उत्तर प्रदेश में हाशिए पर पहुंच चुकी बहुजन समाज पार्टी (BSP) हो या 2024 के लोकसभा चुनावों से उत्साहित समाजवादी पार्टी (SP), भारतीय जनता पार्टी (BJP) को 2027 के विधानसभा चुनाव में हराने के लिए एड़ी चोटी का जोर लगा रही हैं। मायावती ने रविवार को पार्टी में चुनावी रणनीति तैयार करने के लिए बैठक भी की। बीजेपी, चुनाव की तैयारी में दो साल पहले से ही लग गई है। जब सभी पार्टियां, चुनाव के लिए जोर आजमा रही हैं, कांग्रेस क्या कर रही है, इस पर सबकी नजर है।

अखिलेश यादव, सोशल मीडिया से लेकर जमीन तक, सधे कदम उठा रहे हैं लेकिन कांग्रेस यह तय नहीं कर पा रही है कि 2027 के चुनाव का आधार क्या होगा, किसके कंधे पर जिम्मेदारी रहेगी, कौन पार्टी के थोड़े संभले जनाधार को आगे बढ़ाएगा। कभी कांग्रेसी नेता मायावती से मिलने की कवायद कर रहे हैं, कभी कांग्रेस को यह इशारा करना पड़ रहा है कि वह गठबंधन के साथियों के साथ है। 

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2022 में क्या हुआ था?

2022 के विधानसभा चुनावों में कांग्रेस ने प्रियंका गांधी को चुनावी कैंपेन की जिम्मेदारी दी थी। प्रियंका गांधी ने पूर्वी उत्तर प्रदेश की कमान संभाली थी। खूब प्रचार किया, हाथरस से लेकर वाराणसी तक उन्होंने जबरदस्त कैंपेनिंग की। 

रैलियों में भीड़ भी हुई, 'लड़की हूं लड़ सकती हूं' की नारेबाजी भी काम नहीं आई। कांग्रेस पार्टी के खाते में सिर्फ 2 सीटें आईं।  फरेंदा से वीरेंद्र सिंह जीते थे और रामपुर खास से आराधना मिश्रा (मोना)। दोनों की जीत में कांग्रेस का कम, अपना जनाधार ज्यादा रहा। ये दोनों सीटें, गढ़ की तरह है। 

किसके सहारे है कांग्रेस?

उत्तर प्रदेश में कांग्रेस की कमान अजय राय संभाल रहे हैं। वह पार्टी के अध्यक्ष हैं। अजय राय की एक खासियत है, वह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ चुनाव लड़ते हैं। साल 2012 से 2017 तक, विधायक रहे हैं। अब उन्होंने वाराणसी को अपनी कर्मभूमि बनाई है और लोकसभा चुनावों में वह उतरते हैं। प्रदेश कांग्रेस के अभी वह सबसे बड़े नेता हैं। पार्टी में उनके बाद कौन है, इसकी तस्वीर बहुत साफ नहीं है। 

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होना क्या चाहिए था?

कांग्रेस को अजय राय के साथ-साथ एक मजबूत कांग्रेस टीम की जरूरत है, जो फिलहाल यूपी में नहीं है। एक जमाने में कांग्रेस के पास रीता बहुगुणा जोशी, जतिन प्रसाद, जगदंबिका पाल, सलमान खुर्शीद जैसे नेता रहे हैं, जिनकी कमी पार्टी को अब खल रही है। रीता बहुगुणा और जगदंबिका पाल, दोनों बीजेपी में हैं। सलमान खुर्शीद अब सियासी तौर पर कमजोर पड़ चुके हैं। 

पार्टी को बूथ, ब्लॉक और जिला स्तर पर नई समितियों की जरूरत है, जिस पर पार्टी अभी ध्यान नहीं दे रही है। राज बब्बर कांग्रेस में ही हैं लेकिन नेपथ्य में हैं। प्रमोद तिवारी चर्चा में रहते हैं लेकिन जमीनी पकड़ खो रहे हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि अगर इन नेताओं की जगह, पार्टी ने नए नेतृत्व पर ध्यान दिया होता पार्टी  ज्यादा मजबूत होती।   

यूपी में कांग्रेस के बड़े चेहरे कौन हैं?

प्रियंका गांधी, अब वायनाड से सांसद हैं। पार्टी में वह स्टार प्रचारक हैं लेकिन यूपी में उनकी भूमिका अभी साफ नहीं हो पाई है। राहुल गांधी ने वायनाड की जगह, रायबरेली में बने रहने का फैसला किया था। वह खुद यूपी से आते हैं इसलिए चुनावी जिम्मेदारी में उनकी भूमिका भी बड़ी है।  अब गांधी परिवार के अलावा, 5 चेहरे ऐसे हैं, जिन्हें प्रदेश कार्यकारिणी में बड़ी जगह मिल सकती है। इलाबाद लोकसभा सीट से उज्वल रमन सिंह हैं।

किशोरी लाल अमेठी से हैं, उन्होंने 2024 में तत्कालीन केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी को हराकर, पार्टी की, अपने गढ़ में वापसी कराई थी। सहारनपुर से इमरान मसूद पार्टी के नेता हैं। अब उनका कद, राष्ट्रीय स्तर का हो चुका है। आए दिन खबरों में बने रहते हैं और प्रियंका गांधी के करीबी हैं। सीतापुर से राकेश राठौर सांसद हैं। वह इन दिनों 'संविधान बचाओ संवाद' को लेकर चर्चा में हैं। फरेंदा के विधायक वीरेंद्र सिंह और रामपुर खास से विधायक आराधना मिश्रा पर भी अब पार्टी के दमदार नेताओं में गिने जा रहे हैं। 

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PDA नहीं, EBC फॉर्मूला कांग्रेस को मजबूत कर पाएगा?

उत्तर प्रदेश में अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव को लेकर कांग्रेस अब अति पिछड़ा वर्ग (EBC) को अपनी तरफ खींचने की कोशिश कर रही है। पार्टी से जुड़े सूत्रों का कहना है कि जून में लखनऊ में इन जातियों की बड़ी बैठक करने जा रही है। इस बैठक में कांग्रेस अपनी सोशल इंजीनियरिंग साधेगी।

पिछले कुछ महीनों में कांग्रेस ने किसानों, जाटों, गुर्जरों, पासी, निषाद, लोधी और अगड़ी जातियों के नेताओं के साथ अलग-अलग बैठकें की हैं। अब वह नाई, राजभर, निषाद, कश्यप, विश्वकर्मा जैसी EBC जातियों पर फोकस कर रही है। इन वर्गों की आबादी, 20 फीसदी से ज्यादा है। 

2024 की कामयाबी, 2027 में दोहरा सकेगी कांग्रेस?

साल 2019 में कांग्रेस पार्टी ने बिना किसी गठबंधन के चुनाव लड़ा था। राहुल गांधी, अमेठी से हार गए थे। रायबरेली में सिर्फ इकलौती सीट कांग्रेस बचा पाई थी। 2024 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस ने समाजवादी पार्टी के साथ गठबंधन कर 6 सीटें जीती थीं। हाशिए पर पहुंची कांग्रेस के लिए यह जीत, वरदान की तरह लगी।

अब कांग्रेस पार्टी, 2024 में हुए चमत्कार को दोहराने की कोशिश में जुटी है। राहुल गांधी 20 मई को रायबरेली गए थे। वहां उन्होंने 'बहुजन स्वाभिमान सभा' की। अब कांग्रेस की रणनीति है कि अगड़ी जातियों के साथ-साथ EBC वर्ग भी साथ दे। पार्टी के सूबे में सबसे बड़े नेता अजय राय, अगड़ी जाति से हैं। 

क्या अखिलेश के सहारे फिर सीटें आएंगी?

कांग्रेस, इंडिया गठबंधन का हिस्सा है। अखिलेश यादव, तमिलनाडु विधानसभा चुनाव के तनीजों के बाद कांग्रेस के द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (DMK) को दिए गए कथित धोखे पर तंज कस चुके हैं। उन्होंने कांग्रेस और तमिलता वेत्री कड़गम (TVK) के गठबंधन पर स्टालिन के साथ एक पुरानी तस्वीर पोस्ट करते हुए लिखा था, 'हम वो नहीं जो मुश्किलों में साथ छोड़ दें।' अब अगर अखिलेश यादव, कांग्रेस का साथ छोड़ते हैं तो टीम अजय राय के लिए मुश्किलें पैदा हो सकती हैं। कांग्रेस की जो 6 सीटें लोकसभा में आईं हैं, उनके पीछे, समाजवादी गठबंधन की बड़ी भूमिका रही है।  

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अब आगे क्या करेगी कांग्रेस?

कांग्रेस का सारा जोर, संगठन को मजबूत करने पर है। अलग बात है कि अभी तक चुनाव से पहले नई प्रदेश समिति का एलान नहीं हुआ है। यूपी में मजबूत और नए संगठन की जरूरत है। नए चेहरे की भी जरूरत है तो जो पार्टी को मजबूत कर सकें। संगठन को मजबूत करने के लिए कांग्रेस पंचायत और विधान परिषद चुनाव भी लड़ने जा रही है। 2027 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस, अब 403 सीटों में से 80 सीटें मांग रही हैं। कांग्रेस का कहना है कि 100 से ज्यादा सीटों पर कांग्रेस जीत सकती है। 

चुनौती क्या है?

अखिलेश यादव की अध्यक्षता वाली समाजवादी पार्टी, कांग्रेस को 80 सीटें देने के लिए तैयार होगी, इस पर संदेह है। अगर कांग्रेस और समाजवादी पार्टी मिलकर चुनाव में उतरते हैं तो भी 80 सीटों पर बात बन नहीं पाएगी। कांग्रेस का 2022 में प्रदर्शन बेहद खराब रहा है। सिर्फ 2 सीटें हासिल हुईं थीं, वह भी स्थानीय नेताओं के दम पर। न प्रियंका फैक्टर काम आया था, न राहुल गांधी।

साल 2017 में जब कांग्रेस और समाजवादी पार्टी का गठबंधन था, तब कांग्रेस ने 7 सीटें जीती थीं। बिहार से लेकर तमिलनाडु तक, कांग्रेस ज्यादा सीटें मांगती है लेकिन नतीजे, कांग्रेस के पक्ष में नहीं जाते हैं। अब कांग्रेस का सारा जोर, केरल की तरह कामयाबी हासिल करने की है। यूपी में कांग्रेस की राह, अखिलेश यादव आसान करेंगे या नहीं, अभी तक यह बहुत साफ नहीं है।