उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़ जिले में सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े करने वाला मामला सामने आया है। लालगंज सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र और ट्रॉमा सेंटर में बुखार के इलाज के दौरान लालगंज के एसडीएम वाचस्पति सिंह की बेटी को कथित तौर पर एक्सपायरी पैरासिटामोल इंजेक्शन और एक्सपायरी ग्लूकोज दिए जाने का मामला सामने आया है। मामला उजागर होते ही स्वास्थ्य विभाग में हड़कंप मच गया। सीएमओ ने अस्पताल का औचक निरीक्षण कराया और दवाओं के स्टॉक की जांच शुरू कराई।
मामले में स्टोर प्रभारी अरविंद कुमार शुक्ला और फार्मासिस्ट देव कुमार दुबे को निलंबित कर दिया गया है। साथ ही पूरे प्रकरण की जांच के लिए कमेटी गठित की गई है। मामला लालगंज सीएचसी और ट्रॉमा सेंटर का है। जानकारी के मुताबिक, एसडीएम वाचस्पति सिंह की बेटी बुखार के इलाज के लिए अस्पताल पहुंची थीं। आरोप है कि उपचार के दौरान उन्हें पैरासिटामोल का एक्सपायरी इंजेक्शन और एक्सपायरी ग्लूकोज दिया गया।मामला सामने आने के बाद अस्पताल प्रशासन और स्वास्थ्य विभाग में खलबली मच गई। इसके बाद अधिकारियों ने अस्पताल में उपलब्ध दवाओं के स्टॉक की जांच शुरू कराई।
सीएमओ ने किया औचक निरीक्षण
प्रकरण की जानकारी मिलने के बाद सीएमओ डॉ. एएन प्रसाद ने लालगंज सीएचसी और ट्रॉमा सेंटर का औचक निरीक्षण किया। इस दौरान अस्पताल के दवा स्टोर में उपलब्ध दवाओं के स्टॉक, रखरखाव और एक्सपायरी दवाओं की स्थिति की पड़ताल की गई।जांच के दौरान एक्सपायरी दवाओं को अलग करने की कार्रवाई भी शुरू की गई है। स्वास्थ्य विभाग अब यह पता लगाने में जुटा है कि एक्सपायरी दवाएं स्टोर में कितने समय से मौजूद थीं और मरीजों को दवा उपलब्ध कराने से पहले उनकी एक्सपायरी डेट की जांच क्यों नहीं की गई।
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स्टोर प्रभारी और फार्मासिस्ट निलंबित
मामले में स्वास्थ्य विभाग ने स्टोर प्रभारी अरविंद कुमार शुक्ला और फार्मासिस्ट देव कुमार दुबे को निलंबित कर दिया है। दोनों के खिलाफ कार्रवाई के साथ ही पूरे प्रकरण की जांच के लिए कमेटी गठित की गई है। सीएमओ डॉ. एएन प्रसाद ने बताया कि उन्हें लालगंज सीएचसी में एक्सपायरी पैरासिटामोल इंजेक्शन लगाए जाने की सूचना मिली थी। इसके बाद जांच कमेटी बनाई गई और स्टोर प्रभारी तथा फार्मासिस्ट को निलंबित किया गया है।
अब उठ रहे कई बड़े सवाल
इस मामले के सामने आने के बाद सरकारी अस्पतालों में दवाओं के रखरखाव और स्टॉक जांच की व्यवस्था पर सवाल उठने लगे हैं। सबसे बड़ा सवाल यह है कि अगर दवाओं की एक्सपायरी डेट की नियमित जांच की व्यवस्था है तो एक्सपायरी दवा मरीज तक कैसे पहुंची? यह भी जांच का विषय है कि अस्पताल के स्टोर में कितनी एक्सपायरी दवाएं मौजूद थीं और वे कब से वहां रखी थीं। क्या नियमित स्टॉक जांच के दौरान इन दवाओं की पहचान नहीं हुई? क्या एक्सपायरी दवाओं को मरीजों की पहुंच से अलग रखने की व्यवस्था में लापरवाही हुई?
आम मरीजों की सुरक्षा पर भी सवाल
मामला इसलिए भी गंभीर माना जा रहा है क्योंकि अस्पताल में इलाज कराने वाले मरीजों को दवाओं की गुणवत्ता और उनकी वैधता पर भरोसा होता है। अगर एक्सपायरी दवा अस्पताल के स्टोर से निकलकर मरीज तक पहुंच गई, तो यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि अब तक ऐसी कितनी दवाएं मरीजों को दी जा चुकी हैं। हालांकि, फिलहाल यह स्पष्ट नहीं है कि एक्सपायरी दवा दिए जाने से मरीज की सेहत पर कोई प्रतिकूल प्रभाव पड़ा या नहीं। इसकी पुष्टि जांच पूरी होने के बाद ही हो सकेगी।
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जांच कमेटी करेगी पूरे मामले की पड़ताल
स्वास्थ्य विभाग की जांच कमेटी अब अस्पताल के दवा स्टोर में उपलब्ध स्टॉक, एक्सपायरी दवाओं और दवा वितरण की प्रक्रिया की जांच करेगी। साथ ही यह भी तय किया जाएगा कि लापरवाही किस स्तर पर हुई और इसके लिए कौन जिम्मेदार है।मामले में दो कर्मचारियों के निलंबन के बाद अब जांच रिपोर्ट पर नजर है। रिपोर्ट सामने आने के बाद ही यह स्पष्ट होगा कि एक्सपायरी दवा मरीज तक पहुंचने की असली वजह क्या थी और आगे किन अधिकारियों या कर्मचारियों पर कार्रवाई होती है।
