इलाहाबाद हाई कोर्ट के जस्टिस गौतम चौधरी ने सोमवार को अपने विदाई भाषण में कहा कि भारत आजादी के करीब 80 साल बाद भी अंग्रेजी भाषा से मुक्त नहीं हो पाया है। जस्टिस गौतम चौधरी 8 नवंबर को सेवानिवृत्त हो रहे हैं। उन्होंने अपना भाषण हिंदी में दिया।
जस्टिस गौतम चौधरी ने कहा कि देश संवैधानिक और भौगोलिक रूप से अंग्रेजों से आजाद हो गया है लेकिन अंग्रेजी भाषा से आजादी नहीं मिली। उन्होंने कहा कि हर भारतीय को सोचना चाहिए कि 300 साल तक राज करने वालों की भाषा का गुलाम हम 80 साल बाद भी क्यों बने हुए हैं।
यह भी पढ़ें: इलाहाबाद हाई कोर्ट केस: जस्टिस भनोट के खिलाफ गुस्सा, वकील 'अपमान' पर क्यों उतरे?
'भाषाओं से बैर नहीं पर हिंदी पर जोर'
जस्टिस गौतम चौधरी ने कहा कि हिंदी की पैरवी से यह धारणा बन सकती है कि वह दूसरी भाषाओं के विरोधी हैं। उन्होंने साफ किया कि उन्हें किसी भी भाषा से द्वेष नहीं है। उन्होंने कहा कि सभी भारतीय भाषाएं हमारी मौसियां हो सकती हैं और अंग्रेजी विदेश से आई मौसी। मौसियों का पूरा सम्मान होना चाहिए लेकिन अपनी मां यानी भारतीय भाषा को कमतर होते देखकर उन्हें गहरी पीड़ा होती है।
जस्टिस गौतम चौधरी, इलाहाबाद हाई कोर्ट:-
'पश्चिम बंगाल में बांग्ला और गुजरात में गुजराती में फैसले आएं तो यह बहुत अच्छा होगा। हिंदी भाषी राज्यों में हिंदी का व्यापक इस्तेमाल बढ़ाया जा सकता है।'
'हाई कोर्ट में भी हिंदी पर दें जोर'
जिला अदालतों से हाई कोर्ट आए जजों से जस्टिस चौधरी ने कहा कि जो लोग वहां हिंदी में लिखते थे, वे यहां भी हिंदी को बनाए रखें। उन्होंने सवाल किया कि हाई कोर्ट में आने पर फैसले सिर्फ अंग्रेजी में ही क्यों लिखे जाएं। उनके मुताबिक इसमें कोई बाधा नहीं है। यह सिर्फ मन की धारणा है कि फैसले अंग्रेजी में ज्यादा अच्छे लगते हैं। उन्होंने कहा कि अपनी बात हिंदी में भी उतने ही असरदार ढंग से रखी जा सकती है।
जस्टिस गौतम चौधरी, इलाहाबाद हाई कोर्ट:-
ऐसा जब मैं कहता हूं तो समाज में कुछ इस तरह की बात जाती है कि शायद मैं किसी भाषा का विरोध कर रहा हूं। मेरा किसी दुनिया की किसी भाषा से कभी कोई राग द्वेष और विरोध नहीं रहा है। लेकिन ये सारी भाषाएं हमारी मौसियां हो सकती हैं। हमारी अंग्रेजी जो है वह विलायत वाली मौसी हो सकती है। मौसियों का खूब सम्मान हो मुझे कोई बुरा नहीं लगेगा। लेकिन भारत, भारतीय भाषा और अपनी मां का अपमान होते देख मुझे चोट और आघात पहुंचती है।
यह भी पढ़ें: यूपी में ग्राम पंचायत चुनाव तीन महीने में होंगे, इलाहाबाद हाई कोर्ट का आदेश
कौन हैं जस्टिस गौतम चौधरी?
जस्टिस गौतम चौधरी इलाहाबाद के एक प्रतिष्ठित परिवार से आते हैं। उनके दादा श्याम लाल को ब्रिटिश काल में 'राय साहब चौधरी' की उपाधि मिली थी। आजादी के बाद वह दो बार विधायक चुने गए। उनके पिता चौधरी चुन्नी लाल इलाहाबाद हाई कोर्ट के वकील थे। बाद में वह उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग के सदस्य बने और फिर राज्यसभा के सदस्य नामित किए गए।
जस्टिस चौधरी ने इलाहाबाद के बॉयज हाई स्कूल और इंटरमीडिएट कॉलेज से पढ़ाई की। इंटरमीडिएट गवर्नमेंट इंटर कॉलेज इलाहाबाद से किया। इसके बाद इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातक की डिग्री ली और एलएलबी पूरा किया। 6 मार्च 1993 को उन्होंने वकालत शुरू की। इलाहाबाद बार एसोसिएशन के वकीलों के साथ काम करते हुए उन्होंने सिविल, श्रम, संविधान और राजस्व कानून के मामलों में अपनी सेवाएं दीं।
वकालत के दौरान वह कई जगहों पर स्टैंडिंग काउंसल रहे। 1995 से 2000 तक मिर्जापुर जिला पंचायत के, और 1998 से 2004 तक अहिरौरा नगर पंचायत के स्टैंडिंग काउंसल रहे। 1998 से 2000 तक उत्तर प्रदेश सरकार के ब्रीफ होल्डर भी रहे। 2000 से 2011 तक भारतीय रेलवे के मामलों की पैरवी की। 2009 में उन्होंने कौशांबी से लोकसभा चुनाव भी लड़ा, जिसका मकसद सामाजिक सुधार और जनसेवा था। 2009 से 2019 तक रुहेलखंड विश्वविद्यालय, बरेली के स्टैंडिंग काउंसल रहे। इसके अलावा केंद्र सरकार के पैनल काउंसल और अतिरिक्त मुख्य स्टैंडिंग काउंसल भी रहे।
यह भी पढ़ें: नोएडा DM मेधा रूपम को SC से राहत, इलाहाबाद हाई कोर्ट के आदेश पर लगी रोक
हिंदी के लिए जस्टिस चौधरी ने क्या किया?
12 दिसंबर 2019 को उन्हें इलाहाबाद हाई कोर्ट का न्यायाधीश नियुक्त किया गया। 26 मार्च 2021 को उन्होंने स्थायी न्यायाधीश के रूप में शपथ ली। सितंबर 2024 तक उन्होंने 5 साल में 21,000 से ज्यादा फैसले हिंदी में सुनाए। वह हिंदी में फैसला देने के पक्षधर थे।
