कई बार व्यक्ति कुछ ऐसे निर्णय ले लेता है, जिसकी वजह से भविष्य में उसे समस्या का सामना करना पड़ता है। इसके अलावा व्यक्ति कई बार जाने-अनजाने में गलती कर बैठता है, जिसके बाद वह पछतावे के बोझ तले दब जाता है। जो लोग इसी प्रकार की समस्या का सामना कर रहे हैं, उन लोगों को भगवद्गीता के एक खास श्लोक को पढ़ना और समझना चाहिए। उस श्लोक के जरिए व्यक्ति अपने जीवन की सभी उलझनों और समस्याओं का समाधान पा सकता है।
सनातन धर्म में भगवद्गीता को बेहद खास ग्रंथों में से एक माना जाता है। इस ग्रंथ में वही बातें लिखी गई हैं, जो महाभारत में भगवान श्रीकृष्ण जी ने अर्जुन को उपदेश के रूप में बताई थीं। श्रीमद्भगवद्गीता में कुल 700 श्लोक लिखे हैं, जिनमें एक श्लोक बेहद खास और अहम है। अगर आज के दौर में व्यक्ति भगवद्गीता के इस श्लोक को अपना लें, तो व्यक्ति आसानी से कई समस्याओं का सामना कर सकता है। आइए जानते हैं वह श्लोक, जिसे अपनाकर व्यक्ति अपने जीवन की सभी उलझनों को दूर कर सकता है।
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भगवद्गीता का खास श्लोक
भगवद्गीता के अठारहवें अध्याय के 66वें श्लोक के जरिए भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को उपदेश दिया। श्रीकृष्ण ने अर्जुन से कहा, हे अर्जुन, तुम अपने सारे कर्मों के उलझनों को छोड़कर मेरी शरण में आ जाओ। मैं तुम्हें सभी पापों से मुक्त करा दूंगा। तुमने जो बुरे कर्म किए हैं, अब उनका पश्चाताप मत करो।
सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज।
अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः।।
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इस श्लोक से हमें सीख मिलती है कि जब समस्या का सामना करना पड़े, तब व्यक्ति को अकेले उस समस्या को लेकर शोक नहीं मनाना चाहिए। इसके बजाय व्यक्ति को भगवान की शरण लेनी चाहिए। साथ ही व्यक्ति को अपनी गलतियों को लेकर लंबे समय तक शोक नहीं मनाना चाहिए। इसके बजाय भगवान पर भरोसा करके अपनी गलतियों से सीख लेनी चाहिए और आगे बढ़ना चाहिए। इसी श्लोक को अपने जीवन में अपनाने से न सिर्फ व्यक्ति को मन की शांति मिलेगी, बल्कि जीवन की अलग-अलग उलझनों से भी व्यक्ति को मुक्ति मिलेगी।
इसके अलावा भगवद्गीता में एक और श्लोक बताया गया है, जिसे पढ़कर व्यक्ति को कर्म करते रहने की प्रेरणा मिलती है। वह श्लोक भगवद्गीता के अध्याय 2 का 47वां श्लोक है, जिसमें श्रीकृष्ण ने कर्म को लेकर समझाया है।
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कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि।।
इस श्लोक का मतलब है कि व्यक्ति का अधिकार है कि वह कर्म करता रहे। इसके बजाय व्यक्ति को कर्म के फल की चिंता नहीं करनी चाहिए। इसलिए व्यक्ति को न फल के लिए कर्म करना चाहिए और न ही कर्म के परिणाम के बारे में सोचकर कर्म छोड़ना चाहिए।
