भारत में कुपोषण की समस्या अभी तक खत्म नहीं हुई है। वहीं दूसरी ओर भारत वजन बढ़ने, मोटापे और खान-पान से जुड़ी बीमारियों के तेजी से बढ़ते बोझ से जूझ रहा है। कम उम्र के बच्चे भी इस मोटापे की चपेट में आ रहे हैं। बदलती जीवनशैली और गलत खान-पान की वजह से मोटापा और जरूरत से ज्यादा पोषण (ओवर-न्यूट्रिशन) देश के लिए बड़ी समस्या बनता जा रहा हैं। ICMR-NIN के आंकड़े बताते हैं कि भारत में 1.7 करोड़ से ज़्यादा बच्चे और किशोर मोटापे से पीड़ित हैं। 2030 तक यह संख्या 2.7 करोड़ से ज्यादा हो सकती है।
अगर समय रहते कदम नहीं उठाए गए तो स्थिति आगे चलकर और ज्यादा गंभीर हो सकती है। ऐसे में इसपर काबू पाना किसी मुश्किल टास्क से कम नहीं होगा। इसी को देखते हुए हाल ही में सरकार को दो बड़े सुझाव दिए गए हैं। इसके लिए पैकेटबंद फूड्स पर साफ न्यूट्रिशन लेबल, जंक फूड पर हेल्थ टैक्स और स्कूलों में स्वस्थ खान-पान को बढ़ावा देने की सिफारिश की गई है।
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मोटापे और जंक फूड्स पर कंट्रोल के लिए सलाह
पहली सलाह: इसके लिए संसदीय स्थायी समिति ने पैकेटबंद फूडस पर 'फ्रंट-ऑफ-पैक' यानी पैकेट के सामने न्यूट्रिशन लेबलिंग को अनिवार्य करने की सिफारिश की है, जिससे यह पता चल सके कि उनमें चीनी की मात्रा ज्यादा है या नहीं। बता दें कि बहुत ज्यादा चीनी का सेवन बढ़ते मोटापे और वजन बढ़ने के सबसे बड़े और मुख्य कारणों में से एक है। भारत में फिलहाल इसपर विचार और बहस जारी है। वहीं दुनिया के कई देशों में यह अनिवार्य किया जा चुका है।
दूसरी सलाह: दूसरी सलाह हेल्थ टैक्स लगाने की है। ICMR-नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ न्यूट्रिशन (ICMR-NIN) की अगुवाई वाले 'लेट्स फिक्स आवर फूड' कंसोर्टियम ने सरकार को सलाह दी है कि ज्यादा फैट, नमक और चीनी वाले फूड्स पर हेल्थ टैक्स लगाया जाए। साथ ही, ऐसे प्रोडक्ट्स के विज्ञापनों पर सख्त नियम बनाए जाएं। इसके साथ ही सुझाव दिया गया है कि स्कूलों में बच्चों के लिए हेल्दी खान-पान का माहौल तैयार किया जाए।
हेल्थ टैक्स को समझिए
वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गेनाइजेशन (WHO) के मुताबिक, हेल्थ टैक्स ऐसे प्रोडक्ट्स पर लगाया जाता है जो लोगों की सेहत के लिए नुकसानदायक होते हैं। जैसे तंबाकू, शराब और ज्यादा चीनी वाले ड्रिंक्स। इसका मकसद लोगों को इन चीजों का कम इस्तेमाल करने के लिए प्रेरित करना है। हेल्थ टैक्स से दो बड़े फायदे होते हैं। पहला, इससे लोगों में बीमारियों का खतरा कम होता है। इससे कई जानें बचाई जा सकती हैं। दूसरा, सरकार को इससे एक्स्ट्रा कमाई होती है। इसका इस्तेमाल स्वास्थ्य सुविधाएं बेहतर बनाने और जनकल्याण योजनाओं पर किया जा सकता है। इस टैक्स का सबसे बड़ा मकसद ही मोटापा, डायबिटीज, दिल की बीमारियों और अन्य गैर-संचारी बीमारियों (ऐसी बीमारियां जो एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति में नहीं फैलती) के खतरे को कम करना है।
एक्सपर्ट्स का भी मानना है कि जब अनहेल्दी चीजें महंगी हो जाती हैं, तो लोग उन्हें कम खरीदते हैं और उनकी जगह हेल्दी चीजें चुनते हैं। इससे तंबाकू, शराब और ज्यादा चीनी वाले उत्पाद महंगे हो जाते हैं। जरूरत पड़ने पर सरकार इस टैक्स को समय-समय पर बढ़ा भी सकती है। एक्सपर्ट्स का मानना है कि टैक्स उत्पाद की कीमत के बजाय उसमें मौजूद चीनी, शराब या तंबाकू जैसी नुकसानदायक चीजों की मात्रा के आधार पर लगाना ज्यादा प्रभावी होता है। इससे ऐसे उत्पाद महंगे हो जाते हैं और लोग उनका कम इस्तेमाल करते हैं।
इन देशों में पहले से ही लागू है हेल्थ टैक्स
विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक, 2017 से अब तक कम से कम 133 देशों ने हेल्थ टैक्स बढ़ाया है या फिर नया हेल्थ टैक्स लागू किया है। कोलंबिया में 2023 में पैकेटबंद फूड्स के ज्यादा इस्तेमाल से निपटने के लिए 'जंक फ़ूड लॉ' लागू किया गया। ऐसे फूड्स पर अतिरिक्त टैक्स की शुरुआत 10% से हुई, जो अगले साल बढ़कर 15% और उसके अगले साल 20% हो गया। नॉर्वे, हंगरी, डेनमार्क, बरमूडा, डोमिनिका, सेंट विंसेंट और ग्रेनाडाइन्स और नवाजो नेशन (अमेरिका) ने भी बिना प्रोसेस की गई चीनी और चीनी मिलाए गए फूड्स पर विशेष रूप से टैक्स लागू किया है।
