भारत और पाकिस्तान के नेताओं के बयानबाजी में तल्खी दिख रही है। हाल ही में पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने कहा था कि अगर भारत पानी रोकता है तो पाकिस्तान युद्ध छेड़ देगा। मगर पर्दे के पीछे कहानी कुछ अलग ही चल रही है। श्रीलंका की राजधानी कोलंबो और थाईलैंड के बैंकॉक में दोनों देशों के प्रतिनिधिमंडल ने इसी सप्ताह ट्रैक-2 टू कूटनीति वार्ता की।

 

WION की रिपोर्ट के मुताबिक पिछले साल ऑपरेशन सिंदूर के बाद दोनों देशों के बीच कई अनौपचारिक बैठकें हो चुकी हैं। हालांकि अभी तक औपचारिक वार्ता की कोई गुंजाइश नहीं दिख रही है। रिपोर्ट में बताया गया कि दोनों पक्षों ने आतंकवाद और पानी जैसे मुद्दों पर खुलकर चर्चा की। बैठक का उद्देश्य संकट की स्थिति में संवाद तंत्र को मजबूत करना और संभावित तनाव को रोकने या मैनेज करने का उपाय तलाशना है, क्योंकि सरकारी स्तर पर बातचीत बिल्कुल ही बंद है। 

 

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रिपोर्ट्स के मुताबिक एक दौर की बैठक कतर की राजधानी दोहा में आयोजित की गई। कुछ और बैठकें अन्य तटस्थ्य देशों में आयोजित की गईं। इन बैठकों में सेवानिवृत्त सेना के अधिकारी, राजनयिक, मीडियाकर्मी और अकादमिक विद्वान शामिल होते हैं।

कहां से बदला भारत का रुख?

पिछले साल नवंबर महीने में दिल्ली में लाल किला के पास एक कार धमाका हुआ था। इसमें करीब 11 लोगों की जान गई थी। सरकार ने पहले पाकिस्तान का नाम नहीं लिया। हालांकि बाद में पाकिस्तान कनेक्शन सामने आया था। पिछले अन्य हमलों की तरह इस बार भारत सरकार ने पाकिस्तान के खिलाफ कोई बड़ा कदम नहीं उठाया। न ही आतंकी ठिकानों पर हमला किया। माना जा रहा है कि भारत के रुख में बदलाव का यह पहला उदाहरण था।

क्या संघ भी बातचीत के पक्ष में

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) प्रमुख मोहन भागवत ने हाल ही केरल की राजधानी तिरुवनंतपुरम में आयोजित एक कार्यक्रम में पाकिस्तान के साथ बातचीत की वकालत की थी। भागवत ने कहा था, 'हम हिटलर नहीं हैं, इसलिए बातचीत के दरवाजे खुले रखने होंगे'।

 

संघ प्रमुख से पहले दत्तात्रेय होसबले ने भी कहा था, 'किसी भी देश की सुरक्षा और आत्मसम्मान की रक्षा करना आवश्यक है और तत्कालीन सरकार को इसका ध्यान रखना चाहिए। लेकिन साथ ही हमें उनके लिए दरवाजे बंद नहीं करने चाहिए। हमें हमेशा उनसे संवाद करने के लिए तैयार रहना चाहिए।' अब संघ नेताओं के बयानों को अनौपचारिक वार्ता से जोड़कर देखा जा रहा है।

 

द प्रिंट ने अपनी रिपोर्ट में बताया कि ऑपरेशन सिंदूर के बाद दोनों देशों के बीच ट्रैक 2 वार्ता तीन दौर की आयोजित की जा चुकी है। इसमें विवाद समाधान के बजाय संघर्ष प्रबंधन पर अधिक बातचीत हो रही है। इसी साल 2 फरवरी को दोहा में दो दिनों की बैठक आयोजित की गई। पिछले साल दिसंबर में भारत के पूर्व में स्थित एक राजधानी में आयोजित की गई। वहीं ओमान की राजधानी मस्कट में भी एक वार्ता का भी उल्लेख किया गया।

क्यों याद आ रहा मार्को रुबियो का दावा?

कारगिल युद्ध के बाद भारत और पाकिस्तान के बीच रिश्ते सबसे नाजुक मोड़ पर हैं। पिछले साल पहलगाम हमले के जवाब में भारत ने पाकिस्तान में स्थित आतंकी ठिकानों पर हमला किया था। इसके बाद दोनों देशों के बीच चार दिनों का संघर्ष चला। 10 मई को पाकिस्तान के अनुरोध पर संघर्ष विराम हुआ। उस वक्त अमेरिका के विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने अपने एक्स पोस्ट में दावा किया था कि भारत और पाकिस्तान ने युद्धविराम के अलावा एक तटस्थ स्थान पर विभिन्न मुद्दों पर बातचीत करने पर सहमति  जताई है। उस वक्त केंद्र सरकार ने रुबियो के दावे का खंडन किया था और कहा था कि इस्लामाबाद के साथ बातचीत करने पर कोई सहमति नहीं दी गई है।

 

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क्यों अहम मानी जाती है ट्रैक-2 बैठक?

द प्रिंट ने पांच साल से अधिक वर्षों तक अनौपचारिक वार्ता में शामिल रह चुके व्यक्ति के हवाले से बताया कि पाकिस्तानी सेना का पाकिस्तानी राज्य पर नियंत्रण देखते हुए यह तंत्र नई दिल्ली को शत्रु की सोच से अवगत रहने के एक मंच और संदेशवाहक का काम करता है। ट्रैक II की बैठकों से सरकार को यही लाभ मिलता है, क्योंकि सरकार इन बैठकों से अवगत रहती है। मगर शामिल नहीं होती है।

 

पहलगाम हमले के बाद भारत ने पाकिस्तान के साथ व्यापार को बंद कर दिया। अपनी सीमा सील कर दी। सिंधु जल संधि को निलंबित कर दिया। ऑपरेशन सिंदूर के करीब 14 महीने बाद आज भी दोनों देशों के बीच सिंधु जल समझौते पर तनाव बना हुआ है। ऐसे में इस्लामाबाद क्या सोचता है, यह समझने का अवसर भारत को इन्हीं बैठकों के माध्यम से मिलता है। 

 

केंद्र में मोदी सरकार के आने के बाद 2016 में सर्जिकल स्ट्राइक, 2019 में बालाकोट एयर स्ट्राइक और 2025 में ऑपरेशन सिंदूर हुआ। हर बार भारतीय सेना की कार्रवाई पिछले से अधिक व्यापक रही। 1971 के बाद ऑपरेशन सिंदूर में पहली बार दोनों देशों के बीच इतनी लंबी सीमा पर मिसाइल और ड्रोन संघर्ष देखने को मिला।

 

दोनों ही देश परमाणु संपन्न हैं। डोनाल्ड ट्रंप ने पिछले साल ही दावा किया था कि उन्होंने सीजफायर करवाकर लाखों लोगों की जान बचाई है। ऐसे में ट्रैक 2 वार्ता दोनों देशों को किसी गफलत से बचने में मदद करती हैं, क्योंकि आधिकारिक चैनल से बातचीत बिल्कुल ही बंद है।