सनातन धर्म एक ऐसा धर्म है, जहां सिर्फ देवी-देवताओं की ही नहीं, बल्कि पेड़-पौधों, प्रकृति, सूर्य और चंद्रमा की भी आराधना की जाती है। खासतौर पर करवा चौथ पर्व में सभी महिलाएं चंद्रमा को अर्घ्य देने के बाद व्रत खोलती हैं। इसी प्रकार हिंदू धर्म में कई ऐसे त्योहार हैं, जिनमें चंद्र देव को अर्घ्य दिया जाता है। उसके बाद ही व्रत का पारण किया जाता है। ऐसे में लोगों को चंद्र देव से जुड़ी कुछ खास बातें जाननी चाहिए।
29 अक्टूबर को पावन करवा चौथ का पर्व मनाया जाएगा। इस शाम महिलाएं चंद्रमा के निकलने का बेसब्री से इंतजार करेंगी। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, चंद्रमा व्यक्ति के मन का प्रतीक है। इसकी स्थिति बदलने से व्यक्ति के मन के भावों में बदलाव आता है। इसके अलावा, ऋग्वेद में बताया गया है कि भगवान विष्णु के मन से चंद्रमा की उत्पत्ति हुई है। इस वजह से हिंदू धर्म में चंद्रमा को पूजनीय माना जाता है।
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किन पर्वों में चंद्रमा को देते हैं अर्घ्य?
हिंदू धर्म में कई ऐसे त्योहार हैं, जिनका मुख्य केंद्र चंद्र देव होते हैं। ज्योतिष शास्त्र में माना जाता है कि चंद्र देव व्यक्ति के मन के कारक हैं। माना जाता है कि चंद्रमा के प्रभाव से व्यक्ति के जीवन और पारिवारिक जीवन में खुशहाली आती है। इसी प्रकार हर महिला खुशहाल पारिवारिक जीवन के लिए करवा चौथ का व्रत रखती है और शाम को खास तौर पर चंद्रमा को अर्घ्य देती है।
संकष्टी गणेश चतुर्थी
यह पर्व महिलाएं अपनी संतान के सुखी जीवन और लंबी उम्र के लिए रखती हैं। इस दिन महिलाएं पूरे दिन व्रत रखती हैं और शाम के समय चंद्र देव को अर्घ्य देकर व्रत का पारण करती हैं। इस पर्व पर चंद्र देव की पूजा-पाठ करने के साथ-साथ महिलाएं भगवान गणेश और माता लक्ष्मी की भी आराधना करती हैं।
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हलषष्ठी
यह त्योहार खास तौर पर मध्य प्रदेश, राजस्थान और गुजरात में मनाया जाता है। इसमें परिवार की सुख-शांति और समृद्धि के लिए महिलाएं व्रत रखती हैं। फिर शाम को विधिवत ढंग से चंद्रमा को अर्घ्य देती हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, अर्घ्य दिए बिना यह व्रत अधूरा रह जाता है।
क्यों की जाती है चांद की पूजा?
धार्मिक ग्रंथ ऋग्वेद में बताया गया है कि चंद्रमा भगवान विष्णु के मन से उत्पन्न हुए हैं। इसी वजह से लोग चंद्र देव की आराधना करते हैं। इसी सिलसिले में शिव पुराण में बताया गया है कि जब भगवान शिव और माता पार्वती तांडव करते-करते एक होने लगे, तो भगवान शिव की आंखों के तेज से सूर्य देव उत्पन्न हुए और माता पार्वती की कोमल देह से चंद्रमा की उत्पत्ति हुई।
चन्द्रमा मनसो जातश्चक्षोः सूर्यो अजायत, श्रोत्राद्वायुश्च प्राणश्च हृदयात्सर्वमिदं जायते।
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ऋग्वेद के इस श्लोक का अर्थ है कि भगवान विष्णु के मन से चंद्रमा की उत्पत्ति हुई और आंखों के तेज से सूर्य की उत्पत्ति हुई। इस हिसाब से चंद्रमा और सूर्य भगवान विष्णु के अंश माने जाते हैं। इसी चलते कई त्योहारों में चंद्रमा की पूजा की जाती है।
नोट: यह लेख धार्मिक मान्यताओं और गणनाओं पर आधारित है। इसकी पुष्टि हम नहीं करते हैं।
