उत्तर प्रदेश की राजधानी के अलीगंज में 23 जून को हुए भीषण अग्निकांड में 15 लोगों की मौत के 36 दिन बाद भी पीड़ित परिवार न्याय की आस लगाए बैठे हैं। हादसे के तुरंत बाद सरकार ने सख्त कार्रवाई का भरोसा दिया, भवन पर बुलडोजर चला, भवन मालिक समेत आरोपियों पर मुकदमे दर्ज हुए और एसआईटी गठित कर जांच शुरू की गई लेकिन डेढ़ महीने से अधिक समय बीतने के बावजूद जांच पूरी नहीं हो सकी है।
मुख्य आरोपी वीरेंद्र प्रसाद शुक्ला सहित चार आरोपियों की गिरफ्तारी हो चुकी है, जबकि उसका भाई सुरेंद्र शुक्ला अब भी फरार है। उस पर एक लाख रुपये का इनाम घोषित है और पुलिस प्रयागराज, सीतापुर, दिल्ली समेत कई स्थानों पर लगातार दबिश दे रही है। उसकी संपत्तियों की भी जांच की जा रही है। इसके बावजूद जिन अधिकारियों की लापरवाही में अवैध भवन खड़ा हुआ और सुरक्षा मानकों की अनदेखी होती रही, उनके खिलाफ अब तक कोई ठोस कार्रवाई सामने नहीं आई है।
15 घंटे चला बुलडोजर, भवन मालिक समेत चार गिरफ्तार
प्रशासन ने तेजी दिखाते हुए करीब 15 घंटे में अवैध भवन को ध्वस्त करा दिया। शासन ने स्पष्ट किया कि ध्वस्तीकरण का पूरा खर्च भवन मालिक वीरेंद्र प्रसाद शुक्ला से वसूला जाएगा। मामले में मुख्य आरोपी वीरेंद्र प्रसाद शुक्ला सहित चार आरोपियों को गिरफ्तार कर जेल भेजा जा चुका है और उनके खिलाफ कानूनी कार्रवाई जारी है।मामले का सबसे वांछित आरोपी सुरेंद्र शुक्ला अब भी पुलिस की गिरफ्त से बाहर है। उसकी गिरफ्तारी पर एक लाख रुपये का इनाम घोषित किया गया है। पुलिस की टीमें प्रयागराज, सीतापुर और दिल्ली सहित कई स्थानों पर लगातार छापेमारी कर रही हैं। जांच एजेंसियां सुरेंद्र शुक्ला की चल-अचल संपत्तियों और वित्तीय लेनदेन की भी पड़ताल कर रही हैं ताकि उसके नेटवर्क और ठिकानों का पता लगाया जा सके।
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अमृत अभिजात और प्रवीण कुमार की निगरानी में SIT जांच
पूरे प्रकरण की जांच प्रमुख सचिव गृह अमृत अभिजात और डीजी फायर सर्विस प्रवीण कुमार की निगरानी में गठित एसआईटी कर रही है। जांच का दायरा भवन निर्माण की वैधता, अग्नि सुरक्षा मानकों के उल्लंघन, एलडीए, अग्निशमन विभाग, बिजली विभाग और अन्य संबंधित एजेंसियों की भूमिका तक फैला हुआ है।एसआईटी उन अधिकारियों और कर्मचारियों की भूमिका भी खंगाल रही है जिनके कार्यकाल में भवन का निर्माण हुआ, बिजली कनेक्शन जारी हुआ, एलडीए से संबंधित प्रक्रियाएं पूरी हुईं और वर्षों तक बिना पर्याप्त सुरक्षा इंतजामों के कोचिंग सेंटर संचालित होता रहा। संबंधित अधिकारियों और अभियंताओं की सूची तैयार होने के बावजूद अब तक किसी जिम्मेदार अधिकारी पर कोई बड़ी दंडात्मक कार्रवाई नहीं हुई है। इससे प्रशासनिक जवाबदेही पर लगातार सवाल उठ रहे हैं।
अग्निकांड के बाद राजधानी में कोचिंग संस्थानों की वास्तविक तस्वीर भी सामने आई। अनुमान के अनुसार लखनऊ में करीब चार हजार कोचिंग सेंटर संचालित हैं, जबकि इनमें केवल 256 संस्थान ही पंजीकृत हैं। यानी हजारों संस्थान बिना समुचित नियामकीय व्यवस्था और सुरक्षा मानकों के संचालन करते पाए गए।हादसे के बाद प्रशासन ने 200 से अधिक कोचिंग संस्थानों को नोटिस जारी किए और कई का संचालन अस्थायी रूप से रोक दिया गया। बाद में अधिकांश संस्थानों ने अग्निशमन और अन्य सुरक्षा मानकों को पूरा करने का आश्वासन दिया, जिसके बाद उन्हें दोबारा संचालन की अनुमति मिल गई। इस फैसले पर भी सवाल उठ रहे हैं कि क्या केवल आश्वासन के आधार पर संस्थानों को राहत देना पर्याप्त था।
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सिस्टम की जवाबदेही अब भी तय नहीं
अलीगंज अग्निकांड में 15 लोगों की जान चली गई। बुलडोजर चला, गिरफ्तारियां हुईं और जांच शुरू हुई लेकिन जिन विभागों की कथित लापरवाही से यह पूरा तंत्र वर्षों तक चलता रहा, उनकी जवाबदेही अब तक तय नहीं हो सकी है। एसआईटी की अंतिम रिपोर्ट का इंतजार लगातार लंबा होता जा रहा है। 36 दिन बाद भी जांच अधूरी है। मुख्य आरोपी वीरेंद्र प्रसाद शुक्ला सहित चार आरोपी गिरफ्तार हो चुके हैं, जबकि एक लाख का इनामी सुरेंद्र शुक्ला अब भी फरार है और उसकी तलाश में कई राज्यों में छापेमारी जारी है। दूसरी ओर, जिन अधिकारियों की भूमिका जांच के दायरे में है, उनके खिलाफ अब तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या अलीगंज अग्निकांड में न्याय केवल बुलडोजर और गिरफ्तारियों तक सीमित रहेगा या 15 निर्दोष लोगों की मौत के लिए जिम्मेदार पूरे तंत्र की जवाबदेही भी तय की जाएगी?
