादन केंद्र है। लेकिन दोनों शहरों के काम करने के तरीके में बड़ा अंतर है। भारत में अभी हाथ से बनाए हुए पटाखे पर जोर दिया जाता है जबकि चीन में मशीनीकरण पर भारी जोर दिया जाता है। UN Comtrade (WITS) के आंकड़ों के मुताबिक, 2024 में चीन ने दुनिया भर में करीब 1.16 अरब डॉलर के पटाखों का निर्यात किया जबकि भारत का अंतरराष्ट्रीय पटाखा निर्यात बेहद सीमित रहा। सख्त अंतरराष्ट्रीय मानक, गुणवत्ता जांच और लॉजिस्टिक्स की कमी के कारण भारतीय पटाखे वैश्विक बाजार में चीन से काफी पीछे रह जाते हैं।

 

चीन के मॉडल से सबक लेते हुए तमिलनाडु सरकार (TIDCO) अब शिवकाशी में लगभग 35 एकड़ में एक कॉमन फैसिलिटी सेंटर बनाने पर काम कर रही है। भारत के पटाखा उद्योग को सुरक्षित और मजबूत बनाने के लिए 3 कदम बेहद जरूरी हैं। पहला और बहुत जरूरी इंसानी जोखिम को कम करने के लिए खतरनाक केमिकल मिक्सिंग और पैकेजिंग में ऑटोमैटिक मशीनों का इस्तेमाल। दूसरा, छोटे निर्माताओं के लिए एक ही जगह पर सुरक्षा मानकों की जांच, लैब और सर्टिफिकेशन की सुविधा दी जाए। तीसरा, सारे उत्पादन को एक ही जगह केंद्रित करने के बजाय देश के अन्य हिस्सों में भी कड़े सुरक्षा नियमों के तहत छोटे क्लस्टर विकसित करना ताकि जोखिम बंट सके।