देश की राजधानी दिल्ली के जंतर मंतर पर 'रिजर्वेशन हटाओ आंदोलन' चल रहा है। सामान्य वर्ग के प्रदर्शनकारी आरक्षण हटाने की मांग को लेकर प्रदर्शन कर रहे हैं। पहले यह आंदोलन सिर्फ आरक्षण खत्म करने की मांग को लेकर शुरू हुआ था लेकिन अब 'आरक्षण सुधार आंदोलन' में बदलता नजर आ रहा है। दो अलग-अलग गुट हैं, एक गुट में हर्ष दुबे, रण बहादुर सिंह चौहान और मृत्युंजय पाठक हैं, दूसरे गुट में अजीत भारती के साथ वेदांश, अजीत भारती, अनुराधा तिवारी और नेहा दास हैं।
हर्ष दुबे की अगुवाई वाले गुट के साथ केंद्रीय मंत्री जेपी नड्डा ने मुलाकात की है। 21 अगस्त से यह आंदोलन जारी है। जेपी नड्डा ने कहा है कि वह इस गुट से दोबारा मुलाकात करेंगे। दूसरी तरफ, अजीत भारती की अगुवाई वाला गुट सामान्य वर्ग के लिए राष्ट्रीय आयोग बनाने और विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) के 2026 के विवादित नियमों को वापस लेने और अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति अत्याचार निवारण कानून की समीक्षा करने की मांग कर रहा है। वह पहले गुट के किसी भी मांग से सहमत नहीं है, उसे सरकार के सामने झुका हुआ बता रहा है।
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क्या चाहते हैं प्रदर्शनकारी?
कुछ प्रदर्शनकारी चाहते हैं कि आंदोलन अब एससी-एसटी आरक्षण में भी क्रीमी लेयर लागू किया जाए। उनका जोर है कि निजी क्षेत्र में आरक्षण किसी भी कीमत पर न लागू होने पाए। जाति आधारित आरक्षण खत्म कर सिर्फ आय के आधार पर आरक्षण दिया जाए। एक परिवार में एक सदस्य को ही आरक्षण मिले। जो आरक्षित सीटें हैं लेकिन रिक्त हैं, उन्हें अनारक्षित किया जाए। आरक्षण की अंतिम समय सीमा तय हो। यूजीसी के नियमों ने सामान्य वर्ग को जाति उत्पीड़क मान लिया है, उसे पूरी तरह खत्म किया जाए। किसी भी राजनीतिक पार्टी ने इस आंदोलन को समर्थन नहीं दिया है। वजह यह है कि सरकार भी मानती है कि जातिगत आरक्षण, सदियों के छुआछूत, भेदभाव से दलित, वंचित और शोषित तबके को बाहर निकालने का एक साधन है, जिसे जारी रखने की जरूरत है।
आरक्षण हटाने के लिए आंदोलन हो रहा है, लेकिन क्या आप जानते हैं कि इसे लाने की जरूरत क्या थी, क्यों भारत जैसे देश में यह दशकों बाद भी खत्म नहीं हो पाया, सामाजिक मजबूरियां क्या रहीं, आइए जानते हैं-
निखिल गुप्ता, रिसर्च स्कॉलर, चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय:-
भारत में आरक्षण वह संवैधानिक अधिकार है, जो सदियों के सामाजिक भेदभाव और पिछड़ेपन को पाटने के लिए बना है। 2011 की जनगणना बताती है कि देश में 16.6 प्रतिशत आबादी अनुसूचित जाति और 8.6 प्रतिशत अनुसूचित जनजाति वर्ग की है। आज भी उनकी साक्षरता दर राष्ट्रीय औसत 73 प्रतिशत के मुकाबले क्रमशः 66 प्रतिशत और 59 प्रतिशत के आसपास ही सिमटी हुई है। गरीबी के मोर्चे पर भी यह वर्ग सबसे ज्यादा जूझ रहा है। सुप्रीम कोर्ट ने भी साफ माना है कि जो पहले से गैर-बराबरी झेल रहे हैं, उन्हें सामान्य वर्ग के साथ लाकर बराबरी नहीं लाई जा सकती है। आरक्षण समाज के अंतिम व्यक्ति को मुख्यधारा और सत्ता में हिस्सेदारी देने का एक संवैधानिक साधन है। इसे जारी रखने की जरूरत है।
भारत में आरक्षण की शुरुआत कैसे हुई?
बेनेट यूनिवर्सिटी में असिस्टेंट प्रोफसर और सेंटर फॉर साउथ एशियन स्टडीज, स्कूल ऑफ इंटरनेशनल स्टडीज के पूर्व रिसर्च स्कॉलर डॉ. दीपक कुमार ने बताया, 'भारत में समानता की बात जब शुरू हुई, तब दुनिया भर में 20वीं सदी के मध्य तक सिर्फ औपचारिक समानता की चर्चा होती थी। सबको कानून के सामने बराबर माना जाए। असल समानता यानी सब्स्टैंटिव इक्वलिटी को ज्यादातर देशों ने तब तक समझा ही नहीं था। भारत उस समय एक अलग और खास मिसाल था।'
डॉ. दीपक कुमार ने बताया, 'भारत के संविधान में आरक्षण के कई प्रावधान रखे गए। राजनीतिक आरक्षण, नौकरियों में आरक्षण और शिक्षा संस्थानों में आरक्षण, ये सब शामिल किए गए। इसे सब्स्टैंटिव इक्वलिटी कहा जाता है, क्योंकि औपचारिक समानता में यह हिस्सा नहीं आता।'
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सब्स्टैंटिव इक्वलिटी का मतलब क्या है?
डॉ. दीपक कुमार ने बताया, 'सब्स्टैंटिव इक्वलिटी का मतलब है कि समाज का कोई वर्ग या समूह जो इतिहास में पीछे धकेला गया, जिसके साथ अन्याय और भेदभाव हुआ और जिसके कारण आज भी समाज में कई वर्जनाएं बनी हुई हैं, उसे बराबरी पर लाने के लिए खास कदम उठाने पड़ते हैं। हिंदी में इसे तार्किक समता कह सकते हैं।'
डॉ. दीपक कुमार, पूर्व शोधार्थी, जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय:-
भारत के संविधान में यह बात 1950 में ही आ चुकी थी। उससे पहले भी महाराष्ट्र से इसकी शुरुआत हो गई थी। उन्नीसवीं सदी के अंत में चर्चा शुरू हुई और बीसवीं सदी की शुरुआत में धीरे-धीरे इसे लागू करना शुरू किया गया। पूना पैक्ट के जरिए राजनीतिक आरक्षण की बात भी सामने आई।
पूना पैक्ट क्या था?
चौधरी चरण सिंह से विश्वविद्यालय विधि विभाग के रिसर्च स्कॉलर निखिल गुप्ता ने बताया, 'पूना पैक्ट 24 सितंबर 1932 को पुणे में हुआ एक समझौता हुआ था। अंग्रेजों ने कम्युनल अवॉर्ड में दलितों के लिए अलग चुनाव क्षेत्र देने का प्रस्ताव रखा था। तब समाज का एक बड़ा हिस्सा, इन्हें अछूत कहता था। डॉ. भीम राव आंबेडकर ने बाबासाहेब आंबेडकर इसे दलितों के हक के लिए अच्छा मानते थे, लेकिन गांधीजी को लगता था कि इससे हिंदू समाज बंट जाएगा और आजादी की लड़ाई कमजोर होगी।'
पूना पैक्ट से हासिल क्या हुआ?
डॉ. आंबेडकर की बात से गांधी इतने नाराज हुए कि जेल में ही अनशन पर बैठ गए। उनकी हालत बिगड़ने पर आंबेडकर और अन्य नेता समझौते पर राजी हुए। इस पैक्ट से दलितों को अलग चुनाव क्षेत्र नहीं मिला, लेकिन हिंदू चुनाव क्षेत्र के अंदर उनकी सीटें बढ़ा दी गईं। इससे दलितों को विधायिका में ज्यादा प्रतिनिधित्व मिला और अछूत प्रथा के खिलाफ आंदोलन को नई दिशा मिली। आंबेडकर को यह समझौता दबाव में माना, लेकिन इससे दलित अधिकारों की बात राष्ट्रवादी आंदोलन का हिस्सा बन गई।
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पूना पैक्ट से ही दलितों को उनका अधिकार मिला?
CCS विधि विभाग के शोधार्थी निखिल गुप्ता ने कहा, '24 सितंबर 1932 को हुए पूना पैक्ट ने दलितों के राजनीतिक अधिकारों की दिशा तय की। इसके तहत अलग निर्वाचन क्षेत्र की जगह संयुक्त निर्वाचन प्रणाली अपनाई गई, प्रांतीय विधानसभाओं में आरक्षित सीटें 71 से बढ़ाकर 148 की गईं और केंद्रीय असेंबली में सामान्य सीटों का 18 प्रतिशत हिस्सा आरक्षित हुआ। लोक सेवाओं में निष्पक्ष भर्ती और शिक्षा के लिए बजट का वादा भी किया गया।'
कैसे पड़ी देश में आरक्षण की नींव?
1935 के 'गर्वनमेंट ऑफ इंडिया एक्ट' ने इन प्रावधानों को कानूनी रूप दिया और पहली बार आधिकारिक तौर पर 'अनुसूचित जाति' शब्द का इस्तेमाल हुआ। 1936 के आदेश में आरक्षित जातियों की सूची तैयार की गई। 1942 में डॉ. भीमराव आंबेडकर, वायसराय की कार्यकारी परिषद में लेबर मेंबर बने और उनके प्रयासों से अगस्त 1943 में केंद्र सरकार की सीधी भर्तियों में अनुसूचित जातियों के लिए पहली बार 8.33 प्रतिशत आरक्षण लागू किया गया। जून 1946 में बढ़ाकर 12.5 प्रतिशत कर दिया गया।
आजादी के बाद क्या बदला?
निखिल गुप्ता ने बताया, 'आजादी के बाद संविधान सभा ने आरक्षण को मजबूत संवैधानिक सुरक्षा दी, जिसकी जरूरत भी थी। संविधान के अनुच्छेद 330 और 332 के तहत लोकसभा और विधानसभाओं में एससी-एसटी के लिए जनसंख्या के अनुपात में राजनीतिक आरक्षण दिया गया। अनुच्छेद 16(4) ने पिछड़े वर्गों को नौकरियों में पर्याप्त प्रतिनिधित्व देने का अधिकार दिया और अनुच्छेद 335 में प्रशासनिक दक्षता को ध्यान में रखते हुए उनके दावों पर विचार करने की बात कही गई।'
उन्होंने कहा कि ये संवैधानिक सुधार ही काफी नहीं थे। कुछ काम अदालतों ने भी किया। साल 1951 में चंपाकम दोरायराजन केस ने सुर्खियां बटोरीं। यह भारत का ऐतिहासिक संवैधानिक मामला था। मद्रास सरकार ने 'कम्युनल जनरल ऑर्डर' जारी किया था। जाति और धर्म के आधार पर मेडिकल-इंजीनियरिंग कॉलेजों में सीटें आरक्षित की थीं।
चंपाकम ने इसे समानता के अधिकार का उल्लंघन बताते हुए चुनौती दी। सुप्रीम कोर्ट ने आदेश को अनुच्छेद 15(1) और 29(2) के खिलाफ बताकर इसे रद्द कर दिया। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि मौलिक अधिकार निर्देशक सिद्धांतों से ऊपर हैं। इसी फैसले के बाद पहला संविधान संशोधन हुआ और अनुच्छेद 15(4) जोड़ा गया। यह पहला संविधान संशोधन था, जिससे शैक्षणिक संस्थानों में भी आरक्षण का रास्ता खुला।
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1970 तक, आरक्षण पर संवैधानिक बदलाव क्या रहे?
निखिल गुप्ता ने कहा, '1970 में केंद्र की सीधी खुली भर्ती में अनुसूचित जाति के लिए 15 प्रतिशत और अनुसूचित जनजाति के लिए 7.5 प्रतिशत आरक्षण तय हुआ, जबकि 1995 के 77वें संशोधन ने अनुच्छेद 16(4A) जोड़कर प्रमोशन में भी आरक्षण को सुरक्षित किया।'
संविधान सभा में डॉ. आंबेडकर ने कहा था कि आरक्षण को सीमित दायरे में ही रहना चाहिए। साल 1963 के एमआर. बालाजी मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि आरक्षण सामान्यतः 50 प्रतिशत से कम होना चाहिए, और 1964 के टी देवदासन मामले में 50 प्रतिशत से अधिक आरक्षण को असंवैधानिक ठहराया गया।
जब 50 प्रतिशत ही आरक्षण तो अब आंकड़े पार क्यों?
राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद (NCERT) की किताब 'लोकतांत्रिक राजनीति' के मुताबिक साल 1979 में तत्कालीन मोरारजी देसाई सरकार ने देश में सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों (OBC) की पहचान करने और उन्हें आगे बढ़ाने के लिए एक मंडल आयोग का गठन किया। आयोग की अध्यक्षता बीपी मंडल कर रहे थे। आयोग का मकसद था कि सामाजिक और शैक्षिक रूप से पिछड़े वर्गों की पहचान करके, उनके पिछड़ेपन को दूर करने के उपाय सुझाए जाएं।
आयोग ने साल 1980 में रिपोर्ट दी और सरकारी नौकरियों में इन वर्गों के लिए 27 प्रतिशत आरक्षण की सिफारिश की। 1989 के लोकसभा चुनाव में जनता दल ने इसे लागू करने का वादा किया। चुनाव जीतने के बाद तत्कालीन वीपी सिंह सरकार ने 1990 में कैबिनेट स्तर पर एक फैसला लिया, संसद को सूचना दी और 13 अगस्त 1990 को कार्यालय ज्ञापन जारी कर यह आरक्षण लागू कर दिया।
निखिल गुप्ता ने कहा, 'मंडल आयोग लागू होने के बाद देश सुलग उठा। गली-मोहल्लों में इसे लेकर बहस हुई, प्रदर्शन हुए और हिंसा भड़की। कुछ लोगों को यह समानता की दिशा में सबसे जरूरी कदम लगा, वहीं कुछ लोगों को लगा कि इससे सामाजिक भेदभाव की खाइयां बढ़ेंगी, जातिवाद बढ़ेगा और योग्य उम्मीदवारों के हाथों से अवसर छिन जाएगा। विवाद इतना बढ़ा कि यह मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच गया।'
मंडल आयोग के बाद भड़के बवाल का हल क्या निकला?
सुप्रीम कोर्ट ने इंदिरा साहनी बनाम भारत सरकार केस में लंबी सुनवाई की। साल 1992 में न्यायालय ने सरकार के आदेश को वैध ठहराया लेकिन क्रीमी लेयर को आरक्षण से बाहर रखने और कुल आरक्षण 50 प्रतिशत से अधिक न करने जैसे संशोधन सुझाए। क्रीमी लेयर का मतलब, पिछड़े वर्ग के संपन्न लोगों को इस दायरे से बाहर रखने का सुझाव दिया गया। सरकार ने 1993 में नया आदेश जारी किया और तब से यह नीति लागू है।
निखिल गुप्ता, रिसर्च स्कॉलर, चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय:-
सुप्रीम कोर्ट ने 27 फीसदी आरक्षण को संवैधानिक रूप से वैध ठहराया, लेकिन कुछ शर्तें भी तय की। सुप्रीम कोर्ट न कहा कि आरक्षण की कुल सीमा 50 फीसदी से ज्यादा न हो, पिछड़े वर्ग के संपन्न लोगों को बाहर रखने के लिए 'क्रीमी लेयर' का नियम लागू हो, प्रमोशन में आरक्षण न मिले।
जब 50 प्रतिशत ही आरक्षण तो अब आंकड़े पार क्यों?
साल 1992 के ऐतिहासिक इंदिरा साहनी फैसले में 9 जजों की बेंच ने 50 प्रतिशत की सीमा को एक कड़ा नियम बना दिया, जिसे केवल दुर्लभ परिस्थितियों में ही पार किया जा सकता है। 2019 के 103वें संविधान संशोधन द्वारा सामान्य वर्ग के लिए 10 प्रतिशत आर्थिक तौर पर पिछड़े सामान्य वर्ग के लोगों के लिए (EWS) आरक्षण लागू किया गया। साल 2022 में सुप्रीम कोर्ट ने इसे वैध ठहराया। सुप्रीम कोर्ट न कहा कि 50 प्रतिशत की सीमा सामाजिक-शैक्षणिक पिछड़ेपन (SC/ST/OBC) के लिए है और यह आर्थिक आधार वाले आरक्षण पर लागू नहीं होती।
अभी आरक्षण के आंकड़े क्या हैं?
- अनुसूचित जाति (SC): 15%
- अनुसूचित जनजाति (ST): 7.5%
- अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC): 27%
- आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग: (EWS) 10%
यह आंकड़े भारत सरकार के हैं। कुल आरक्षण 59.5 प्रतिशत के आसपास है।
आरक्षण जरूरी क्यों है?
डॉ. दीपक कुमार ने बताया कि आरक्षण का आधार क्या है, इसे समझने के लिए भारत और अमेरिका की तुलना की जा सकती है। अमेरिका में 1970 के आसपास जॉन रॉल्स ने 'थ्योरी ऑफ जस्टिस' में बताया कि सब्स्टैंटिव इक्वलिटी क्यों जरूरी है। तब जाकर दुनिया में इस पर थोड़ी चर्चा शुरू हुई। भारत में यह बात पहले से ही चल रही थी। वजह यह है कि जाति को लेकर हमारी समझ बहुत गहरी है। धर्म, संस्कृति और समाज की मान्यताओं से इसे समर्थन मिलता है।
डॉ. दीपक कुमार, पूर्व शोधार्थी, जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय:-
नस्ल के मुकाबले जाति और भी गहरी जड़ें रखती है, क्योंकि नस्ल तो साफ दिख जाती है, लेकिन जाति सामाजिक ताने-बाने में छिपी रहती है।डॉ. दीपक कुमार ने बताया, 'संविधान पढ़ाते हुए देखा जाता है कि 1950 से लेकर 2000 तक और उसके बाद के फैसलों में, खासकर जनहित अभियान मामले में, आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग यानी EWS को 10 प्रतिशत आरक्षण दिया गया।'
किस आधार पर मिलना चाहिए आरक्षण?
डॉ. दीपक कुमार ने बताया कि 1950 से या उससे भी पहले से जबसे भारत में आरक्षण है, उसके दो ही आधार रहे थे। सुप्रीम कोर्ट और भारत सरकार ने 2019 तक इन्हें ही स्वीकार किया था। ये आधार थे-सामाजिक और शैक्षिक पिछड़ापन। कोई समुदाय सामाजिक और शैक्षिक रूप से पिछड़ा हो, तभी वह आरक्षण का हकदार माना जाता था।
इंदिरा साहनी केस में सुप्रीम कोर्ट के 9 जजों की बेंच न आरक्षण को जरूरी बताया। कोई भी प्रमुख फैसला आरक्षण को गलत नहीं कहता। सरकार को भी एहसास है कि समाज के कई हिस्से मुख्यधारा में नहीं आए हैं और उन्हें लाने के लिए आरक्षण जरूरी है।
2019 तक आरक्षण के सिर्फ दो आधार थे सामाजिक और शैक्षिक पिछड़ापन। आर्थिक आधार को इंदिरा साहनी फैसले में भी सही नहीं माना गया था। मंडल आयोग के बाद कई बहस हुईं, लेकिन संविधान सभा की चर्चाओं से लेकर संविधान और सभी फैसलों तक यही नियम बना रहा। 2019 में आर्थिक आधार पर भी आरक्षण जोड़ा गया। अब तीनों आधार हमारे पास हैं। आरक्षण पर बहस जारी रहेगी, जब तक आंकड़े यह साबित करते हैं कि सामाजिक और शैक्षिक पिछड़ापन आरक्षण देने के बड़े पैमाने हैं।
सामाजिक पैमाना क्यों जरूरी है?
डॉ. दीपक कुमार ने बताया, 'कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे उत्तराखंड के हल्द्वानी गए। वहां भाषण दिया, उसके बाद उस जगह का शुद्धिकरण किया गया। कम से कम उन्होंने खुद यह दावा किया। अखिलेश यादव के साथ भी ऐसा हुआ। एससी-एसटी-ओबीसी समुदाय से आने वाले बड़े नेता, यहां तक कि राष्ट्रपति रह चुके लोग भी, अपनी सामाजिक पृष्ठभूमि के कारण भेदभाव झेलते हैं। समाज उनकी सामाजिक स्थिति के हिसाब से व्यवहार करता है।'
डॉ. दीपक कुमार, पूर्व शोधार्थी, जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय:-
जल्दी से जल्दी सभी लोगों को आरक्षण और सकारात्मक कार्रवाई के जरिए मुख्यधारा में लाना चाहिए। जब सब मुख्यधारा में आ जाएंगे, तब अपने आप स्थिति सुधर जाएगी। लेकिन अभी के आंकड़े, फैसले और सरकारी रिपोर्ट देखकर लगता है कि कई समुदाय अभी भी सामाजिक और शैक्षिक रूप से मुख्यधारा में नहीं आए हैं। इसलिए सामाजिक और शैक्षिक पिछड़ेपन के ये दो आधार अभी भी बहुत जरूरी हैं और रहेंगे।
डॉ. दीपक कुमार ने बताया, 'जैसे-जैसे देश आगे बढ़ रहा है ये भेदभाव कम होने के बजाय कहीं-कहीं बढ़ते दिख रहे हैं, जबकि इन्हें तेजी से खत्म होना चाहिए था। व्यक्तिगत रूप से और संविधान तथा फैसलों के अनुसार भी यही बात है कि सामाजिक स्तर पर भेदभाव अभी भी मौजूद है। सरकार को इसे दूर करने की जरूरत है। यह बहुत गहराई तक जड़ जमाए हुए है। जब यह कम होगा, तब धीरे-धीरे समाज खुद महसूस करेगा कि इन चीजों की अब कोई जरूरत नहीं।'
