गांवों के युवाओं को प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी और बेहतर शैक्षिक संसाधन उपलब्ध कराने के लिए उत्तर प्रदेश में पंचायत सचिवालयों के माध्यम से डिजिटल लाइब्रेरी की व्यवस्था की गई। योजना पर 498 करोड़ रुपये खर्च किए जाने के बावजूद कई जगहों पर लाइब्रेरियां नियमित रूप से नहीं खुल रही हैं। कहीं पंचायत सचिवालय पर ताला लटका है तो कहीं संसाधन उपलब्ध होने के बाद भी युवाओं को उनका लाभ नहीं मिल पा रहा है। 


डिजिटल लाइब्रेरी का उद्देश्य गांव के विद्यार्थियों और युवाओं को किताबों के साथ कंप्यूटर, इंटरनेट और प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के लिए जरूरी सामग्री उपलब्ध कराना है लेकिन जमीनी तस्वीर कई जगह योजना के दावों पर सवाल खड़े कर रही है। बलरामपुर की तस्वीर इसका उदाहरण है। यहां 205 ग्राम पंचायतों में डिजिटल लाइब्रेरी स्थापित की गई हैं। रिपोर्ट के मुताबिक, इन पर करीब 8.20 करोड़ रुपये खर्च हुए हैं। इसके बावजूद कई पंचायत सचिवालयों में लाइब्रेरी के नियमित संचालन की व्यवस्था प्रभावी नहीं दिख रही है। 

अवध के जिलों में बड़ी संख्या में डिजिटल लाइब्रेरी

योजना के तहत अवध क्षेत्र के कई जिलों में बड़ी संख्या में डिजिटल लाइब्रेरी तैयार की गई हैं। उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक सीतापुर में 225, लखीमपुर में 223, बलरामपुर में 205, हरदोई में 198, गोंडा में 194, बहराइच में 161, श्रावस्ती में 78 और अमेठी में 108 डिजिटल लाइब्रेरी स्थापित की गई हैं। इनका मकसद गांव के छात्रों को शहर जैसी पढ़ाई की सुविधा उनके घर के नजदीक उपलब्ध कराना है लेकिन संचालन व्यवस्था कमजोर होने से योजना का वास्तविक लाभ प्रभावित हो रहा है।

 

यह भी पढ़ें: चौथे स्टेज का कैंसर भी नहीं तोड़ पाया हौसला, कीमोथेरेपी के बावजूद पास कर ली TET

 

डिजिटल लाइब्रेरियों के संचालन और निगरानी की जिम्मेदारी पंचायत स्तर पर तय की गई है। पंचायत सचिवालय खुलने के साथ लाइब्रेरी को भी नियमित रूप से संचालित किया जाना है। अधिकारियों की ओर से निगरानी के निर्देश दिए जाने की बात कही गई है, लेकिन सवाल यह है कि अगर सचिवालय ही समय से नहीं खुलता तो डिजिटल लाइब्रेरी का लाभ युवाओं को कैसे मिलेगा?

संसाधन हैं लेकिन पढ़ने वाले कहां जाएं?

कई जगह कंप्यूटर और किताबें पहुंचा दी गईं लेकिन लाइब्रेरी के नियमित संचालन के लिए जरूरी व्यवस्था नहीं हो सकी। इससे ग्रामीण युवाओं को प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के लिए अब भी जिला मुख्यालय या निजी संस्थानों का रुख करना पड़ रहा है।सरकार की योजना गांव-गांव तक शिक्षा की आधुनिक सुविधा पहुंचाने की है, लेकिन सिर्फ भवन, कंप्यूटर और किताबें उपलब्ध करा देने से शिक्षा का स्तर नहीं सुधरेगा। जरूरी है कि लाइब्रेरी रोज खुले, इंटरनेट और उपकरण चालू रहें और युवाओं को पढ़ने के लिए नियमित समय मिले।

 

यह भी पढ़ें: ‘मछली’ वाले बयान पर बवाल, सीएम योगी के खिलाफ अजय राय ने ठोका मुकदमा

498 करोड़ के खर्च का हिसाब भी अहम

498 करोड़ रुपये जैसी बड़ी धनराशि खर्च होने के बाद सबसे बड़ा सवाल अब नतीजे और निगरानी का है। कितनी लाइब्रेरियां रोज खुल रही हैं, कितने विद्यार्थी उनका इस्तेमाल कर रहे हैं और कितनी जगह संसाधन बंद पड़े हैं, इसकी नियमित समीक्षा जरूरी है।सरकार गांवों में शिक्षा की तस्वीर बदलने के लिए करोड़ों रुपये खर्च कर रही है, लेकिन अगर डिजिटल लाइब्रेरी भी पंचायत सचिवालयों के ताले में बंद रही तो सवाल उठना तय है कि आखिर इस खर्च से ग्रामीण युवाओं की पढ़ाई कितनी बदली?