हाल ही में पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु के चुनाव कांग्रेस के लिए सुखद नहीं रहे। भले ही तमिलनाडु में अब वह सत्ता में साझेदार है लेकिन जिस गठबंधन में वह चुनाव लड़ी उसे हार मिली। पश्चिम बंगाल में कभी लेफ्ट से तो कभी तृणमूल कांग्रेस से दोस्ती करती कांग्रेस आखिर तक यह तय नहीं कर पाई कि वह किस एजेंडे पर चुनाव लड़ रही है। इसका उसे नुकसान हुआ और दोनों ही राज्यों में वह मजबूत नहीं हो पाई। इससे पहले बिहार में भी यही हुआ था और आखिर तक महागठबंधन में सीटों का बंटवारा स्पष्ट नहीं हुआ। अब ऐसा लगता है कि कांग्रेस ने इन तीनों राज्यों से कोई सीख नहीं ली है और उत्तर प्रदेश में भी ऐसी ही गलती करके 'दुविधा हाइवे' पर चल पड़ी है।
2024 के लोकसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी के साथ गठबंधन करके लोकसभा चुनाव में उतरी कांग्रेस को जबरदस्त फायदा हुआ। 2019 में उत्तर प्रदेश की सिर्फ एक सीट जीतने वाली कांग्रेस 2024 में 6 सीटें जीतने में कामयाब हो गई। इसका बड़ा कारण था कि समय से सीटों का बंटवारा हुआ और उम्मीदवारों का चयन दोनों पार्टियों की सहमति से हुआ। कुछ सीटों को छोड़ दें तो वोट ट्रांसफर करने का काम अच्छे से हुआ और दोनों ने मिलकर भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) को उस राज्य में पटखनी दे दी जहां चंद महीने पहले ही राम मंदिर का उद्घाटन हुआ था।
दुविधा में है कांग्रेस?
उत्तर प्रदेश में कांग्रेस पार्टी के अलग-अलग धड़े अलग-अलग राय लेकर चल रहे हैं। कुछ नेता समाजवादी पार्टी के साथ बने रहना चाहते हैं और उसके हिसाब से मिलने वाली सीटों पर चुनाव लड़कर खुद को मजबूत करना चाहते हैं। उधर, कुछ नेता ऐसे भी हैं जो दलित और ब्राह्मण वोटों को साथ लाने की कोशिश में बहुजन समाज पार्टी (BSP) के साथ भी जाना चाहते हैं। इस चक्कर में पार्टी तय नहीं कर पा रही है कि उसे आगे क्या करना है। 2022 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस अकेले कूद गई थी और सिर्फ दो सीटों पर उसके उम्मीदवार जीते थे। इससे पहले 2017 में कांग्रेस और समाजवादी पार्टी का गठबंधन था और 100 से ज्यादा सीटें लड़कर कांग्रेस को सिर्फ 7 पर जीत मिली थी।
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कांग्रेस की इस ऊहापोह का असर यह हो रहा है कि पार्टी का काडर अभी भी स्पष्ट नहीं है कि उसे आगे क्या करना है। विधानसभा के चुनाव अगले साल हैं और गाहे-बगाहे दोनों दलों की ओर से एक-दूसरे पर ही बयानबाजी हो रही है। भले ही अभी भी दोनों दलों की ओर से कहा जा रहा है कि चुनाव साथ में लड़ेंगे लेकिन यह सामंजस्य जमीन पर नहीं दिख रहा है। खुद अखिलेश यादव इशारों ही इशारों में कांग्रेस पर तंज कस चुके हैं और कांग्रेस नेतृत्व ने भी आगामी चुनाव को लेकर कोई स्पष्टता नहीं दिखाई है।
बिहार में हुई थी भारी गलती
बिहार के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस पार्टी ने 60 सीटों की मांग रखी थी। राष्ट्रीय जनता दल (RJD) इस पर सहमत नहीं था और बात नहीं बनी। कई सीटों पर दोनों ही दलों की ओर से उम्मीदवार उतार दिए गए। बाद में कभी इसे फ्रेंडली फाइट कहा गया तो कभी कुछ उम्मीदवारों ने नाम वापस भी लिए। हालांकि, महागठबंधन के पक्ष में माहौल खराब हो गया। गठबंधन इतना बिखरा दिखा कि लोगों ने मजबूत दिख रहे नेशनल डेमोक्रैटिक अलायंस (NDA) के लिए वोट किया और महागठबंधन की करारी हार हुई।
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उसके बाद से अभी तक बिहार में महागठबंधन की कोई समीक्षा बैठक तक नहीं हुई और दोनों दलों की दूरियां और बढ़ गईं। यह हैरान करने वाला है क्योंकि बिहार में राहुल गांधी की यात्रा में तेजस्वी उनके साथ दिखे थे और कांग्रेस की सहमति से तेजस्वी यादव को मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित किया गया था।
बंगाल और तमिलनाडु से भी नहीं सीखे
पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु में कांग्रेस एकमत नहीं दिखी। पश्चिम बंगाल में कभी लेफ्ट से गठबंधन की चर्चा हुई तो किसी ने तृणमूल से भी हाथ मिलाने की सलाह दी। आखिर में हाल ऐसा हो गया कि कांग्रेस ना तो तृणमूल कांग्रेस के साथ गई और ना ही लेफ्ट से उसका गठबंधन हुआ। नतीजा फिर वैसा ही रहा और कांग्रेस सिर्फ 2 विधानसभा सीटों पर सिमटकर रह गई। रणनीतिक स्तर पर भी कांग्रेस की तरफ से स्पष्टता नहीं दिखी। कभी राहुल गांधी ने अभिषेक बनर्जी से फोन पर बात की तो कभी सार्वजनिक तौर पर ममता बनर्जी की सरकार की आलोचना करने लगे।
ऐसा ही हाल तमिलनाडु में भी दिखा। तमिलनाडु में एक वर्ग द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (DMK) के साथ गठबंधन चाहता था तो दूसरा तमिलागा वेट्री कड़गम (TVK) के साथ जाना चाहता था। आखिर में डीएमके के साथ ही जाने का फैसला हुआ और इस गठबंधन को हार मिली। गनीमत यह रही कि विजय की पार्टी सरकार बनाने की स्थिति में आ गई और कांग्रेस ने उसके साथ जाने का फैसला किया। अब उसका और DMK का गठबंधन टूट गया है और उसने TVK के साथ चलने का एलान कर दिया है।
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ऐसे में कांग्रेस की रणनीति तीन राज्यों में बुरी तरह फ्लॉप हो चुकी है। इसके बावजूद उसने उत्तर प्रदेश में वही रास्ता अपना लिया है। ऐसे में यह देखना होगा कि आगे आने वाले चुनाव में कांग्रेस क्या तय करती है और उत्तर प्रदेश में वह किसके साथ जाती है।
