क्रिकेट को जेंटलमैन गेम कहा जाता है लेकिन इसके 148 साल के इतिहास में कुछ ऐसे भी मुकाबले हुए हैं, जिन्होंने इस खेल की छवि को काफी नुकसान पहुंचाया है। ऐसा ही एक मैच भारत और वेस्टइंडीज के बीच 1976 में किंग्स्टन के सबीना पार्क में खेला गया था। यह सीरीज का आखिरी और निर्णायक मुकाबला था। इस मैच में वेस्टइंडीज के कप्तान क्लाइव लॉयड ने ऐसी खतरनाक रणनीति अपनाई, जिससे आज भी यह खूनी किंग्सटन टेस्ट के नाम से याद किया जाता है।
बिशन सिंह बेदी की कप्तानी वाली भारतीय टीम ने पोर्ट ऑफ स्पेन में खेले गए सीरीज के तीसरे मुकाबले में 403 रन के टारगेट को चेज कर वेस्टइंडीज को हैरान कर दिया था। यह उस समय टेस्ट क्रिकेट के इतिहास का सबसे सफल चेज था। इस हार के बाद वेस्टइंडीज की टीम और कप्तान लॉयड पर जबरदस्त दबाव था। लॉयड की कप्तानी खतरे में आ गई थी। अफवाहें थीं कि उन्हें वेस्टइंडीज की कप्तानी से हटाया जा सकता है। ऐसे में उन्होंने किंगस्टन में चार तूफानी तेज गेंदबाजों माइकल होल्डिंग, वेन डैनियल, बर्नार्ड जूलियन और वैनबर्न होल्डर के साथ उतरने का फैसला किया।
खतरनाक पिच पर गावस्कर-गायकवाड़ जमे
किंगस्टन के सबीना पार्क की पिच हमेशा से तेज गेंदबाजों की मददगार रही है लेकिन इस बार पिच पहले से कहीं ज्यादा सख्त थी। पिच पर इतने क्रैक थे कि आसानी से एक सिक्का अंदर जा सकता था। लॉयड ने टॉस जीता और भारत को पहले बैटिंग करने के लिए कहा। सुनील गावस्कर और अंशुमान गायकवाड़ की सलामी जोड़ी क्रीज पर उतरी। दोनों ने मुश्किल पिच पर लंच तक भारत को कोई नुकसान नहीं होने दिया।
गायकवाड़ की जीवनी 'Guts Amidst Bloodbath' में आदित्य भूषण लिखते हैं, 'सबाइना पार्क की पिच इतनी सख्त थी कि उस पर स्पाइक जूते पहनकर चलने पर लगता था कि सीमेंट की सतह पर चला जा रहा है। इसके बावजूद भारतीय ओपनर सुनील गावस्कर और अंशुमान गायकवाड़ लंच तक बिना आउट हुए स्कोर 60 तक ले गए।'
ब्रेक के बाद वेस्टइंडीज ने की बाउंसर्स की बौछार
लंच के बाद वेस्टइंडीज ने रणनीति बदली और होल्डिंग राउंड द विकेट गेंदबाजी करने लगे। डैनियल, जूलियन और होल्डर ने भी भारतीय बल्लेबाजों के शरीर को निशाना बनाना शुरू कर दिया। सबीना पार्क की उछालभरी पिच पर लगातार बाउंसर्स की बौछार की गई। बीमर गेंदें भी फेंकी जाने लगी। डैनियल यह जताते रहे कि गेंद उनके हाथ से फिसल जा रही है।
वेस्टइंडीज की शरीर को निशाना बनाने वाली गेंदबाजी पर गावस्कर ने अपनी आत्मकथा 'Sunny Days' में लिखा, 'लॉयड ने इस डर से कि उन्हें कप्तानी से हटाया जा सकता है, हालांकि उन्हें इंग्लैंड के दौरे के लिए कप्तान घोषित किया जा चुका था, हम पर तेज गेंदबाजों से हमला बोला लेकिन हम बिना विकेट गंवाए स्कोर 98 रन तक ले गए। लॉयड बहुत निराश महसूस कर रहे थे। इसलिए उन्होंने होल्डिंग को बाउंसर्स की झड़ी लगाने से नहीं रोका। ऐसा लग रहा था कि उन्होंने सोच रखा था कि अगर तुम उन्हें आउट न कर पाओ तो उन्हें चोटिल कर मैदान से बाहर कर दो।'
उस दौर में बल्लेबाज हेलमेट नहीं पहनते थे। सिर पर सिर्फ कैप होती थी। चेहरे की सुरक्षा के लिए कोई ग्रिल नहीं, कान बचाने के लिए कोई सुरक्षा नहीं। यही वजह थी कि हर बाउंसर किसी हादसे का इंतजार करता दिखाई देता था।
गावस्कर को आया गुस्सा
कैरेबियाई पेसर्स की खतरनाक गेंदबाजी से गावस्कर इतने निराश हुए कि उन्होंने गुस्से में अपना बल्ला जमीन पर फेंक दिया। गायकवाड़ उन्हें शांत कराने उनके पास पहुंचे। गावस्कर ने कहा, 'मैं इस गेंदबाजी से मरना नहीं चाहता। मैं अपने घर सुरक्षित वापस लौटना चाहता हूं, ताकि मैं अपने नवजात बेटे रोहन को देख सकूं।'
होल्डिंग इस गति से गेंदबाजी कर रहे थे कि उनकी कई गेंदें बल्लेबाज के साथ-साथ विकेटकीपर डेरेक मरे के ऊपर से भी निकल जा रही थी। सबीना पार्क में मौजूद दर्शक हर बाउंसर पर अपने गेंदबाजों का समर्थन करते। वे हर हाल में पोर्ट ऑफ स्पेन में मिली हार का बदला लेना चाहते थे। गावस्कर अपनी आत्मकथा में लिखते हैं कि उन्होंने हमारे एक भी शॉट पर ताली नहीं बजाई।
गावस्कर 66 रन बनाकर होल्डिंग की गेंद पर क्लीन बोल्ड आउट हुए। पहले दिन का खेल खत्म होने तक भारत ने 1 विकेट के नुकसान पर 175 रन बनाए। गायकवाड़ 58, जबकि मोहिंदर अमरनाथ 25 रन बनाकर नाबाद लौटे। पहले दिन के खेल में वेस्टइंडीज ने सिर्फ 65 ओवर डाले।
'...अमरनाथ का सिर उड़ा ले जाती गेंद'
दूसरे दिन की शुरुआत में होल्डर की एक गेंद अमरनाथ के टखने के जोड़ पर जा लगी। इसके कुछ ही देर पर बाद वह होल्डिंग की जानलेवा बाउंसर पर आउट हो गए। गायकवाड़ याद करते हैं 'होल्डर भी लगभग उसी गति से गेंद फेंक रहे थे, जितनी होल्डिंग... अमरनाथ अपने स्कोर में सिर्फ 14 रन जोड़ सके। वह एक ऐसी गेंद पर डिफेंस करते हुए आउट हुए, जिसे अगर उन्होंने नहीं खेला होता तो वह उनका सिर उड़ा ले जाती।'
अमरनाथ के चोटिल होने के बाद क्रीज पर उतरे गुंडप्पा विश्वनाथ को होल्डिंग ने एक तेज शॉर्ट गेंद डाली। इस गेंद को डिफेंस करने के प्रयास में विश्वनाथ न सिर्फ अपनी उंगली तुड़वा बैठे, बल्कि उन्होंने कैच भी दे दिया।
इस बीच गायकवाड़ भी चोटिल हो चुके थे। आदित्य भूषण लिखते हैं, 'पसलियों में दर्द के चलते गायकवाड़ के लिए जरा भी पैर हिलाना मुश्किल हो रहा था। जितनी तेजी से उन्हें गेंद लगती उतने ही दृढ़ निश्चय से वह एक बहादुर मुक्केबाज की तरह अगली गेंद खेलने के लिए तैयार होते। तकलीफ के बावजूद वह अपना स्कोर 81 तक खींच कर ले गए थे लेकिन उन्हें मालूम था कि वेस्टइंडीज के गेंदबाज जिस तरह की गेंदबाजी कर रहे थे, उन्हें भी एक ऐसी गेंद मिलने वाली है जो उनका सिर उड़ा ले जाएगी।'
गायकवाड़ की चोट ने भारतीय ड्रेसिंग रूम को हिलाया
कुछ ही पल में ऐसा ही हुआ, जिसने पूरे मैदान को कुछ सेकंड के लिए शांत कर दिया। होल्डिंग की एक तेज रफ्तार वाली गेंद गायकवाड़ के कान के पास जाकर लगी। गायकवाड़ जमीन पर गिर गए। गायकवाड़ उस चोट को याद करते हैं, 'मेरा चश्मा उड़कर न जाने कहां गया। मुझे लगा कि मेरे सिर में भूचाल आ गया हो। उसमें घंटियां बज रही थीं। तुरंत ही लॉयड, (विवियन) रिचर्ड्स और मरे उनकी तरफ दौड़कर आए।'
गायकवाड़ के कान से खून बह रहे थे। उन्हें रिटायर हर्ट होकर मैदान से वापस लौटना पड़ा। इस तरह विपरीत परिस्थितियों में खेली गई उस 81 रन की पारी का अंत हुआ। गायकवाड़ ड्रेसिंग रूम में जाते ही लेट गए लेकिन उन्हें तुरंत अस्पताल ले जाना पड़ा। जब गायकवाड़ अस्पताल पहुंचे, तो वहां टीम के मैनेजर पॉली उमरीगर पहले से ही मौजूद थे, जो विश्वनाथ के हाथ का प्लास्टर बनवाने आए हुए थे। उमरीगर को गायकवाड़ की काफी चिंता हुई। 14 साल पहले इसी तरह उनकी टीम के सदस्य नारी कॉन्ट्रैक्टर के सिर पर गेंद लगी थी और उन्हें 6 दिन बाद पूरी तरह से होश आया था और इसके बाद वह कभी क्रिकेट नहीं खेल सके थे।
बृजेश पटेल भी बुरी तरह से हुए चोटिल
गायकवाड़ अस्पताल में ही थे कि बृजेश पटेल भी बुरी तरह से चोटिल हो गए। होल्डर की उठती हुई गेंद उनके होठ पर जा लगी थी। उन्हें भी रिटायर हर्ट होना पड़ा। कप्तान बिशन सिंह बेदी ड्रेसिंग रूम से अपने खिलाड़ियों की हालत देख रहे थे। उन्होंने 306/6 के स्कोर पर मजबूरी में पारी घोषित कर दी, क्योंकि भारत के पास खेलने के लिए कोई बल्लेबाज नहीं बचा था। वेस्टइंडीज ने इसके जवाब में 391 रन बनाए और 85 रन ही बढ़त हासिल की।
बिशन सिंह बेदी का वह साहसिक फैसला
दूसरी पारी में भारत के 3 बल्लेबाज गायकवाड़, विश्वनाथ और बृजेश पटेल बल्लेबाजी करने की स्थिति में नहीं थे। गावस्कर भी महज 2 रन बनाकर चलते बने। अमरनाथ ने 60 रन बनाकर भारत की पारी की हार को टाला लेकिन उनके आउट होते ही बेदी ने वह फैसला लिया, जो शायद हर कप्तान नहीं ले पाता। दरअसल, दूसरी पारी में भारत का स्कोर 97/5 था। टीम इंडिया के पास महज 12 रन की बढ़त थी लेकिन अब खेलने के लिए कोई बल्लेबाज नहीं बचा था। ऐसे में बेदी ने पारी घोषित कर दी। बेदी जानते थे कि अगर बल्लेबाजी जारी रही तो कोई गंभीर हादसा हो सकता है।
वेस्टइंडीज को सिर्फ 13 रन का टारगेट मिला, जिसे उसने बगैर किसी नुकसान के हासिल कर लिया। बेदी ने बाद में साफ कहा कि खिलाड़ियों की जान किसी भी जीत से ज्यादा महत्वपूर्ण थी। आज भी बेदी के इस साहसिक फैसले की तारीफ की जाती है।
होल्डिंग ने कबूली सच्चाई
वेस्टइंडीज के प्लेयर्स भी अब मानते हैं कि उनकी टीम ने खतरनाक बॉलिंग की रणनीति अपनाई। कई साल बाद होल्डिंग ने अपनी आत्मकथा 'No Holding Back' में लिखा, 'बहुत से लोगों ने कहा कि भारतीय खिलाड़ियों के घायल होने की वजह पिच थी लेकिन सच यह था कि हमने जरूरत से ज्यादा शॉर्ट गेंदें फेंकी। जिस तरह से हमें गेंदबाजी करने के लिए कहा गया, उससे मैं सहज नहीं था लेकिन अगर आपका कप्तान आपसे ऐसा करने के लिए कहता है तो इसके लिए आप कुछ कर नहीं सकते।'
होल्डिंग की गेंद पर चोटिल होने के कई दिनों बाद तक गायकवाड़ को अपने कान में अजीब सी अवाजें सुनाई देती रहीं। उनके बाएं कान का पर्दा पूरी तरह से फट गया था। उनके कान का दो बार ऑपरेशन हुआ लेकिन उन्हें आजीवन अपने बाएं कान से सुनने में दिक्कत हुई।
