उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले राष्ट्रीय लोकदल (रालोद) ने अपनी राजनीतिक सक्रियता बढ़ा दी है। राष्ट्रीय लोक दल (RLD) प्रमुख जयंत चौधरी की बीजेपी के प्रदेश प्रभारी विनोद तावड़े से मुलाकात के बाद गठबंधन में सीटों के बंटवारे को लेकर चर्चाएं तेज हो गई हैं। रालोद की नजर पश्चिमी उत्तर प्रदेश से आगे बढ़कर ब्रज, बुंदेलखंड और प्रदेश के दूसरे हिस्सों में अपना राजनीतिक प्रभाव बढ़ाने पर है। विधानसभा चुनाव में ज्यादा सीटों की मांग की चर्चा के बीच बीजेपी और रालोद के बीच चुनावी तालमेल को लेकर नए सियासी समीकरण बनने लगे हैं। ऐसे में सवाल है कि 2027 के चुनाव में रालोद की मांग बीजेपी के लिए कितनी अहम होगी और गठबंधन के भीतर सीटों का गणित किस तरह तय होगा।

बीजेपी के प्रदेश प्रभारी विनोद तावड़े लगातार प्रदेश के अलग-अलग क्षेत्रों में संगठनात्मक बैठकें कर रहे हैं। इसी क्रम में 23 अक्टूबर को नई दिल्ली में उनकी रालोद के राष्ट्रीय अध्यक्ष जयंत चौधरी से मुलाकात हुई। इस मुलाकात को आगामी विधानसभा चुनाव की तैयारियों और गठबंधन की रणनीति के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि रालोद अपनी मौजूदा राजनीतिक स्थिति और संगठन के विस्तार को देखते हुए विधानसभा चुनाव में अधिक सीटें चाहती है। हालांकि, सीटों के बंटवारे को लेकर किसी अंतिम समझौते की आधिकारिक घोषणा नहीं हुई है।

 

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सपा से अलग होने के बाद बीजेपी के साथ आया रालोद

जयंत चौधरी और समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव के बीच गठबंधन टूटने के बाद रालोद ने बीजेपी के साथ राजनीतिक साझेदारी की राह चुनी थी। इसके बाद से पार्टी का फोकस पश्चिमी उत्तर प्रदेश में अपनी स्थिति मजबूत करने के साथ दूसरे क्षेत्रों में भी संगठन का विस्तार करने पर रहा है। रालोद का प्रभाव मुख्य रूप से जाट और किसान राजनीति से जुड़े इलाकों में माना जाता है।

 

पश्चिमी उत्तर प्रदेश के अलावा ब्रज, बुंदेलखंड और अन्य क्षेत्रों में अपनी पहुंच बढ़ाने की कोशिश पार्टी की चुनावी रणनीति का हिस्सा है। रालोद के लिए 2027 का विधानसभा चुनाव अपनी राजनीतिक ताकत और गठबंधन में हिस्सेदारी बढ़ाने का अवसर है। पार्टी चाहती है कि जिन क्षेत्रों में उसका सामाजिक आधार और संगठन मजबूत है, वहां उसे अधिक सीटों पर चुनाव लड़ने का मौका मिले। दूसरी ओर, बीजेपी के सामने अपने सहयोगियों को साथ रखने के साथ संगठन के नेताओं और संभावित उम्मीदवारों की दावेदारी के बीच संतुलन बनाने की चुनौती होगी।

पश्चिमी यूपी में जाट-किसान समीकरण पर नजर

पश्चिमी उत्तर प्रदेश में जाट मतदाताओं के बीच रालोद की पकड़ गठबंधन के लिए महत्वपूर्ण मानी जाती है। किसान आंदोलन के बाद बदले राजनीतिक माहौल और विभिन्न सामाजिक वर्गों के बीच अपनी स्वीकार्यता बढ़ाने की जरूरत ने भी रालोद की भूमिका को अहम बनाया है। ऐसे में विधानसभा चुनाव में ज्यादा सीटों की मांग केवल संख्या का सवाल नहीं, बल्कि गठबंधन में अपनी राजनीतिक हिस्सेदारी बढ़ाने की कोशिश के तौर पर भी देखी जा रही है। रालोद की ताकत वाले क्षेत्रों में सीटों का बंटवारा तय करते समय पिछले चुनावों के नतीजे, उम्मीदवारों की स्थिति, जातीय समीकरण और स्थानीय संगठन की मजबूती जैसे पहलू महत्वपूर्ण होंगे। बीजेपी के लिए चुनौती यह होगी कि वह सहयोगी दल की मांगों पर विचार करते हुए अपने कार्यकर्ताओं और स्थानीय नेताओं की अपेक्षाओं को भी संतुलित रखे।

 

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सीटों के बंटवारे पर बीजेपी के रुख का इंतजार

2027 के विधानसभा चुनाव में रालोद के सामने अपनी राजनीतिक ताकत बढ़ाने की चुनौती होगी। लोकसभा चुनाव के बाद पार्टी अपनी भूमिका को और प्रभावी बनाना चाहती है। वहीं बीजेपी के लिए जरूरी होगा कि वह सहयोगी दलों की मांगों और अपने संगठन की अपेक्षाओं के बीच संतुलन बनाए। सीटों के बंटवारे पर अंतिम फैसला गठबंधन की बातचीत, क्षेत्रीय समीकरणों और चुनावी परिस्थितियों के आधार पर हो सकता है। फिलहाल जयंत चौधरी और विनोद तावड़े की मुलाकात ने उत्तर प्रदेश की राजनीति में गठबंधन और सीटों के बंटवारे को लेकर चर्चाएं तेज कर दी हैं। अब नजर इस बात पर रहेगी कि रालोद की ज्यादा सीटों की मांग पर बीजेपी का रुख क्या रहता है और दोनों दल 2027 के विधानसभा चुनाव के लिए किस तरह का चुनावी फार्मूला तय करते हैं।