पंजाब की राजनीति में 2027 विधानसभा चुनाव की तैयारियां तेज हो गई हैं और इस चुनाव से पहले एक नया राजनीतिक पैटर्न दिखाई दे रहा है। सत्ताधारी आम आदमी पार्टी (AAP), जिसने 2022 में शिक्षा, स्वास्थ्य, बिजली, भ्रष्टाचार और बदलाव के मुद्दों पर चुनाव लड़कर बड़ी जीत हासिल की थी, अब धार्मिक और सांस्कृतिक मुद्दों पर खुलकर बैटिंग कर रही है। पार्टी इस रणनीति के तहत हिंदू वोटर्स पर खास ध्यान दे रही है पिछले करीब दो सालों में पार्टी की हिंदू वोटर्स तक पहुंच पहुंच बढ़ाने की कोशिश ज्यादा स्पष्ट हुई है। दूसरी तरफ, सिख धार्मिक मुद्दों पर भी पार्टी अब कई फैसले कर रही है। 

 

पंजाब में आगमी विधानसभा चुनाव को लेकर तमाम राजनीतिक दल अपनी रणनीति बना रहे हैं और चर्चा है कि आम आदमी पार्टी अपनी सरकार के काम के साथ-साथ धार्मिक मुद्दों पर यह चुनाव लड़ना चाहती है। भारतीय जनता पार्टी देशभर में इस तरह की राजनीति कर रही है जिसमें पार्टी एक तरफ सरकार के विकास कार्यों का जिक्र करती है और दूसरी ओर धार्मिक मुद्दों पर काम करती है। इससे लगातार बीजेपी को सफलता भी मिल रही है। 

पंजाब में हिंदू वोट क्यों महत्वपूर्ण है?

पंजाब में आम आदमी पार्टी की हिंदू मतदाताओं तक पहुंचने की रणनीति के बारे में समझने से पहले पंजाब चुनाव में हिंदू मतदाताओं की भूमिका को समझना जरूरी है। पंजाब भले ही सिख बहुल राज्य है लेकिन इस राज्य में करीब 39 प्रतिशत हिंदू आबादी है। 2011 की जनगणना के अनुसार, पंजाब की आबादी में सिख करीब 57.7 फीसदी और हिंदू करीब 38.5 फीसदी थे। खास बात यह है कि हिंदू आबादी का बड़ा हिस्सा शहरी पंजाब में है जिनमें अमृतसर, जालंधर, लुधियाना, पटियाला, पठानकोट और होशियारपुर जैसे इलाके शामिल हैं। इन्हीं इलाकों में भारतीय जनता पार्टी भी मजबूत है। 

 

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इसी वर्ग में बीजेपी पिछले कई सालों से मजबूत है और हाल के सालों में अपनी पकड़ को और भी ज्यादा मजबूत करने की कोशिश की है। 2024 के लोकसभा चुनाव में पंजाब में बीजेपी एक भी सीट नहीं जीत सकी, लेकिन उसका वोट शेयर 2019 के करीब 9 फीसदी से बढ़कर लगभग 18 फीसदी हो गया। बीजेपी का प्रदर्शन खासकर शहरी और ऊंची जाति के हिंदू मतदाताओं के बीच मजबूत रहा और इसके बाद अब बीजेपी 2027 के विधानसभा चुनाव के लिए तैयारी कर रही है। ऐसे में आम आदमी पार्टी की नजर भी अब इस वोटबैंक पर है।

 

2022 में AAP पंजाब में 92 सीटों के साथ सत्ता में पहुंची थी और अब 2027 में अपनी सरकार दोहराना चाहती है। ऐसे में अगर हिंदू वोट का एक बड़ा हिस्सा बीजेपी की ओर जाता है तो AAP के लिए शहरी सीटों पर चुनौती बढ़ सकती है। यही वजह है कि पार्टी ने हिंदू समाज से सीधे संवाद की दिशा में कदम बढ़ाए हैं।

AAP ने हिंदू धार्मिक मुद्दों पर क्या किया?

भगवंत मान सरकार ने मुख्यमंत्री तीर्थ यात्रा योजना शुरू की है। इस योजना के तहत पंजाब के लोगों को धार्मिक स्थलों की यात्रा के लिए सरकारी सुविधा दी गई। शुरुआत में इसमें श्री दरबार साहिब, दुर्गियाना मंदिर, वाल्मीकि तीर्थ और श्री आनंदपुर साहिब जैसे धार्मिक स्थल शामिल थे। बाद में इसका विस्तार करते हुए हरिद्वार-ऋषिकेश, मथुरा-वृंदावन और सालासर-खाटू श्याम जैसे प्रमुख हिंदू तीर्थों को भी जोड़ दिया गया है।

 

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2026 में AAP ने इस योजना के विस्तार का ऐलान करते हुए करीब 1.5 लाख श्रद्धालुओं को नई यात्राओं के जरिए तीर्थ दर्शन कराने की बात कही। सरकार के मुताबिक यात्रा, रहने और भोजन का खर्च भी सरकार उठाएगी। यानी यह सिर्फ हिंदू आउटरीच नहीं है बल्कि इसमें सिख धार्मिक स्थल भी शामिल हैं। नए हिंदू तीर्थों को जोड़ना उस समय हुआ है जब 2027 चुनाव करीब हैं, इसलिए राजनीतिक तौर पर इसका महत्व बढ़ जाता है।

 

AAP ने पटियाला के ऐतिहासिक काली माता मंदिर के पुनर्विकास की योजना भी सामने रखी है। जून 2026 में अरविंद केजरीवाल ने बताया कि मंदिर के पुनर्विकास पर करीब 80 करोड़ रुपये खर्च किए जा रहे हैं।
AAP के हिंदू आउटरीच का सबसे बड़ा और सबसे ज्यादा चर्चा में आया कदम अमृतसर के राम तीर्थ में माता सीता और लव-कुश को समर्पित भव्य मंदिर बनाने की घोषणा है।

 

जून 2026 में अरविंद केजरीवाल और मुख्यमंत्री भगवंत मान ने 'एक शाम भगवान शिवजी के नाम' कार्यक्रम भी किया। पंजाब सरकार की ओर से इस कार्यक्रम का खर्च उठाया गया और शहरों में खासतौर पर इसका आयोजन हुआ। 


AAP सरकार ने रामायण पर आधारित 'हमारे राम' नाटक के पंजाब में मुफ्त मंचन की भी घोषणा की है। सरकार के मुताबिक इसके करीब 40 मुफ्त शो अलग-अलग शहरों में कराने की योजना बनाई गई।

 

2025 में मुख्यमंत्री भगवंत मान ने पंजाब में हिंदू मंदिर एक्ट लाने की बात कही। इसके पीछे मंदिरों के प्रबंधन और सरकारी हस्तक्षेप से जुड़े पुराने विवादों को दूर करने का तर्क दिया गया।

 

नवंबर 2024 में AAP ने भगवंत मान की जगह अमन अरोड़ा को पंजाब प्रदेश अध्यक्ष बनाया। अरोड़ा को पंजाब की राजनीति में प्रमुख हिंदू चेहरा माना जाता है। यह फैसला उस समय हुआ जब 2024 लोकसभा चुनाव में बीजेपी का वोट शेयर पंजाब में तेजी से बढ़ा था।

सिखों पर भी नजर

पंजाब में सिख समुदाय की धार्मिक भावनाओं और संस्थाओं से जुड़े मुद्दों पर भी भगवंत मान सरकार ने कई महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं। 2023 में पंजाब विधानसभा ने सिख गुरुद्वारा एक्ट, 1925 में संशोधन करते हुए श्री हरमंदिर साहिब से गुरबाणी के मुफ्त प्रसारण का रास्ता साफ करने की कोशिश की। हालांकि, इस मुद्दे पर AAP सरकार और SGPC आमने-सामने आ गए थे। SGPC ने सरकार के धार्मिक मामलों में हस्तक्षेप पर सवाल उठाए। इसलिए यह फैसला AAP के लिए सिख आउटरीच भी था और साथ ही सिख संस्थाओं के साथ टकराव का कारण भी बना।

 

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2026 में भगवंत मान सरकार ने बेअदबी कानून में संशोधन किया। कानून का उद्देश्य श्री गुरु ग्रंथ साहिब के सरूप की बेअदबी से जुड़े अपराधों के लिए ज्यादा कड़ा कानूनी प्रावधान करना है। हालांकि, इस मुद्दे पर भी अकाल तख्त से टकराव के बाद पार्टी बैकफुट पर है। 

2024 के बाद बदली रणनीति?

AAP ने 2022 में सत्ता में आते समय खुद को पारंपरिक धार्मिक राजनीति से अलग विकल्प के रूप में पेश किया था लेकिन चार साल के शासन के बाद पार्टी के सामने अब सबसे बड़ी चुनौती अपनी 2022 की सामाजिक गठजोड़ को बनाए रखना है। 2024 लोकसभा चुनाव में पंजाब में AAP को सफलता नहीं मिली और बीजेपी ने अपना वोट शेयर काफी बढ़ाया। इसके बाद 2025-26 में AAP का हिंदू संपर्क तेजी से दिखाई देने लगा। यही वजह है कि राजनीतिक विश्लेषकों ने मंदिरों, तीर्थ यात्राओं, सनातन सेवा समिति और अमन अरोड़ा की नियुक्ति को 2027 की रणनीति से जोड़कर देखा है।