86वां अखिल भारतीय पीठासीन अधिकारी सम्मेलन (AIPOC) 19 से 21 जनवरी 2026 तक उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में आयोजित हुआ था। इस कार्यक्रम के समापन पर पहुंचे लोकसभा के स्पीकर ओम बिरला ने कहा कि यह सुनिश्चित किया जाएगा कि आने वाले समय में देश के सभी राज्यों की विधानसभाओं में हर साल से कम 30 दिनों की बैठकें जरूर हों। जब वह ये बातें बोल रहे थे तब उनकी बाईं ओर उत्तर प्रदेश विधानसभा के अध्यक्ष सतीश महाना बैठे थे। सतीश महाना उस विधानसभा के अध्यक्ष है जहां साल 2025 से 365 दिनों में सिर्फ 17 दिन सदन की कार्यवाही चली। इतना ही नहीं, उत्तर प्रदेश में साल 2006 के बाद एक भी साल ऐसा नहीं रहा जब किसी भी साल में 30 दिन की कार्यवाही चली हो। ऐसा तब हो रहा है जब उत्तर प्रदेश में हर साल 90 दिन सदन चलना अनिवार्य है।

 

यह भी देखने को मिला है कि जैसे-जैसे सरकारें मजबूत होती गईं, वैसे-वैसे विधानसभा से सत्रों की संख्या कम होती जा गई है। जिन विधानसभाओं के कार्यकाल में कई मुख्यमंत्री रहे या फिर गठबंधन की सरकारें रहीं उनमें सदन की कार्यवाही चलने के दिन ज्यादा रहे। इतिहास बताता है कि पहली विधानसभा में जहां 5 साल में कुल 441 दिन सदन की कार्यवाही चलनी थी, वहीं मौजूदा 18वीं विधानसभा में सिर्फ 83 दिन ही सदन चला है।

अपने ही बनाए नियम नहीं मान रही UP सरकार

द रूल्स ऑफ प्रोसीजर एंड कंडक्ट ऑफ बिजनेस ऑफ द उत्तर प्रदेश लेजिस्लेटिव असेंबली, 2023 के मुताबिक, संविधान के अनुच्छेद 174 के मुताबिक, हर साल विधानसभा के तीन सत्र यानी बजट सत्र, मानसून सत्र और शीतकालीन सत्र बुलाया जाना चाहिए। इसके साथ ही, उत्तर प्रदेश में हर साल 90 दिन की कार्यवाही होनी चाहिए। इतना ही नहीं, हर सत्र कम से कम 10 दिन का होना चाहिए और एक सत्र से दूसरे सत्र का अंतर 2 महीने का होना चाहिए।

 

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स्पष्ट है कि ये नियम उत्तर प्रदेश की मौजूदा योगी आदित्यनाथ सरकार ने ही बनाए हैं। बता दें कि विधानसभा सत्र बुलाने का काम राज्यपाल का है लेकिन वह राज्य की सरकार की सलाह पर ही सदन बुलाती हैं। मौजूदा 18वीं विधानसभा की बात करें तो 2022 से अभी तक कुल 83 दिन की ही कार्यवाही हुई है। 2022 में 16, 2023 में 20, 2024 में 16, 2025 में 17 और 2026 में 14 दिन ही सदन की कार्यवाही चली है। यानी मौजूदा विधानसभा में एक भी साल ऐसा नहीं रहा जब सदन की कार्यवाही 90 दिन चली हो। यहां तक कि अभी तक के कार्यकाल को मिलाकर भी 90 दिन पूरे नहीं हुए हैं। बस एक शर्त का पालन हुआ है कि हर साल तीनों सत्र बुलाए गए हैं। 

 

एक और शर्त है कि जितना संभव हो, हर सत्र कम से कम 10 दिनों का होना चाहिए। मौजूदा 18वीं विधानसभा में साल 2023, 2025 और 2026 के बजट सत्र ही ऐसे रहे जो कम से कम 10 दिन चले। बाकी हर साल के मानसून सत्र और शीतकालीन सत्र कभी भी 10 दिन नहीं पूरा कर सके। 2023 में ही एक और शर्त रखी गई थी कि दो सत्रों के बीच 2 महीने का ही अंतर होना चाहिए। मौजूदा विधानसभा में सिर्फ 2022 ऐसा था जब सितंबर के बाद दिसंबर में यानी 2 महीने के अंतर पर सत्र बुलाया गया। बाकी के सालों में एक साल के शीतकालीन सत्र और दूसरे साल के बजट सत्र में ही 2 महीने से कम का अंतर रहा वरना सभी सत्र 2 महीने से ज्यादा के अंतराल पर ही बुलाए गए।

 

अगस्त 2026 में खत्म हुए 15वें सत्र तक 117 बिल पास कराए जा चुके थे। इन 15 सत्रों में विधानसभा की कार्यवाही सिर्फ 83 दिन ही चली लेकिन बिल 117 पास हो गए। इस तरह हर दिन औसतन 1.4 बिल पास हुए। हमने इसका कारण जानने के लिए अपने सवाल उत्तर प्रदेश की राज्यपाल और विधानसभा के स्पीकर को भी भेजे हैं। खबर लिखे जाने तक कोई जवाब नहीं मिला है। अगर हमें जवाब मिलता है तो उसे भी स्टोरी में शामिल किया जाएगा।   

 

17वीं विधानसभा कैसी रही?

मई 2017 से दिसंबर 2021 तक चली 17वीं विधानसभा के दौरान कुल 102 दिन सदन की कार्यवाही हुई थी। कुल 15 सत्रों में बंटे पांच साल में एक भी साल ऐसा नहीं रहा जब 90 दिन सदन की कार्यवाही चली हुई। साल 2018 में अधिकतम 25 दिन सदन की कार्यवाही चली थी। इन पांच साल में 29 प्रतिशत दिन ऐसे रहे जब सदन की कार्यवाही 2 घंटे से भी कम चली। 44 प्रतिशत दिन ऐसे रहे जब सदन की कार्यवाही 2 से 6 घंटे के बीच चली और सिर्फ 28 प्रतिशत दिन ऐसे रहे जब सदन की कार्यवाही 6 घंटे से ज्यादा चली।

 

PRS लेजिस्लेटिव रिसर्च की रिपोर्ट बताती है कि 45 प्रतिशत बिल जिस देश पेश किए गए उसी दिन पास भी हो गए। 29 प्रतिशत बिल पेश किए जाने के अगले दिन पास हो गए। 18 प्रतिशत बिल पेश किए जाने के 5 दिन के अंदर पास हुए और सिर्फ 8 प्रतिशत बिल ऐसे रहे जिनको पास होने में 5 दिन से ज्यादा का समय लगा। इस दौरान कुल 146 बिल पेश किए जिसमें साल 2020 के दूसरे सत्र में 27 बिल पेश कर दिए गए। इस सत्र में सदन सिर्फ 3 दिन चला लेकिन बिल 27 पेश किए गए।

 

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रोचक बात है कि इसी 17वीं विधानसभा के कार्यकाल के दौरान कुल 57 अध्यादेश लाए गए। यहां यह बात ध्यान देने वाली है कि इसी विधानसभा के कार्यकाल के दौरान कोरोना महामारी आई थी और कई अहम जरूरतों के लिए अध्यादेश लाए गए।

 

 

UP विधानसभा के सत्रों का इतिहास

पहली विधानसभा (1952 से 1957): 1951-52 में हुए चुनाव में उत्तर प्रदेश में विधानसभा सीटों की संख्या 430 थी। पहले चुनाव में कांग्रेस ने 388 सीटें जीतकर प्रचंड बहुमत हासिल किया था। सोशलिस्ट पार्टी को 20 सीटें मिली थीं और 15 निर्दलीय विधायक जीते थे। कांग्रेस ने पहले से ही संयुक्त प्रांत के प्रधानमंत्री और फिर मुख्यमंत्री रहे गोबिंद बल्लभ पंत को मुख्यमंत्री बनाया। 20 मई 1952 को विधानसभा चुनाव के बाद पहले मुख्यमंत्री बने गोविंद बल्लभ पंत 1954 के आखर में केंद्र की नेहरू सरकार में गृहमंत्री बने। कुर्सी खाली हुई तो कांग्रेस ने वाराणसी से आने वाले नेता संपूर्णानंद को मुख्यमंत्री बनाया। 1957 के चुनाव में कांग्रेस संपूर्णानंद और पंडित नेहरू के चेहरे को लेकर ही उतरी। 1952 से 1957 तक नाम मात्र का विपक्ष होने के बावजूद यह अब तक का सबसे व्यस्त विधानसभा वाला कार्यकाल रहा। इन 5 सालों में विधानसभा की कार्यवाली 441 दिन चाली। यानी पांच साल में एक साल से ज्यादा समय तक विधानसभा की कार्यवाही चली।

 

पहली विधानसभा (1957 से 1962): 1957 के चुनाव में भी कांग्रेस को बंपर जीत मिली। 430 में से 286 सीटें जीतने वाली कांग्रेस के सामने इस बार थोड़ा मजबूत विपक्ष था। भारतीय जनसंघ ने 17, सीपीआई ने 9, प्रजा सोशलिस्ट पार्टी ने 44 सीटें जीतीं और 74 निर्दलीय विधायक जीते। संपूर्णानंद के रहते जीत मिली थी तो फिर से उन्हें ही मुख्यमंत्री बनाया गया। हालांकि, अब कांग्रेस में गुटबाजी होने लगी थी। चंद्रभानु गुप्ता, चौधरी चरण सिंह और कमलापति त्रिपाठी जैसे नेता सरकार के खिलाफ हो गए थे। लगातार अविश्वास प्रस्ताव लाए जा रहे थे और संपूर्णानंद पर भी गंभीर आरोप लग रहे थे। आखिर में कांग्रेस ने उनसे इस्तीफा ले लिया और 7 दिसंबर 1960 को चंद्रभानु गुप्ता को मुख्यमंत्री बनाया। इस राजनीतिक उठापटक के बीच पांच साल में कुल 411 दिनों तक सदन की कार्यवाही चली।

 

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तीसरी विधानसभा (1962 से 1967): 1960 में मुख्यमंत्री बदलने वाली कांग्रेस तीसरे चुनाव में चंद्रभानु गुप्ता के चेहरे के साथ ही उतरी। इस बार कांग्रेस की सीटें और कम हुईं और वह 249 सीटों के साथ ही सरकार बना पाई। जनसंघ को 49, प्रजा सोशलिस्ट पार्टी को 38, सोशलिस्ट पार्टी को 24 और स्वतंत्र पार्टी को 15 सीटों पर जीत मिली। कांग्रेस के सामने गुटबाजी की समस्या बढ़ती जा रही थी। कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व ने चंद्रभानु गुप्ता से भी इस्तीफा ले लिया और इस बार 2 अक्टूबर 1963 को सुचेता कृपलानी को मुख्यमंत्री बनाया गया। इस विधानसभा में भी विधानसभा काफी व्यस्त रही और कुल 389 दिन सदन की कार्यवाही चली। चौथी विधानसभा के लिए चुनाव हुए तब तक सुचेता कृपलानी ही सीएम रहीं।

 

चौथी विधानसभा (1967 से 1969): लगातार तीन बार अपने दम पर सरकार बनाती रही कांग्रेस पहली बार बहुमत से दूर रह गई। विधानसभा में कांग्रेस 199 सीटें ही जीत पाई थी। भारतीय जनसंघ ने कुल 98 सीटें जीत ली थी और वह दूसरी सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी थी। संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी ने 44, सीपीआई ने 13, सीपीएम ने 1, प्रजा सोशलिस्ट पार्टी ने 11, आरपीआई ने 10 और स्वतंत्र पार्टी ने 12 सीटें हासिल की थी। कांग्रेस ने जैसे-तैसे निर्दलीय विधायकों के सहारे सरकार बनाई। रोचक बात थी कि 37 निर्दलीय विधायकों में 17 कांग्रेस के बागी ही थी।

 

इस बार सरकार बनी तो चंद्रभानु गुप्ता मुख्यमंत्री बने। हालांकि, यहीं पर चौधरी चरण सिंह ने बगावत कर दी। उनकी बात नहीं मानी गई तो वह कांग्रेस से अलग हो गए और भारतीय क्रांति दल की स्थापना की। चरण सिंह ने संयुक्त विधायक दल के नाम से एक अलग गठबंधन बनाया और इस गठबंधन को जनसंघ का भी साथ मिला। दूसरा सबसे बड़ा दल संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी था। जनसंघ के राम प्रकाश तक डिप्टी सीएम बने। जैसे-तैसे जोड़-तोड़कर बनी यह सरकार एक साल भी नहीं चली। तब कांग्रेस में ही कांग्रेस (आर) नाम का धड़ा बना था और इस धड़े ने भी चरण की सरकार का समर्थन किया था। 1970 में इसी कांग्रेस (आर) ने समर्थन वापस ले लिया तो चरण सिंह की सरकार गिर गई। इस सरकार के गिरने के बाद लगभग एक साल तक राष्ट्रपति शासन लागू रहा और फिर नए सिरे से चुनाव कराएगे। यही कारण रहा कि चौथी विधानसभा के कार्यकाल में सदन की कार्यवाही सिर्फ 43 दिन ही हुई।

 

पांचवीं विधानसभा (1969 से 1974): सिर्फ 2 साल में ही दूसरे विधानसभा चुनाव का सामना करने वाले उत्तर प्रदेश में इस बार विधानसभा की सीटें 425 थीं। कांग्रेस को 211 सीटें ही मिलीं और उसे फिर से अपने दम पर बहुमत नहीं मिला।  भारतीय जनसंघ को 49 और संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी को 33 सीटों पर जीत मिली थी। भारतीय क्रांति दल को 98 सीटों पर जीत मिली थी। इस बार कांग्रेस (O) की ओर से त्रिभुवन नारायण सिंह को मुख्यमंत्री बनाया गया। वह सीएम तो बने लेकिन किसी भी सदन के सदस्य नहीं थे। उन्होंने मानीराम विधानसभा सीट से चुनाव लड़ा लेकिन हार गए और इस्तीफा देना पड़ा। अब मौका मिला कमलापति त्रिपाठी को। पार्टी संभली तो 1973 में PAC ने विद्रोह कर दिया। इस विद्रोह को दबाने के लिए सेना बुलानी पड़ी और हिंसक संघर्ष हुआ। आखिरकार इसकी नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए कमलापति त्रिपाठी ने इस्तीफा दे दिया और राष्ट्रपति शासन लागू हो गया। राष्ट्रपति शासन लागू खत्म हुआ तो 8 नवंबर 1973 को हेमवती नंदन बहुगुणा को सीएम बनाया गया। तीन बार सीएम बदलने और राष्ट्रपति शासन लागू होने के बावजूद पांचवी विधानसभा का सत्र 238 दिन चला।

 

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छठी विधानसभा (1974 से 1977): 1974 के चुनाव में हेमवती नंदन बहुगुणा को मुख्यमंत्री बनाने के बाद उतरी कांग्रेस के लिए थोड़ी राहत रही। कांग्रेस ने कुल 215 सीटें जीतीं और अकेले  बहुमत हासिल कर लिया। भारतीय क्रांति दल को 106 और जनसंघ को 61 सीटों पर जीत मिली। सीपीआई को 16 सीटें मिली थीं। कांग्रेस ने आराम से सरकार बना ली थी और हेमवती नंदन बहुगुणा एक बार फिर से मुख्यमंत्री बने। देश में जून 1975 में इमरजेंसी लगाई गई। तब संजय गांधी पूरा कंट्रोल चाहते थे और इसी को लेकर हेमवती नंदन बहुगुणा से उनका टकराव होने लगा था। कई महीने तक चली खींचतान के बाद 30 नवंबर 1975 को हेमवती नंदन बहुगुणा ने इस्तीफा दे दिया। तुरंत राष्ट्रपति शासन लागू हो गया और 21 जनवरी 1976 को नारायण दत्त तिवारी मुख्यमंत्री बन गए। मार्च 1977 में आपातकाल खत्म हुआ तो माहौल कांग्रेस के खिलाफ था। खराब होते माहौल के बीच 30 अप्रैल 1977 को एन डी तिवारी ने मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया और विधानसभा भंग कर दी गई। उठापटक वाली इस छठी विधानसभा में कुल 152 दिन विधानसभा की कार्यवाही चली।

 

सातवीं विधानसभा (1977 से 1980):  आपातकाल के तुरंत बाद हुई चुनाव में कांग्रेस की जबरदस्त हार हुई। नई-नई बनी जनता पार्टी ने कुल 352 सीटें जीतीं। कांग्रेस सिर्फ 47 सीटों पर सिमट गई। सीपीआई ने 9 और सीपीएम ने सिर्फ एक सीट जीती थी। कुल 16 निर्दलीय विधायक जीते थे। जनता पार्टी ने राम नरेश यादव को मुख्यमंत्री बनाया। जनता पार्टी को भी कांग्रेस वाली बीमारी ने घेर लिया था और आपसी कलह बढ़ने लगी थी। उस वक्त जनता पार्टी में जनसंघ के भी नेता थे। दोहरी सदस्यता के विवाद पर राम नरेश यादव फंस गए। जब जनसंघ की पृष्ठभूमि वाले नेता जनता पार्टी की इस सरकार से बाहर आ गए तो राम नरेश यादव की सरकार अल्पमत में दिखने लगी थी। इसी बीच 14 फरवरी 1979 को यूपी सरकार ने आदेश जारी कर दिया कि बिना अनुमति के RSS की शाखाएं सार्वजनिक जगहों पर नहीं लगेंगी।

 

शक्ति परीक्षण हुआ और राम नरेश यादव बहुमत नहीं साबित कर पाए तो उन्हें इस्तीफा देना पड़ा। फिर जनता पार्टी ने बनारसी दास को मुख्यमंत्री बनाया। हालांकि, बनारसी दास भी 1 साल नहीं पूरा कर पाए। 1979 में में कुशीनगर में हुई एक घटना के बाद तैनात की गई पीएसी पर आरोप लगे कि उसके जवानों ने गांल की महिलाओं के साथ रेप किया। मामला प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी तक पहुंचा। आखिर में 17 फरवरी 1980 को बाबू बनारसी दास की सरकार बर्खास्त कर दी गई और विधानसभा भंग होने के बाद राष्ट्रपति शासन लागू हो गया। एक बार फिर से जल्द चुनाव हुए। कम समय की सरकार के बावजूद सिर्फ तीन साल में ही विधानसभा की कार्यवाही 159 दिन चली।

 

आठवीं विधानसभा (1980 से 1985): 1980 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने वापसी कर ली। कांग्रेस (I) ने तब 309 सीटों पर जीत हासिल की और कांग्रेस (U) ने 13 जीतीं। वहीं जनता पार्टी (SC) ने 59 सीटें जीतीं और जनता पार्टी (JP) ने सिर्फ 4 सीटों पर जीत हासिल की। कांग्रेस ने इस बार विश्वनाथ प्रताप सिंह को मुख्यमंत्री बनाया। डकैतों के खिलाफ जारी अभियान के बावजूद बिगड़ती कानून व्यवस्था के चलते 28 जून 1982 को वी पी सिंह ने सीएम पद से इस्तीफा दे दिया। उनकी जगह श्रीपति मिश्रा को मौका मिला। हालांकि, राजीव गांधी के साथ बेहतर तालमेल नहीं बन पाने के चलते उन्हें भी इस्तीफा देना पड़ा। विधानसभा चुनाव से ठीक पहले एक बार फिर से एनडी तिवारी को मुख्यमंत्री बनाया गया। पांच साल में तीन मुख्यमंत्री बदले गए, तमाम उठापटक रही उसके बावजूद विधानसभा की कार्यवाही कुल 222 दिन चली।  

 

नौवीं विधानसभा (1985 से 1989): एनडी तिवारी के चेहरे पर चुनाव में उतरी कांग्रेस की सीटें कम हुईं लेकिन 269 सीटें जीतकर उसने फिर से सरकार बनाई। इस बार लोकदल को 84, जनता पार्टी को 20 और बीजेपी को 16 सीटें मिलीं। एक बार फिर से एनडी तिवारी सीएम बने लेकिन 6 महीने में ही उन्हें इस्तीफा देना पड़ा। मामला एक बार फिर से गुटबाजी का ही था। इस बार वीर बहादुर सिंह सीएम बने और 2 साल 275 दिन सरकार चलाई। चुनावी साल में जाने से पहले एक बार फिर सत्ता परिवर्तन हुआ और एनडी तिवारी फिर से सीएम बने। यही उत्तर प्रदेश में कांग्रेस की आखिरी सरकार और अब तक आखिरी सीएम साबित हुए। इस कार्यकाल में भी विधानसभा की कार्यवाही 198 दिन चली।

 

10वीं विधानसभा (1989 से 1991):  1989 के चुनाव में कांग्रेस की हार हुई जनता दल ने 208 सीटें जीतीं और कांग्रेस सिर्फ 94 पर रह गई। बीजेपी ने तब 57 सीटों पर चुनाव जीता था। बसपा ने तब 13 सीटें जीती थीं। मुलायम सिंह यादव ने पहले तो पार्टी में यानी जनता दल में चौधरी अजित सिंह को पटखनी दी और फिर कई अन्य दलों की मदद से सरकार बना ली। हालांकि, आगे चलकर कांग्रेस मुलायम सिंह यादव की सरकार से समर्थन वापस लेने और राष्ट्रपति शासन लगाने की योजना बना रही थी। मुलायम सिंह यादव ने इसे भांप लिया और इस्तीफा देकर विधानसभा भंग करवाने में सफल हो गए। 1 साल 201 दिन चली इस 10वीं विधानसभा में सिर्फ 45 दिन ही विधानसभा चली।  

 

11वीं विधानसभा (1991 से 1993): 2 साल के भीतर जब फिर से चुनाव हुए तो बीजेपी 221 सीटें जीतकर सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी। कांग्रेस सिर्फ 46 पर रह गई और जनता दल को 92 सीटें मिलीं। जनता पार्टी ने उस चुनाव में 34 सीटें और बसपा ने 12 सीटों पर चुनाव जीता। बीजेपी ने पहली बार यूपी में सरकार बनाई और कल्याण सिंह मुख्यमंत्री बने। 6 दिसंबर 1992 को अयोध्या में बाबरी विध्वंस हुआ और कल्याण सिंह ने नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया। इस एक साल 165 दिन के समय में कुल 52 दिन विधानसभा की कार्यवाही हुई। विधानसभा भंग हो गई और राष्ट्रपति शासन लागू कर दिया गया था। 

 
12वीं विधानसभा (1993 से 1996): बाबरी विध्वंस और फिर नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए कल्याण सिंह के इस्तीफा देने के बाद बीजेपी को उम्मीद थी कि अब उसे आसानी होगी। हालांकि, उसका दांव उल्टा पड़ गया। नई नवेली समाजवादी पार्टी ने 109 सीटें जीतीं, कांशीराम की अगुवाई वाली बीएसपी ने 67 सीटीं जीतीं और बीजेपी ने 177 सीटें जीतीं। बीजेपी सबसे बड़ी पार्टी होते हुए भी सत्ता से दूर रह गई। सपा-बसपा ने हाथ मिलाया तो इस गठबंधन की सीटें भी 177 हो गईं लेकिन बहुमत के लिए जरूरी 213 सीटें अभी भी दूर थीं। अब कांग्रेस 28 विधायकों वाली कांग्रेस ने इस गठबंधन का समर्थन किया तो आंकड़ा 205 तक पहुंचा। अंत में 27 विधायकों वाले जनता दल ने बाहर से समर्थन दिया और मुलायम सिंह यादव ने सरकार बनाई। सपा-बसपा के बीच तनाव बढ़ा और इसी जून 1995 में गेस्ट हाउस कांड हुआ। इसी के बाद बसपा ने इस सरकार से अपना समर्थन वापस ले लिया। लिहाजा 1 साल 181 दिन में ही मुलायम सिंह यादव की सरकार गिर गई। इस बार बीजेपी ने BSP को समर्थन दे दिया और मायावती पहली बार सीएम बन गईं। बीजेपी और बीएसपी के बीच 6-6 महीने के सीएम का फार्मूला तय हुआ था। 6 महीना पूरा होने से पहले ही जब बीएसपी ने सीएम पद खाली करने से इनकार कर दिया तो बीजेपी ने समर्थन वापस ले लिया और 137 दिन में ही सरकार गिर गई। रोचक बात है कि 137 दिन सीएम रहीं मायावती किसी भी सदन की सदस्य नहीं थीं। लिहाजा विधानसभा भंग कर दी गई और राष्ट्रपति शासन लागू हो गया। इस विधानसभा में सदन की कार्यवाही सिर्फ 71 दिन ही चली।


13वीं विधानसभा (1996 से 2002): अब तक यूपी की राजनीति पूरी तरह से बदल चुकी थी। कांग्रेस पूरी तरह बैकफुट पर थी। वहीं, सपा, बसपा और बीजेपी ने इसे त्रिकोणीय लड़ाई बना दिया था। 1996 के चुनाव में भी ऐसा ही हुआ। किसी भी एक पार्टी को बहुमत नहीं मिला। बीजेपी ने सबसे ज्यादा 74 सीटें जीतीं और कांग्रेस को सिर्फ 33 सीटें मिलीं। सपा ने 110 और बसपा ने 67 सीटें जीतीं। जाहिर था कि सरकार फिर से किसी गठबंधन की बननी थी। 6 महीने जोड़-तोड़ चली लेकिन बात नहीं बनी। आखिर में मार्च 1997 में बीजेपी और बीएसपी ने फिर से हाथ मिलाया। फार्मूला एक बार फिर से वही थी। मायावतीं 21 मार्च 1997 को सीएम पद की शपथ ली और 6 महीने बाद यानी 21 सितंबर 1997 को कुर्सी छोड़ भी दी। 21 सितंबर 1997 को बीजेपी ने फिर से कल्याण सिंह को मुख्यमंत्री बनाया। कल्याण सिंह ने सत्ता में आते ही मायावती के फैसलों को पलटना शुरू कर दिया। इसी से नाराज बसपा ने समर्थन वापस ले लिया। हालांकि, अब तक बीजेपी ने कांग्रेस और बीएसपी के कुछ विधायकों को तोड़ लिया था। फ्लोर टेस्ट में बीजेपी ने सरकार बचा ली।

 

1999 में लोकसभा के चुनाव हुए लेकिन यूपी में बीजेपी का प्रदर्शन अच्छा नहीं था। ऐसे में बीजेपी का शीर्ष नेतृत्व कल्याण सिंह से नाराज था। आखिर में कल्याण सिंह ने 12 नवंबर 1999 को इस्तीफा दे दिया और राम प्रकाश गुप्ता यूपी के सीएम बने। लगभग एक साल में राम प्रकाश गुप्ता को भी हटाया  गया और राजनाथ सिंह मुख्यमंत्री बने। इस तरह 4 सीएम और एक बार राष्ट्रपति शासन के साथ 2002 में जब इस विधानसभा का कार्यकाल खत्म हुआ तब तक सदन की कार्यवाही कुल 164 दिन चली थी।    

 

14वीं विधानसभा (2002 से 2007): बीजेपी और बीएसपी की सरकार देख चुके उत्तर प्रदेश ने 2002 में मुलायम सिंह यादव की सपा को आगे बढ़ाया। अब विधानसभा सीटों की संख्या 403 पर आ गई थी और इसमें से सपा ने 143 पर जीत हासिल की थी। बीजेपी को 88 और बीएसपी को 98 सीटों पर जीत मिली थी। कांग्रेस ने कुल 25 सीटें जीती थीं। पूर्ण बहुमत किसी के पास नहीं था तो 2 महीने फिर राष्ट्रपति शासन लागू रहा। एक बार फिर मायावती ने बीजेपी और राष्ट्रीय लोकदल के समर्थन से सरकार बनाई। 1 साल 118 दिन सरकार चली और पोटा कानून जैसे मुद्दों पर बीजेपी ने समर्थन वापस ले लिया और सरकार गिर गई। बीएसपी कई विधायकों ने पार्टी से बगावत कर दी। कांग्रेस, लेफ्ट और निर्दलीय विधायकों के सहारे मुलायम सिंह यादव सीएम बन गए और 2007 तक सरकार चलाई। इस विधानसभा में सदन की कार्यवाही कुल 144 दिन चली।  

  

15वीं विधानसभा (2007 से 2012): पिछले कई चुनावों में खिचड़ी सरकार देख चुके उत्तर प्रदेश ने 2007 में कुछ अलग कर दिखाया। तीन बार कम समय के लिए सीएम बन चुकीं मायावती को इस बार अकेले बहुमत मिला। बीएसपी ने 206 सीटें जीतीं। बीजेपी 51 और सपा 97 पर रह गई। लिहाजा मायावती ने अकेले दम पर सरकार बनाई और पूरे 5 साल सरकार चलाई। लंबे समय के बाद यह पूर्ण बहुमत वाली मजबूत सरकार थी। इसका असर विधानसभा की कार्यवाही पर दिखा। इस विधानसभा के 5 साल में सिर्फ 95 दिन ही सदन की कार्यवाही चली। 

 

16वीं विधानसभा (2012 से 2017): 2012 में चुनाव हुए तो यूपी ने सत्ता परिवर्तन करते हुए एक बार फिर प्रचंड बहुमत दिया। इस बार समाजवादी पार्टी ने 224 सीटें जीतीं और BSP सिर्फ 80 सीटों पर सिमट गई। बीजेपी 47 तो कांग्रेस सिर्फ 28 सीटें ही जीत पाई। अखिलेश यादव ने प्रचंड बहुमत की सरकार बनाई। एक बार फिर सदन की कार्यवाही कम चली। इस बार 129 दिन ही सदन चला।   

 

17वीं विधानसभा (2017 से 2022): 2017 में यूपी ने एक बार फिर प्रचंड बहुमत की सरकार बनाई और बीजेपी को मौका मिला। 312 सीटों पर बीजेपी को जीत मिली और सपा सिर्फ 47 सीटों पर सिमट गई। योगी आदित्यनाथ की अगुवाई में बनी सरकार में सदन की कार्यवाही के दिन अखिलेश सरकार की तुलना में भी कम हो गए। 5 साल में विधानसभा की कार्यवाही सिर्फ 102 दिन ही चली।

 

18वीं विधानसभा (2022 से 2027): 2022 में योगी आदित्यनाथ की अगुवाई में बीजेपी को फिर से बंपर जीत मिली। 255 सीटें जीतने वाली बीजेपी ने इस विधानसभा में विधानसभा के सत्र और सदन की कार्यवाही को और कम कर दिया। खुद के तय किए हुए सालाना 90 दिन के मानक से बीजेपी सरकार बहुत दूर रही और पांच साल में सिर्फ 83 दिन ही सदन चला।         

 


      

बाकी राज्यों में क्या है स्थिति?


PRS लेजिस्लेटिव रिसर्च की साल 2025 की रिपोर्ट बताती है उस साल देश के सभी राज्यों की विधानसभाओं को मिलाकर औसतन 24 दिन ही सदन की कार्यवाही चली। नागालैंड में सबसे कम सिर्फ 7 दिन सदन चला और ओडिशा में सबसे ज्यादा 43 दिन सदन चला। मणिपुर में राष्ट्रपति शासन लागू था। इसके अलावा, इस रिपोर्ट में अरुणाचल प्रदेश और सिक्किम का डेटा शामिल नहीं किया गया।

 

बता दें उत्तर प्रदेश में 90 दिन की कार्यवाही होना अनिवार्य है। इसी तरह राजस्थान में 60 दिन अनिवार्य हैं लेकिन 30 दिन ही सदन चला। पंजाब में 40 दिन की तुलना में 15 दिन, ओडिशा में 60 दिन की तुलना में 43 दिन, कर्नाटक में 60 दिन की तुलना में 34 दिन और हिमाचल प्रदेश में 35 दिन की तुलना में पूरे 35 दिन सदन चला। 

 

 

यह रिपोर्ट बताती है कि ज्यादातर विधानसभाओं में मुख्य तौर पर सदन बजट सत्र के दौरान यानी फरवरी और मार्च में ही चला। इसके बाद अगस्त-सितंबर में छोटे-छोटे सत्र ही चले। अगर सदन की कार्यवाही के घंटे देखे जाएं तो साल भर में देश की सभी विधानसभाओं को मिलाकर औसतन 133 घंटे की कार्यवाही हुई।

 

ये आंकड़े दिखाते हैं कि उत्तर प्रदेश के अलावा बाकी के राज्यों में जैसे-जैसे मजबूत सरकारें बनी हैं, वैसे-वैसे विधानसभा की कार्यवाही चलने के दिन कम होते गए हैं। उत्तर प्रदेश इसका सबसे शानदार उदाहरण है। देश के सबसे बड़े प्रदेश में विधायकों की संख्या 403 है लेकिन 5 साल में सिर्फ 83 दिन ही सदन की कार्यवाही चली।