देश में अवैध तरीके से बच्चों को गोद लेना के बढ़ते मामले एक बड़ी चिंता का विषय बने हुए हैं। 11 सितंबर को एक तरफ दिल्ली में महिला एवं बाल विकास मंत्रालय, भारत सरकार के तहत सेंट्रल एडॉप्शन रिसोर्स अथॉरिटी (CARA) ने बच्चों को गैरकानूनी तरीके से गोद देने की घटनाओं को रोकने के लिए एक बड़ी जागरूकता कार्यशाला की, दूसरी तरफ एक दिन पहले 10 सितंबर को सुप्रीम कोर्ट ने बच्चों के बढ़ते अपहरण के मामलों को लेकर केंद्र और सभी राज्यों को नोटिस भेजकर जवाब मांगा है।   

 

सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिका में कहा गया कि बच्चों के गायब होने के मामले में पुलिस अधिकारी अक्सर तुरंत FIR दर्ज नहीं कर पाते हैं और जांच में देरी से किडनैप हुए बच्चों को वापस पाने की संभावना काफी कम हो सकती है, जबकि ट्रैफिकिंग, यौन शोषण, जबरन मजदूरी, गैर-कानूनी गोद लेने और शोषण के दूसरे तरीकों का खतरा बढ़ जाता है। 

 

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हर दिन औसतन 269 बच्चे हुए लापता

राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो यानी NCRB की क्राइम इन इंडिया 2024 की रिपोर्ट पर नजर डालें तो 2024 में देशभर में 98,375 बच्चे लापता हुए, औसतन हर दिन करीब 269 बच्चे गुम हुए। 2023 के मुकाबले यह आंकड़ा करीब 7.8 फीसदी ज्यादा है। इनमें से भी 76.8% लड़कियां थीं। इसी साल अपहरण के 96,079 मामले दर्ज हुए, जिनमें से 76,761 पीड़ित बच्चे थे। 

 

इसके अलावा वहीं ह्यूमन ट्रैफिकिंग के 2,135 मामलों में कुल 6,018 पीड़ितों में से 2,297 बच्चे शामिल थे, हालांकि 5,839 पीड़ितों को बचा भी लिया गया। यह आंकड़े साफ दिखाते हैं कि बच्चों की गुमशुदगी, अपहरण और तस्करी का खतरा अब भी बड़े पैमाने पर बना हुआ है, जिसकी आड़ में अवैध गोद लेने के मामले भी सामने आते रहते हैं। 

सुप्रीम कोर्ट में बच्चों के गायब होने के मामलों को लेकर याचिका

सुप्रीम कोर्ट में वकील अश्विनी कुमार उपाध्याय ने एक याचिका दायर की है, जिसमें लापता, किडनैप और अगवा किए गए बच्चों के मामलों में पुलिस और सरकारी सिस्टम की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाया गया है। याचिका में कहा गया है कि कई बार बच्चे के गायब होने की शिकायत को FIR के तौर पर दर्ज करने के बजाय केवल ‘गुमशुदा’ या फिर ‘लापता 

व्यक्ति’ की रिपोर्ट के रूप में दर्ज कर लिया जाता है। इससे आपराधिक जांच शुरू होने में देरी होती है। 

 

इसमें मांग की गई है कि ऐसे मामलों में तुरंत FIR हो और पुलिस एक तय प्रक्रिया के तहत जांच करे। इसके साथ ही राज्यों की पुलिस और दूसरी जांच एजेंसियों के बीच बेहतर तालमेल की व्यवस्था बनाने की भी मांग की गई है। क्योंकि बच्चों की तस्करी, गैर-कानूनी तरीके से गोद लेने वाले नेटवर्क कई राज्यों में फैले हो सकते हैं।

सबसे बड़ा सवाल, सिस्टम कितनी तेजी से काम करता है?

बच्चे के गायब होने के बाद शुरुआती समय सबसे अहम माना जाता है। इस याचिका में सबसे बड़ा सवाल यह उठाया गया है कि अगर FIR दर्ज करने या जांच शुरू करने में देरी होती है, तो बच्चे को ढूंढना और सुरक्षित वापस लाना मुश्किल हो सकता है। इसी दौरान उसके मानव तस्करी, यौन शोषण, जबरन मजदूरी या गैर-कानूनी गोद लेने का शिकार होने का खतरा भी बढ़ सकता है।

 

इसलिए मांग की गई है कि लापता बच्चे की शिकायत को सिर्फ ‘गुमशुदगी’ मानकर न छोड़ा जाए, बल्कि तुरंत आपराधिक जांच शुरू की जाए। साथ ही जांच के लिए वरिष्ठ पुलिस अधिकारी, विशेष प्रक्रिया और स्पेशल कोर्ट जैसी व्यवस्था बनाई जाए। कोर्ट ने केंद्र, राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों से याचिका में उठाए गए मुद्दों पर जवाब मांगा है। 

 

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सिस्टम को साथ लाने की कोशिश

11 सितंबर को अवैध तरीके से बच्चों को गोद लेने के मामलों को रोकने के लिए CARA ने दिल्ली में करीब 200 लोगों को एक साथ लाकर जागरूकता कार्यशाला की। इसमें पुलिस, अस्पताल, स्वास्थ्य विभाग, बाल कल्याण समितियों, जिला बाल संरक्षण इकाइयों और आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं को शामिल किया गया था।

 

कार्यशाला में इस बात पर जोर दिया गया कि बच्चों की सुरक्षा के लिए हर स्तर पर सतर्कता और समय पर कार्रवाई जरूरी है। अस्पताल से लेकर पुलिस और बाल संरक्षण अधिकारियों तक बेहतर तालमेल होने पर ही अवैध एडॉप्शन के मामलों को रोका जा सकता है।

 

यही बात सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिका में भी सामने आती है। याचिका में बच्चों के गुम होने पर FIR दर्ज करने में देरी और जांच एजेंसियों के बीच बेहतर तालमेल की कमी पर सवाल उठाए गए हैं।