उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 की आहट के साथ दलित राजनीति फिर से प्रदेश की सियासत का सबसे बड़ा केंद्र बनती जा रही है। बहुजन समाज पार्टी (BSP) सुप्रीमो मायावती एक तरफ संगठन को फिर से खड़ा करने के लिए प्रदेशभर में प्रभारियों की नियुक्ति, संगठनात्मक फेरबदल और बूथ स्तर तक कैडर को सक्रिय करने में जुटी हैं। दूसरा तरफ, आजाद समाज पार्टी (कांशीराम) के राष्ट्रीय अध्यक्ष एवं नगीना सांसद चंद्रशेखर आजाद जिला-दर-जिला दौरे कर दलित समाज, युवाओं और स्थानीय नेतृत्व को अपने साथ जोड़ने की मुहिम चला रहे हैं। दोनों नेताओं की रणनीति अलग है लेकिन लक्ष्य एक- 2027 में दलित वोट पर सबसे मजबूत दावा।

 

उत्तर प्रदेश में अनुसूचित जाति की आबादी लगभग 21 प्रतिशत मानी जाती है। यही कारण है कि प्रदेश की लगभग हर बड़ी राजनीतिक पार्टी दलित वोट को अपने पक्ष में करने की कोशिश करती है। दलित समाज के भीतर जाटव समुदाय सबसे प्रभावशाली माना जाता है, जिसकी हिस्सेदारी करीब 10 से 11 प्रतिशत आंकी जाती है। यही वर्ग लंबे समय से बसपा और मायावती का सबसे मजबूत सामाजिक आधार रहा है। इसके अलावा पासी, वाल्मीकि, कोरी, धोबी, खटीक और अन्य दलित समुदाय भी चुनावी नतीजों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

इन जिलों में दलित वोट तय करता है चुनाव

राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार आगरा, अलीगढ़, हाथरस, फिरोजाबाद, मैनपुरी, एटा, कासगंज, मेरठ, सहारनपुर, मुजफ्फरनगर, बिजनौर, बुलंदशहर, बरेली, शाहजहांपुर, हरदोई, सीतापुर, उन्नाव, रायबरेली, फतेहपुर, प्रयागराज, कौशांबी, जालौन, झांसी, बांदा, चित्रकूट, सोनभद्र और मिर्जापुर सहित कई जिलों की बड़ी संख्या में विधानसभा सीटों पर दलित मतदाता जीत-हार का समीकरण तय करने की क्षमता रखते हैं। पश्चिमी उत्तर प्रदेश और बुंदेलखंड में इनकी राजनीतिक भूमिका सबसे अधिक प्रभावशाली मानी जाती है।

 

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2022 विधानसभा चुनाव और 2024 लोकसभा चुनाव में निराशाजनक प्रदर्शन के बाद मायावती अब संगठन को दोबारा मजबूत करने में जुटी हैं। प्रदेश के विभिन्न जिलों में नए प्रभारियों की नियुक्ति, पुराने पदाधिकारियों की जवाबदेही तय करना और बूथ स्तर तक कैडर को सक्रिय करने की रणनीति पर काम हो रहा है। बसपा की कोशिश अपने पारंपरिक जाटव वोट बैंक के साथ अन्य दलित समुदायों को भी फिर से जोड़ने की है।

चंद्रशेखर का मिशन—जिला-दर-जिला नई जमीन तैयार करना

दूसरी ओर चंद्रशेखर आजाद लगातार मैदान में दिखाई दे रहे हैं। हाल के सप्ताहों में उन्होंने मेरठ, सहारनपुर, मुजफ्फरनगर, बिजनौर, नगीना, हापुड़ और आसपास के कई क्षेत्रों का दौरा किया। इन दौरों में उन्होंने युवाओं से संवाद किया, स्थानीय नेताओं को जिम्मेदारियां दीं और सामाजिक मुद्दों पर खुलकर सरकार के खिलाफ आवाज उठाई। आजाद समाज पार्टी की कोशिश आंदोलन की राजनीति को चुनावी ताकत में बदलने की है।

 

मेरठ के चर्चित ललिता गौतम हत्याकांड ने दलित राजनीति में दोनों नेताओं की कार्यशैली का अंतर भी सामने ला दिया। मायावती ने सोशल मीडिया के माध्यम से सरकार से निष्पक्ष जांच और पीड़ित परिवार को न्याय दिलाने की मांग की। वहीं चंद्रशेखर आजाद खुद मेरठ पहुंचे, पीड़ित परिवार से मुलाकात की, धरने में शामिल हुए और न्याय की लड़ाई लड़ने का भरोसा दिया। इस मुद्दे पर दोनों नेताओं के बीच तीखी राजनीतिक बयानबाजी भी देखने को मिली।

क्या मायावती का जाटव वोट बैंक खिसक सकता है?

यही सवाल इस समय उत्तर प्रदेश की राजनीति में सबसे ज्यादा चर्चा का विषय बना हुआ है। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि जाटव समुदाय का बड़ा हिस्सा आज भी मायावती के साथ मजबूती से खड़ा दिखाई देता है। हालांकि, दलित युवाओं के एक वर्ग में चंद्रशेखर आजाद की स्वीकार्यता बढ़ी है। यदि यह समर्थन आने वाले महीनों में संगठनात्मक ताकत में बदलता है तो बसपा के सामने नई चुनौती खड़ी हो सकती है। हालांकि, यह कहना अभी जल्दबाजी होगी कि जाटव वोट बैंक पूरी तरह बसपा से खिसक जाएगा। चुनाव तक सामाजिक और राजनीतिक परिस्थितियां इस समीकरण को प्रभावित कर सकती हैं।

 

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राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि दलित वोट बसपा और आजाद समाज पार्टी के बीच बंटता है तो इसका लाभ भाजपा, समाजवादी पार्टी और कुछ हद तक कांग्रेस को भी मिल सकता है। वहीं यदि मायावती अपने पारंपरिक वोट बैंक को फिर से एकजुट करने में सफल रहती हैं तो बसपा मुकाबले में मजबूती से लौट सकती है। दूसरी ओर यदि चंद्रशेखर का जिला-दर-जिला अभियान दलित युवाओं और गैर-जाटव समुदायों में व्यापक समर्थन जुटा लेता है तो उत्तर प्रदेश की दलित राजनीति का समीकरण बदल सकता है।

2027 में दलित नेतृत्व की होगी असली परीक्षा

फिलहाल उत्तर प्रदेश में दलित राजनीति दो अलग-अलग रास्तों पर आगे बढ़ती दिखाई दे रही है। एक तरफ मायावती संगठन, अनुशासित कैडर और अपने पारंपरिक सामाजिक आधार के सहारे वापसी का प्रयास कर रही हैं, तो दूसरी तरफ चंद्रशेखर आजाद सड़क, आंदोलन और लगातार जमीनी मौजूदगी के जरिए नई पीढ़ी के नेता के रूप में खुद को स्थापित करने में जुटे हैं। 2027 का चुनाव यह तय करेगा कि दलित राजनीति का केंद्र फिर बसपा बनेगी या फिर चंद्रशेखर आजाद इस राजनीति में नई और निर्णायक जगह बनाने में सफल होंगे।