समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष और पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने शुक्रवार को बीजेपी और सीएम योगी आदित्यनाथ पर राम मंदिर को लेकर कई आरोप लगाए। उन्होंने कहा कि उत्तर प्रदेश की बीजेपी सरकार झूठी प्रशंसा बटोरने के लिए लगातार प्रायोजित कार्यक्रम कर रही है।
अखिलेश यादव ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर पोस्ट करके कहा, 'उत्तर प्रदेश की बीजेपी सरकार द्वारा एक तरफ झूठी तारीफ के प्रायोजित कार्यक्रम लगातार करवाए जा रहे हैं तो दूसरी तरफ माननीय इलाहाबाद हाई कोर्ट की फटकार ने यह कहकर रंग मे भंग कर दिया कि कार्यकाल खत्म होने के बावजूद ग्राम प्रधानों को प्रशासक बनाने का सरकार का फैसला असंवैधानिक है।'
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प्रधानों को लेकर निशाना
यूपी के पूर्व सीएम अखिलेश ने कहा, 'अब, यही ग्राम प्रधान बीजेपी कार्यकर्ताओं को गांवों में घुसने भी नहीं देंगे, क्योंकि बीजेपी सरकार के उन्हें प्रशासक बनाने के आदेश से उन्हें कुछ नया काम करने की उम्मीद जगी थी, जिसका वादा उन्होंने लोगों से किया था। अब, जनता को इस मामले की तकनीकी बातें समझ नहीं आतीं। वे तो बस यही मानेंगे कि प्रधान जी ने अपना वादा पूरा नहीं किया और 'डबल इंजन' सरकार के साथ मिलकर सारा पैसा हड़प लिया।'
जेब से उठाना पड़ सकता है खर्च
उन्होंने कहा, 'प्रधानों को यह भी डर है कि इस बीच हुए खर्चों का बोझ उन्हें अपनी जेब से उठाना पड़ सकता है। हो सकता है कि कल पैसा वापस करने का आदेश आ जाए। जब कार्यकाल ही गलत साबित हो गया है, तो उस दौरान खर्च किया गया पैसा भी कानूनी तौर पर गलत माना जाएगा।'
बीजेपी ने प्रधानों को बहुत बुरा फंसाया
सपा प्रमुख ने कहा, 'बीजेपी ने प्रधानों को बहुत बुरा फंसा दिया है। प्रधानों ने जिन ठेकेदारों को काम दिया था, वो भी बिलों का भुगतान के लिए प्रधानों का दरवाजा खटखटायेंगे। इसीलिए प्रधान अब भाजपाइयों और उनके संगी-साथियों की गांव-गांव में नाकाबंदी कर देंगे। बीजेपी बनने चली थी सयानी, निपट गई उसकी ही कहानी। बीजेपी किसी घाट की नहीं रही।'
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हाई कोर्ट ने नहीं दी अनुमति
उन्होंने यह बयान ऐसे समय में दिया है जब इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कहा है कि ग्राम प्रधानों या ग्राम पंचायत अध्यक्षों को प्रशासक के रूप में आगे काम करने की अनुमति नहीं दी जा सकती। कोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार से राज्य में पंचायत चुनाव कराने के लिए समयसीमा बताने को कहा है।
जस्टिस सिद्धार्थ नंदन ने अरविंद राठौर की याचिका पर यह आदेश पारित किया। राठौर ने 25 मई के शासनादेश और उसके अगले दिन जारी संबंधित आदेश को हाई कोर्ट में चुनौती दी थी। शासनादेश के तहत पांच वर्ष का कार्यकाल पूरा कर चुके ग्राम प्रधानों को प्रशासक नियुक्त किया गया था।


