कभी उत्तर प्रदेश की राजनीति में पूर्ण बहुमत की सरकार बनाकर राष्ट्रीय राजनीति में मजबूत पहचान बनाने वाली बहुजन समाज पार्टी (BSP) अब अपने सबसे कठिन दौर से गुजरती दिखाई दे रही है। पिछले एक दशक में पार्टी का जनाधार लगातार सिमटा है। उत्तर प्रदेश के अलावा पंजाब, उत्तराखंड, हरियाणा, राजस्थान, मध्य प्रदेश और दक्षिण भारत के राज्यों में भी BSP का प्रदर्शन कमजोर हुआ है। ऐसे में राजनीतिक गलियारों में चर्चा तेज है कि यदि आगामी चुनावों में भी पार्टी अपेक्षित प्रदर्शन नहीं कर पाती है तो उसके राष्ट्रीय पार्टी के दर्जे पर भी संकट खड़ा हो सकता है।


BSP प्रमुख मायावती लगातार संगठन को पुनर्जीवित करने और दलित वोट बैंक को फिर से मजबूत करने में जुटी हैं लेकिन चुनावी नतीजे पार्टी के लिए लगातार चुनौती बनते जा रहे हैं।

 

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यूपी में शिखर से जमीन तक पहुंचा सियासी ग्राफ

उत्तर प्रदेश BSP की सबसे बड़ी राजनीतिक ताकत रहा है। वर्ष 2007 में पार्टी ने 206 सीटें जीतकर पूर्ण बहुमत की सरकार बनाई थी लेकिन उसके बाद लगातार गिरावट दर्ज की गई।
उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में BSP ने 2007 में 206 सीटें, 2012 में 80 सीटें और 2017 में 19 सीटें हासिल की थीं। 2022 के विधानसभा चुनाव में BSP का वोट प्रतिशत करीब 12 प्रतिशत रहा, लेकिन उसे सिर्फ एक सीट मिली। 2024 के लोकसभा चुनाव में भी पार्टी उत्तर प्रदेश की 80 सीटों में एक भी सीट नहीं जीत सकी।

 

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बंगाल, तमिलनाडु और केरल में भी नहीं खुला खाता

BSP ने हाल के विधानसभा चुनावों में पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु और केरल में भी चुनाव लड़ा, लेकिन पार्टी का प्रदर्शन बेहद कमजोर रहा।पश्चिम बंगाल में BSP ने 294 सीटों में152 सीटों  पर प्रत्याशी उतारे। पार्टी को पूरे पश्चिम बंगाल में 1.17 लाख वोट ही मिले। केरल में पार्टी ने 140 सीटों में 55 पर प्रत्याशियों को टिकट देकर मैदान में उतारा। यहां पार्टी के सभी प्रत्याशियों की जतानत जब्त हो गई। पार्टी को महज 33 हजार ही वोट मिले।

 

तमिलनाड में BSP ने 234 सीटों में से 118 सीटों पर प्रत्याशी मैदान में उतारे। यहां भी पार्टी को कुल 53 हजार वोट ही मिले। इससे पहले 2021 के पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में भी BSP को केवल 0.39 प्रतिशत वोट मिले थे और पार्टी एक भी सीट नहीं जीत सकी थी।

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आखिर क्या होता है राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा?

भारत निर्वाचन आयोग राजनीतिक दलों को उनके चुनावी प्रदर्शन के आधार पर राष्ट्रीय और राज्य स्तरीय पार्टी का दर्जा देता है। किसी पार्टी को राष्ट्रीय पार्टी बने रहने के लिए आयोग की निर्धारित शर्तों में से कोई एक पूरी करनी होतीहै। चार या अधिक राज्यों में राज्य स्तरीय पार्टी का दर्जा होना।लोकसभा चुनाव में कम से कम चार राज्यों में 6 प्रतिशत वोट और चार लोकसभा सीटें जीतना।

 

लोकसभा की कुल सीटों का कम से कम 2 प्रतिशत हिस्सा जीतना और सांसद कम से कम तीन राज्यों से होना।यदि कोई दल लगातार इन मानकों को पूरा नहीं कर पाता तो निर्वाचन आयोग उसकी मान्यता की समीक्षा कर सकता है।

 

क्यों बढ़ रही है BSP की चिंता?

राजनीतिक जानकारों का कहना है कि BSP का सबसे बड़ा आधार उसका दलित वोट बैंक रहा है लेकिन अब इस वोट बैंक में भी बिखराव दिखाई दे रहा है। बीजेपी, समाजवादी पार्टी और आजाद समाज पार्टी जैसे दल दलित मतदाताओं के बीच अपनी पैठ बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं। विशेष रूप से चंद्रशेखर आजाद के उभार के बाद पश्चिमी उत्तर प्रदेश में दलित राजनीति का नया समीकरण बनता दिखाई दे रहा है। ऐसे में BSP के सामने अपने पारंपरिक कैडर वोटरों को बचाए रखने की बड़ी चुनौती खड़ी है।

 

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2027 के चुनाव होंगे राजनीतिक भविष्य की परीक्षा

राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि वर्ष 2027 में होने वाले उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव BSP के लिए सिर्फ सत्ता की लड़ाई नहीं होंगे, बल्कि उसके राजनीतिक भविष्य की सबसे बड़ी परीक्षा साबित हो सकते हैं।यदि पार्टी उत्तर प्रदेश में मजबूत वापसी करती है और अपना वोट प्रतिशत और सीटें बढ़ाने में सफल रहती है तो राष्ट्रीय राजनीति में उसकी स्थिति मजबूत हो सकती है। 

 

अगर उसका प्रदर्शन लगातार कमजोर रहता है और अन्य राज्यों में भी संगठन सिमटता गया तो भविष्य में राष्ट्रीय पार्टी के दर्जे को लेकर सवाल और तेज हो सकते हैं। फिलहाल BSP नेतृत्व बूथ स्तर तक संगठन को सक्रिय करने, पुराने कैडर को वापस जोड़ने और दलित-पिछड़ा-सर्वजन समीकरण साधने की रणनीति पर काम कर रहा है। आने वाले चुनाव तय करेंगे कि कभी देश की सबसे प्रभावशाली दलित राजनीति की धुरी रही BSP फिर से मजबूती से उभरती है या उसका राजनीतिक दायरा और सीमित हो जाता है।