आज के दौर में कई लोग ऐसे हैं, जिन्हें बात-बात पर गुस्सा आ जाता है। इसी गुस्से की वजह से व्यक्ति अपने करीबी लोगों को ऐसी बातें बोल देता है, जिससे करीबी लोग व्यक्ति से दूर हो जाते हैं। ऐसे व्यक्ति अक्सर अपने क्रोध और अहंकार पर काबू पाने की कोशिश करते हैं। ऐसे में व्यक्ति को पर्युषण त्योहार की परंपराओं को अपनाना चाहिए, जिसके जरिए व्यक्ति अपने मन के क्रोध और अहंकार जैसे भावों को खत्म कर पाएगा।

 

पर्युषण त्योहार जैन धर्म का बेहद खास त्योहार है। इस त्योहार के जरिए व्यक्ति को सही ढंग से जीने की सीख मिलती है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, पर्युषण एक ऐसा त्योहार है, जो व्यक्ति के मन और आत्मा को आपस में जोड़ता है, ताकि व्यक्ति की आत्मा सांसारिक चीजों से विचलित न हो। इस साल यह त्योहार 8 सितंबर से शुरू होकर 8 दिनों तक मनाया जाएगा। इन 8 दिनों में अलग-अलग परंपराएं निभाई जाती हैं।

 

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पर्युषण पर्व का महत्व

जैन धर्म में श्वेतांबर से लेकर दिगंबर तक पर्युषण पर्व को मनाते हैं। माना जाता है कि इस पर्व के प्रभाव से व्यक्ति को सात्विक जीवन जीने की सीख मिलती है। साथ ही व्यक्ति अपने जीवन की बुराइयों को खत्म कर सकता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, व्यक्ति व्रत का संकल्प लेकर व्रत करते हैं। साथ ही कई लोग तप भी करते हैं।

 

इस पर्व के दौरान जहां एक तरफ कई लोग पूरे दिन व्रत रखते हैं, वहीं कई लोग एक समय भोजन करके साधना करते हैं। जैन धर्म ग्रंथों के मुताबिक, व्यक्ति को पर्युषण त्योहार के दौरान कथा सुननी चाहिए। धार्मिक जानकारों का मानना है कि पर्युषण त्योहार में सिर्फ भोजन का त्याग करना नहीं सिखाया जाता, बल्कि व्यक्ति को अच्छा इंसान बनना भी सिखाया जाता है।

 

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8 दिनों की क्या है परंपरा?

पर्युषण पर्व के पहले दिन सभी भक्त पूजा-पाठ और तप का संकल्प लेते हैं। दूसरे और तीसरे दिन व्रत रखने की परंपरा है। चौथे और पांचवें दिन धार्मिक ग्रंथ पढ़े जाते हैं। साथ ही, जो लोग कथा नहीं पढ़ते हैं, वे लोग कथा सुनते हैं। कथा के जरिए जीवन की सीख ली जाती है।

 

पर्व के छठे दिन त्याग, संयम और संतुष्टि जैसे भाव अपनाए जाते हैं। सातवें दिन महावीर के जन्म प्रसंग की कथा पढ़ी या सुनी जाती है। पर्व के आखिरी दिन यानी आठवें दिन संवत्सरी मनाई जाती है, जिसमें व्यक्ति अपने जीवन में की गई गलतियों के लिए क्षमा मांगता है।धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इन्हीं परंपराओं को निभाकर व्यक्ति अपने स्वभाव को बदल सकता है, जिससे क्रोध जैसे भावों से मुक्ति पाई जा सकती है।

 

नोट: यह लेख धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है। हम इसकी पुष्टि नहीं करते हैं।